हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी यादें दिमाग में किसी फाइल की तरह सुरक्षित रहती हैं और जब जरूरत होती है, हम उन्हें खोलकर याद कर लेते हैं। लेकिन Rice University की नई रिसर्च इस सोच को चुनौती देती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, याददाश्त कोई ऐसी स्थिर चीज नहीं है जिसे दिमाग बस स्टोर करके रखता है। हम जब भी किसी पुरानी बात को याद करते हैं, उस याद को याद करने का तरीका उसके दिमागी प्रतिनिधित्व को अगली बार प्रभावित कर सकता है।
हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी यादें दिमाग में किसी फाइल की तरह सुरक्षित रहती हैं और जब जरूरत होती है, हम उन्हें खोलकर याद कर लेते हैं। लेकिन Rice University की नई रिसर्च इस सोच को चुनौती देती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, याददाश्त कोई ऐसी स्थिर चीज नहीं है जिसे दिमाग बस स्टोर करके रखता है। हम जब भी किसी पुरानी बात को याद करते हैं, उस याद को याद करने का तरीका उसके दिमागी प्रतिनिधित्व को अगली बार प्रभावित कर सकता है।
Rice University के मनोवैज्ञानिक वैज्ञानिक Marc Coutanche और डॉक्टोरल छात्रा Amy Qi ने इस बात को समझने के लिए एक खास अध्ययन किया। उनकी रिसर्च के नतीजे Journal of Cognitive Neuroscience में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि हमारी Memory यानी याददाश्त Dynamic और Adaptive होती है, यानी यह समय के साथ हमारे इस्तेमाल के अनुसार बदल सकती है।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। अगर आपको अपने कुत्ते को याद करना है, तो कभी आपका ध्यान उसके बालों के रंग या पैटर्न पर जा सकता है। किसी दूसरी बार आप सिर्फ यह सोच सकते हैं कि वह एक कुत्ता है। वहीं कभी आप उसे अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में याद कर सकते हैं। वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि इन अलग-अलग तरीकों से किसी चीज को याद करने का असर बाद में दिमाग पर पड़ता है या नहीं।
इसका पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को कुछ तस्वीरों और अनजान Dutch words की जोड़ियां याद कराईं। इस दौरान उनके दिमाग की गतिविधियों को fMRI (Functional Magnetic Resonance Imaging) की मदद से देखा गया। बाद में प्रतिभागियों को उन्हीं चीजों को अलग-अलग तरीके से याद करने के लिए कहा गया। कभी उन्हें किसी चीज की खास विशेषता पर ध्यान देना था, कभी उसकी कैटेगरी पर और कभी उसके बड़े अर्थ या थीम के बारे में सोचना था।
जब बाद में उनकी याददाश्त की दोबारा जांच की गई, तो एक दिलचस्प बात सामने आई। लोगों की याद रखने की क्षमता लगभग समान रही, चाहे उन्होंने पहले उस जानकारी को किसी भी तरीके से याद किया हो। लेकिन उनके दिमाग की गतिविधि में बड़ा फर्क दिखाई दिया।
यही इस रिसर्च की सबसे खास बात थी। Amy Qi के मुताबिक, किसी याद में उस तरीके का भी एक निशान रह सकता है, जिस तरीके से उसे पहले इस्तेमाल किया गया था। यानी दिमाग सिर्फ यह नहीं दिखाता कि हमें क्या याद है, बल्कि यह भी संकेत दे सकता है कि हमने उस याद को पहले किस तरह इस्तेमाल किया था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जब लोगों ने चीजों को उनकी Category यानी कैटेगरी के आधार पर याद किया, तो अलग-अलग वस्तुओं से जुड़े दिमागी पैटर्न एक-दूसरे के ज्यादा समान दिखाई देने लगे। वहीं जब किसी खास वस्तु पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिया गया, तो उससे जुड़ा दिमागी पैटर्न कुछ हिस्सों में ज्यादा अलग और स्पष्ट दिखाई दिया।
इस रिसर्च में Hippocampus और Visual Cortex जैसे दिमाग के हिस्सों से जुड़े संकेतों का भी अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने Machine Learning तकनीकों के साथ fMRI डेटा का इस्तेमाल किया, जिससे दिमाग की गतिविधि में मौजूद बेहद सूक्ष्म पैटर्न को पहचाना जा सका। सामान्य व्यवहार या सिर्फ याददाश्त के टेस्ट से ये छोटे बदलाव शायद दिखाई ही नहीं देते।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार किसी बात को याद करने से हमारी पूरी याद बदल जाती है। बल्कि रिसर्च यह दिखाती है कि याददाश्त को याद करना खुद एक सक्रिय प्रक्रिया है, और जिस तरीके से हम किसी जानकारी को याद करते हैं, उसका निशान दिमाग में रह सकता है।
वैज्ञानिक अब याददाश्त को एक ऐसी फाइल के रूप में देखने के बजाय एक लगातार बदलने वाली प्रक्रिया के रूप में समझने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे अनुभवों के साथ यादें बनती हैं, जुड़ती हैं, बदलती हैं और जरूरत पड़ने पर दोबारा इस्तेमाल होती हैं।
Marc Coutanche के अनुसार, मनोविज्ञान, ब्रेन इमेजिंग और Computational Science को साथ लेकर इस तरह की रिसर्च दिमाग की काम करने की बारीकियों को समझने में मदद कर सकती है। भविष्य में इससे यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि इंसान किस तरह अनुभवों को लंबे समय तक याद रहने वाले ज्ञान में बदलता है।
आसान शब्दों में समझें हमारी याददाश्त कंप्यूटर की हार्ड डिस्क जैसी नहीं है, जहां चीजें बस रखी रहती हैं। जब हम किसी पुरानी बात को याद करते हैं, तो हमारा दिमाग उस याद को सक्रिय करता है और उसे इस्तेमाल करने का तरीका उसके दिमागी पैटर्न पर असर डाल सकता है। यानी हर बार याद करना सिर्फ पुरानी याद को वापस लाना नहीं, बल्कि उस याद के साथ दिमाग की एक नई प्रक्रिया भी हो सकती है।
याददाश्त कैसे काम करती है, दिमाग और याददाश्त, नई मेमोरी रिसर्च, याददाश्त बदलती है, ब्रेन रिसर्च, fMRI रिसर्च, मानव मस्तिष्क, मेमोरी और दिमाग
yaaddasht kaise kaam karti hai, dimaag aur memory, memory research, yaaddasht kaise badalti hai, brain research, insani dimaag, memory retrieval
क्या याद करने से हमारी याददाश्त बदलती है, नई रिसर्च में याददाश्त का रहस्य, how human memory changes when we remember, memory retrieval affects brain research, fMRI से याददाश्त पर नई रिसर्च, दिमाग में यादें कैसे बदलती हैं, Rice University memory research
Memory, Brain, Psychology, Science News, Neuroscience, Brain Research, Human Memory, fMRI, Artificial Intelligence, Science, NetGramNews, NetGram News
Disclaimer
Disclaimer :
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI. अस्वीकरण: इस्तेमाल की गई तस्वीरें केवल जानकारी/उदाहरण के उद्देश्य से हैं और तस्वीरों में कुछ बदलाव या एडिटिंग AI की मदद से की गई है।
Published by: Zoya. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.