आज जब अंतरिक्ष में इंसानों की यात्रा आम होती जा रही है, तब शायद यह जानकर हैरानी होगी कि अंतरिक्ष की ओर भेजे गए शुरुआती जीवित यात्रियों में इंसान नहीं, बल्कि छोटी-सी फल मक्खियां (Fruit Flies) थीं। 20 फरवरी 1947 को वैज्ञानिकों ने इन मक्खियों को अमेरिका के न्यू मैक्सिको स्थित White Sands Missile Range से एक पकड़े गए जर्मन V-2 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष की ओर भेजा था। रॉकेट करीब 109 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था और मक्खियों को मक्के के बीजों के साथ एक छोटे कंटेनर में रखा गया था।
आज जब अंतरिक्ष में इंसानों की यात्रा आम होती जा रही है, तब शायद यह जानकर हैरानी होगी कि अंतरिक्ष की ओर भेजे गए शुरुआती जीवित यात्रियों में इंसान नहीं, बल्कि छोटी-सी फल मक्खियां (Fruit Flies) थीं। 20 फरवरी 1947 को वैज्ञानिकों ने इन मक्खियों को अमेरिका के न्यू मैक्सिको स्थित White Sands Missile Range से एक पकड़े गए जर्मन V-2 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष की ओर भेजा था। रॉकेट करीब 109 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था और मक्खियों को मक्के के बीजों के साथ एक छोटे कंटेनर में रखा गया था।
उस समय वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि पृथ्वी के वायुमंडल से ऊपर मौजूद कॉस्मिक रेडिएशन जीवित प्राणियों पर किस तरह असर डालता है। उस दौर में किसी जीव को अंतरिक्ष की ओर भेजना ही अपने आप में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि थी। इसके बाद 1950 के दशक में भी फल मक्खियों को ऊंचाई वाले कई प्रयोगों में इस्तेमाल किया गया। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों को समझ आया कि ये छोटी मक्खियां अंतरिक्ष में जीवन पर होने वाले असर को समझने का आसान जरिया बन सकती हैं।
फल मक्खियां ही क्यों बनीं वैज्ञानिकों की पसंद? फल मक्खियों को वैज्ञानिक लंबे समय से जेनेटिक्स और शरीर में होने वाले बदलावों को समझने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। इनके बारे में वैज्ञानिकों को काफी जानकारी है और इनके कई जीन इंसानों में पाए जाने वाले जीन से जुड़े हुए हैं। सबसे खास बात यह है कि इनका जीवन चक्र छोटा होता है और ये तेजी से प्रजनन करती हैं। इसलिए वैज्ञानिक कम समय में कई पीढ़ियों में होने वाले बदलावों को देख सकते हैं। इसके अलावा कम जगह में सैकड़ों या हजारों मक्खियों को रखा जा सकता है।
समय के साथ अंतरिक्ष में किए गए प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने देखा कि वहां रहने से इन मक्खियों में कई तरह के बदलाव हो सकते हैं। 1970 के दशक के प्रयोगों में रेडिएशन और अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े म्यूटेशन, उम्र बढ़ने से संबंधित प्रभाव और प्रजनन कोशिकाओं को नुकसान जैसी चीजों पर ध्यान दिया गया। कुछ प्रयोगों में मक्खियों की उम्र कम होने, पंखों में असामान्य बदलाव और शरीर में जमा ऊर्जा के भंडार में परिवर्तन जैसी बातें भी सामने आईं।
अंतरिक्ष में इम्यून सिस्टम पर भी हुआ अध्ययन बाद के वर्षों में वैज्ञानिकों का ध्यान इस बात पर गया कि अंतरिक्ष यात्रा शरीर की इम्यूनिटी यानी रोगों से लड़ने की क्षमता को कैसे प्रभावित करती है। 2006 में Space Shuttle Discovery के STS-121 मिशन के दौरान FIT यानी Fungal Immunity and Tumorigenesis प्रयोग किया गया। इसमें यह देखने की कोशिश की गई कि अंतरिक्ष में रहने से फल मक्खियों की फंगल संक्रमण से लड़ने की क्षमता पर क्या असर पड़ता है।
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2014 में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया कि अंतरिक्ष में विकसित हुई मक्खियों में इम्यून प्रतिक्रिया कमजोर हुई थी। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले इंसानों में भी इम्यून सिस्टम में बदलाव देखे जा सकते हैं। हालांकि फल मक्खी का इम्यून सिस्टम इंसान के शरीर जैसा पूरी तरह नहीं होता, लेकिन दोनों में मौजूद कुछ बुनियादी जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।
छोटी-सी मक्खी से अंतरिक्ष विज्ञान को बड़ी मदद 1947 में शुरू हुई यह कहानी अब करीब आठ दशक लंबी हो चुकी है। V-2 रॉकेट से शुरू हुई फल मक्खियों की अंतरिक्ष यात्रा आगे चलकर अंतरिक्ष प्रयोगशालाओं और International Space Station (ISS) तक पहुंची। इन छोटे जीवों की मदद से वैज्ञानिकों ने जेनेटिक्स, उम्र बढ़ने, रेडिएशन, बदली हुई ग्रैविटी और इम्यून सिस्टम जैसे कई विषयों को समझने की कोशिश की है।
फल मक्खियां इंसान अंतरिक्ष यात्री के शरीर में होने वाली हर चीज का जवाब नहीं दे सकतीं, लेकिन उनकी तेज प्रजनन क्षमता वैज्ञानिकों को कम समय में कई पीढ़ियों में होने वाले बदलाव देखने का मौका देती है। यही वजह है कि अंतरिक्ष में लंबे मिशनों की तैयारी के बीच आज भी ये छोटी-सी मक्खियां वैज्ञानिकों के लिए बेहद उपयोगी बनी हुई हैं।
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