अगस्त 2006 में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह (Dwarf Planet) घोषित किया था। इसके 20 साल बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि आखिर प्लूटो को ग्रह क्यों नहीं माना जाता और क्या भविष्य में उसे फिर से ग्रह का दर्जा मिल सकता है? 1930 में खोजे जाने के बाद प्लूटो को लंबे समय तक सौरमंडल का नौवां ग्रह माना गया। लेकिन 2005 में प्लूटो के लगभग समान आकार की एक दूर की खगोलीय वस्तु की खोज ने वैज्ञानिकों के सामने ग्रह की परिभाषा को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी। इस वस्तु को बाद में एरिस (Eris) नाम दिया गया।
अगस्त 2006 में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह (Dwarf Planet) घोषित किया था। इसके 20 साल बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि आखिर प्लूटो को ग्रह क्यों नहीं माना जाता और क्या भविष्य में उसे फिर से ग्रह का दर्जा मिल सकता है? 1930 में खोजे जाने के बाद प्लूटो को लंबे समय तक सौरमंडल का नौवां ग्रह माना गया। लेकिन 2005 में प्लूटो के लगभग समान आकार की एक दूर की खगोलीय वस्तु की खोज ने वैज्ञानिकों के सामने ग्रह की परिभाषा को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी। इस वस्तु को बाद में एरिस (Eris) नाम दिया गया।
अगर प्लूटो को ग्रह माना जाता, तो एरिस जैसी दूसरी वस्तुओं को भी ग्रह मानने का सवाल उठता। इसी वजह से वैज्ञानिकों के सामने यह तय करना जरूरी हो गया कि किसी खगोलीय पिंड को ग्रह कहने के लिए कौन-सी शर्तें पूरी होनी चाहिए।
ग्रह बनने के लिए तय की गईं तीन शर्तें 2006 में IAU ने सौरमंडल के ग्रहों की पहचान के लिए तीन मुख्य शर्तें तय कीं। किसी पिंड को ग्रह माने जाने के लिए उसे सूर्य जैसे किसी तारे की परिक्रमा करनी चाहिए, उसका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत होना चाहिए कि वह लगभग गोल आकार ले सके और उसने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य समान आकार की वस्तुओं से काफी हद तक साफ कर दिया हो।
प्लूटो पहली दो शर्तें पूरी करता है, लेकिन तीसरी शर्त पर वह खरा नहीं उतरता। प्लूटो नेपच्यून से आगे काइपर बेल्ट में स्थित है, जहां उसके आसपास कई अन्य बर्फीले पिंड मौजूद हैं। इसी आधार पर प्लूटो को ग्रह की जगह बौना ग्रह माना गया।
बौना ग्रह और ग्रह में क्या अंतर है? बौना ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा करता है और उसका गुरुत्वाकर्षण उसे लगभग गोल आकार दे सकता है। लेकिन वह अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र पर ग्रह जैसा प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाया होता। प्लूटो के अलावा एरिस, सेडना, माकेमाके और सेरेस जैसी खगोलीय वस्तुएं भी इसी चर्चा से जुड़ी हैं। खगोलभौतिकविद् डेविड गेरडेस के अनुसार, अगर प्लूटो को ग्रह का दर्जा दिया जाता है, तो इन दूसरी वस्तुओं को ग्रह मानने का सवाल भी सामने आएगा।
प्लूटो को लेकर बहस अभी खत्म क्यों नहीं हुई? प्लूटो की बहस सिर्फ उसके आकार को लेकर नहीं है। असली सवाल यह है कि ग्रह की वैज्ञानिक परिभाषा क्या होनी चाहिए। सौरमंडल के बारे में वैज्ञानिकों की समझ नई खोजों के साथ लगातार बदलती रही है। इसका एक उदाहरण सेरेस, पल्लास और वेस्ता जैसी वस्तुएं हैं। 19वीं सदी में इन्हें भी ग्रह माना जाता था, लेकिन बाद में उसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में क्षुद्रग्रह मिलने के बाद यह समझ बनी कि ये एक बड़े क्षुद्रग्रह समूह का हिस्सा हैं।
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प्लूटो के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थिति सामने आई। उसके जैसे कई पिंड मिलने के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया कि ग्रह की श्रेणी कितनी व्यापक होनी चाहिए। क्या प्लूटो फिर बन सकता है ग्रह? फिलहाल IAU की आधिकारिक परिभाषा के अनुसार प्लूटो बौना ग्रह है। हालांकि, उसे दोबारा ग्रह का दर्जा देने की मांग समय-समय पर उठती रही है।
इस पूरी बहस का केंद्र यही सवाल है कि किसी पिंड की ग्रह के रूप में पहचान केवल उसके आकार और सूर्य की परिक्रमा से तय होनी चाहिए या उसकी कक्षा के आसपास मौजूद अन्य वस्तुओं पर उसका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव भी जरूरी होना चाहिए। प्लूटो की कहानी यह दिखाती है कि अंतरिक्ष में नई खोजों के साथ वैज्ञानिकों को पुरानी परिभाषाओं पर भी दोबारा विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल आधिकारिक तौर पर प्लूटो बौना ग्रह है, लेकिन उसे लेकर वैज्ञानिक बहस अब भी जारी है।
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