दुनिया में किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन मानव अंगों की सीमित उपलब्धता के कारण हजारों मरीज लंबे समय तक डायलिसिस पर निर्भर रहते हैं। अब वैज्ञानिकों को इस समस्या से निपटने की दिशा में एक बड़ी उम्मीद दिखाई दे रही है। अमेरिका के Massachusetts General Hospital में पांच मरीजों में जेनेटिकली इंजीनियर्ड सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की गई है। यह प्रक्रिया xenotransplantation कहलाती है, जिसमें किसी जानवर के अंग को इंसान के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है।
इंसानों में सफल हुआ जेनेटिकली इंजीनियर्ड सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट, ऑर्गन की कमी का मिल सकता है समाधान दुनिया में किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन मानव अंगों की सीमित उपलब्धता के कारण हजारों मरीज लंबे समय तक डायलिसिस पर निर्भर रहते हैं। अब वैज्ञानिकों को इस समस्या से निपटने की दिशा में एक बड़ी उम्मीद दिखाई दे रही है।
अमेरिका के Massachusetts General Hospital में पांच मरीजों में जेनेटिकली इंजीनियर्ड सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की गई है। यह प्रक्रिया xenotransplantation कहलाती है, जिसमें किसी जानवर के अंग को इंसान के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। इन मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कुछ मरीजों में सूअर की किडनी ने कई महीनों तक काम किया और डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी।
सूअर की किडनी इंसानों के लिए कैसे तैयार की गई? इस प्रयोग में इस्तेमाल की गई किडनी Yucatan miniature pigs से ली गई थीं। इन सूअरों के अंगों का आकार इंसानी अंगों के करीब होता है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी—इंसान का immune system जानवर के अंग को आसानी से स्वीकार नहीं करता। शरीर उसे बाहरी चीज समझकर reject कर सकता है। इसे रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने सूअर के genes में कई बदलाव किए। किडनी में मौजूद ऐसे तीन pig proteins हटाए गए जो immune rejection की बड़ी वजह बन सकते हैं। इसके साथ सात human genes जोड़े गए, ताकि अंग इंसानी शरीर के साथ ज्यादा compatible हो सके।
वैज्ञानिकों ने सूअर के DNA में मौजूद कुछ ऐसे viruses को भी inactive किया, जो transplant के बाद मरीज को संक्रमित कर सकते हैं। Tim Andrews की किडनी ने करीब 9 महीने किया काम इस प्रयोग का एक महत्वपूर्ण मामला 66 वर्षीय Tim Andrews का है। उन्हें genetically engineered pig kidney transplant की गई थी। यह किडनी करीब नौ महीने तक काम करती रही और इस दौरान उन्हें dialysis की जरूरत नहीं पड़ी। बाद में transplanted kidney ने काम करना शुरू कर दिया, लेकिन जांच में immune rejection के संकेत नहीं मिले।
इसके बाद Andrews को एक मृत मानव donor की kidney transplant की गई। बाद की जांच में यह भी सामने आया कि pig kidney के साथ रहने के कारण मानव kidney transplant की सफलता पर कोई स्पष्ट नकारात्मक असर नहीं पड़ा।
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क्या इससे खत्म हो सकती है organ shortage? फिलहाल इसका जवाब पूरी तरह हां नहीं है, लेकिन यह research एक नई दिशा जरूर दिखाती है। अगर xenotransplantation लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में ऐसे organs उन मरीजों के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं जिन्हें मानव donor मिलने में काफी समय लग जाता है।
शुरुआत में वैज्ञानिक इसे “bridge therapy” के रूप में देख रहे हैं—यानी मरीज को dialysis से बाहर निकालने के लिए pig kidney का इस्तेमाल किया जाए और जब मानव donor organ उपलब्ध हो, तब उसका transplant किया जाए। आगे चलकर अगर इसकी safety और durability साबित होती है, तो pig kidney खुद एक permanent treatment का विकल्प भी बन सकती है।
अब 33 मरीजों पर होगा बड़ा trial अब इस तकनीक की असली परीक्षा बड़े clinical trial में होगी। eGenesis को अमेरिका में 33 patients के साथ expanded clinical trial शुरू करने की अनुमति मिली है। यह trial कई transplant centres में किया जाना है। कंपनी का लक्ष्य आने वाले वर्षों में इस treatment को regulatory approval दिलाना है। जापान में भी इस तरह के kidney xenotransplant की दिशा में काम चल रहा है।
अभी कई सवालों के जवाब बाकी हालांकि शुरुआती नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अभी ज्यादा research की जरूरत है। सबसे अहम सवाल हैं—क्या pig kidney लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से काम कर सकती है? क्या infection या दूसरे complications का खतरा नियंत्रित किया जा सकता है? और क्या यह treatment लंबे समय तक dialysis या human kidney transplant का सुरक्षित विकल्प बन सकता है?
इन सवालों के जवाब बड़े और लंबे clinical trials से ही मिलेंगे। इंसानी अंगों की कमी के बीच बड़ी उम्मीद किडनी xenotransplantation अभी experimental stage में है, लेकिन शुरुआती सफल मामलों ने इस क्षेत्र में नई उम्मीद पैदा की है। अगर आने वाले trials में इसके long-term safety और effectiveness की पुष्टि होती है, तो genetically engineered animal organs भविष्य में transplant medicine को काफी बदल सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि जेनेटिक बदलाव के जरिए तैयार की गई सूअर की किडनी इंसानी शरीर में महीनों तक काम कर सकती है। अब अगला कदम यह साबित करना है कि इसे सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर मरीजों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
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