बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के कानून एवं न्याय विभाग के सचिव दिलीप एस. घुमारे को अदालत में कथित गलत व्यवहार को लेकर अवमानना नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने 2 सितंबर के आदेश में उनके ऊंची आवाज में बोलने और हाईकोर्ट प्रशासन पर आरोप लगाने को गंभीर माना। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी से अदालत की गरिमा और सम्मान बनाए रखने की उम्मीद होती है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के कानून एवं न्याय विभाग के सचिव दिलीप एस. घुमारे को अदालत की कार्यवाही के दौरान कथित तौर पर ऊंची आवाज में बोलने और अदालत के प्रति अनुचित व्यवहार करने के मामले में अवमानना नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने 2 सितंबर को दिए आदेश में उनके व्यवहार पर नाराजगी जताई। मुंबई में हुई सुनवाई के दौरान घुमारे के कथित व्यवहार को लेकर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि खुले कोर्ट में इस तरह का बर्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता और न्यायिक पद पर बैठे अधिकारी से अदालत की गरिमा बनाए रखने की उम्मीद की जाती है।
कोर्ट में व्यवहार को लेकर नाराजगी मामला अदालत की कार्यवाही के दौरान दिलीप एस. घुमारे के आचरण से जुड़ा है। कोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान उनका रवैया आक्रामक था। उन्होंने ऊंची आवाज में बात की और हाईकोर्ट प्रशासन को लेकर आरोप भी लगाए। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस व्यवहार को गंभीरता से लिया। 2 सितंबर को जारी आदेश में कोर्ट ने कहा कि खुले न्यायालय में मौजूद लोगों के सामने इस तरह का व्यवहार “पूरी तरह अक्षम्य” है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को कोर्ट को कम महत्व वाला या बेकार नहीं समझना चाहिए। न्यायालय के अधिकार और उसकी गरिमा का सम्मान करना जरूरी है।
न्यायिक पद की जिम्मेदारी भी अहम कोर्ट ने अपने आदेश में कानून एवं न्याय विभाग में प्रधान सचिव या सचिव के पद की भूमिका का भी जिक्र किया। यह पद सरकार और न्यायपालिका के बीच कामकाज में अहम माना जाता है।
अदालत ने माना कि किसी मामले को लेकर अधिकारी और कोर्ट के बीच अलग राय हो सकती है। किसी फैसले या मामले के किसी हिस्से को लेकर असहमति भी हो सकती है। लेकिन ऐसी असहमति के चलते अदालत के प्रति गलत तरीके से व्यवहार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने साफ किया कि न्यायिक अधिकारी के पद पर रहने वाले व्यक्ति से अदालत के प्रति सम्मान और उचित व्यवहार की उम्मीद रहती है। कोर्ट की कार्यवाही के दौरान संस्थान की गरिमा का ध्यान रखना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
अवमानना नोटिस क्यों अहम है बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से अवमानना नोटिस जारी किए जाने का मतलब है कि अदालत ने घुमारे के कथित व्यवहार को लेकर उनसे जवाब मांगने की प्रक्रिया शुरू की है। अब मामले में आगे की सुनवाई के दौरान उनके आचरण से जुड़े पहलुओं पर विचार किया जाएगा। अवमानना की कार्रवाई अदालत के कामकाज और उसके अधिकार के सम्मान से जुड़े मामलों में की जाती है। इस मामले में कोर्ट ने खास तौर पर कार्यवाही के दौरान हुए व्यवहार को लेकर अपनी नाराजगी दर्ज की है। फिलहाल मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया बाकी है। अदालत घुमारे के कथित व्यवहार और उस दौरान हुई घटनाओं से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार करेगी।
कोर्ट की गरिमा पर दिया जोर इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणियां अदालत में व्यवहार को लेकर एक साफ संदेश देती हैं। कोर्ट ने माना कि किसी भी अधिकारी को अपने पद की जिम्मेदारी समझते हुए न्यायालय के साथ सम्मानजनक तरीके से पेश आना चाहिए। महाराष्ट्र के कानून एवं न्याय विभाग के सचिव दिलीप एस. घुमारे को जारी यह अवमानना नोटिस अब आगे की कार्रवाई का आधार बनेगा। अदालत उनके पक्ष को सुनने के बाद मामले में आगे फैसला करेगी।
मामले की अगली प्रक्रिया में यह देखा जाएगा कि सुनवाई के दौरान उनके व्यवहार को लेकर कोर्ट की ओर से लगाए गए आरोपों पर उनका क्या जवाब रहता है। अभी इस मामले में अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
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