सुप्रीम कोर्ट ने पद से हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए बीच कार्यकाल में इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदों के लोगों को मिलने वाली सुविधाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। जनहित याचिका में ऐसे लोगों को इस्तीफे के बाद सरकारी सुविधाएं नहीं देने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने उन संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को इस्तीफे के बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर दायर याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जो पद से हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए बीच कार्यकाल में इस्तीफा दे देते हैं। इस मामले में याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ऐसे लोगों को इस्तीफा देने के बाद सरकारी सुविधाएं और दूसरी छूट नहीं मिलनी चाहिए। यह मामला जनहित याचिका यानी PIL के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। याचिका में खास तौर पर जजों समेत संवैधानिक पदों पर काम करने वाले लोगों के इस्तीफे और उसके बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर सवाल उठाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने की सुनवाई इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की। बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार से अपना जवाब देने को कहा है। याचिका में कहा गया है कि अगर कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति उसे हटाने की कार्रवाई शुरू होने के बाद या ऐसी कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देता है, तो उसे पद छोड़ने के बाद मिलने वाली सुविधाओं का हकदार नहीं होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से इस बारे में साफ आदेश देने की मांग की है।
क्या मांग की गई है? याचिका में मांग की गई है कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह साफ किया जाए कि जो संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति खुद को हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देता है, उसे इस्तीफे के बाद कोई खास सुविधा, सरकारी मदद या दूसरी सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर किसी नियम के तहत ऐसे व्यक्ति को इस्तीफे के बाद भी सुविधाएं मिलती हैं, तो उस नियम को संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ माना जाना चाहिए। याचिका में सुनवाई चलने तक अंतरिम आदेश देने की मांग भी की गई है। इसका मतलब है कि मामले पर अंतिम फैसला आने तक केंद्र सरकार ऐसे किसी संवैधानिक पद वाले व्यक्ति को सुविधाएं न दे, जिसने हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस्तीफा दिया हो या उस प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा दिया हो।
कार्यकाल पूरा करने की बात याचिका में कहा गया है कि किसी बड़े संवैधानिक पद पर रहने वाले व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह अपना कार्यकाल पूरा करे। अगर उसके खिलाफ पद से हटाने की कार्रवाई जरूरी हो, तो उसे उस प्रक्रिया का सामना करना चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सिर्फ हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देना सही तरीका नहीं होना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि ऐसे इस्तीफे उस भरोसे को कमजोर करते हैं, जो संविधान बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से करता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जब संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए पद छोड़ दिया।
दूसरे कर्मचारियों से की गई तुलना याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में सामान्य सरकारी कर्मचारियों और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बीच फर्क का भी मुद्दा उठाया है। याचिका के मुताबिक, कई मामलों में ऐसे कर्मचारियों को विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ता है और उस दौरान उनके लिए इस्तीफा देकर कार्रवाई से बचना आसान नहीं होता। ऐसे में याचिकाकर्ता का कहना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए भी नियमों में इस तरह का फर्क नहीं होना चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि बड़े संवैधानिक पदों पर रहने वाले लोगों से सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है। इसलिए अगर उनके खिलाफ पद से हटाने की कार्रवाई की जरूरत पड़ती है, तो उन्हें उस प्रक्रिया का सामना करना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने इस तरह के फर्क को संविधान के अनुच्छेद 14 से जोड़ते हुए सवाल उठाया है। अनुच्छेद 14 सभी लोगों को कानून के सामने बराबरी का अधिकार देता है।
अब केंद्र के जवाब पर नजर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट के सामने अभी याचिका में उठाए गए सवालों पर अंतिम फैसला नहीं आया है। इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान यह देखा जाएगा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बीच कार्यकाल के दौरान इस्तीफा देने और उसके बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर क्या नियम होने चाहिए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्र को नोटिस जारी किया गया है और मामले में सरकार के जवाब का इंतजार है।
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