वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा महत्वपूर्ण गीत है। 1937 में कांग्रेस ने मिश्रित सभाओं में इसके केवल पहले दो अंतरे गाने का फैसला किया था, क्योंकि बाकी अंतरों में धार्मिक संदर्भ थे। अब सभी छह अंतरों को लेकर फिर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।
वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक अहम गीत रहा है। कांग्रेस ने अपने कार्यक्रमों में इसके पहले दो अंतरे गाने की परंपरा का समर्थन किया है, जबकि बीजेपी लंबे समय से इसके सभी छह अंतरे गाने की बात कहती रही है। आखिर बाकी चार अंतरों को लेकर विवाद क्यों हुआ और 1937 में कांग्रेस ने क्या फैसला लिया था? वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी। बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। 1905 से 1908 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ और आजादी की लड़ाई से जुड़ गया।
1937 में कांग्रेस ने लिया था फैसला वंदे मातरम् को लेकर उस समय कांग्रेस के अंदर भी चर्चा हुई थी। सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने इस मामले में रवींद्रनाथ टैगोर की राय भी ली थी।
टैगोर का मानना था कि गीत के शुरुआती हिस्से में देश के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना है। लेकिन पूरी रचना को उसके संदर्भ के साथ देखने पर इसके कुछ हिस्सों की ऐसी व्याख्या हो सकती है, जिससे मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत हों।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया कि राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे गाए जाएं। कांग्रेस का कहना था कि बाकी अंतरे ज्यादा प्रचलित नहीं थे और उनमें ऐसे धार्मिक संदर्भ थे जिन्हें सभी समुदायों के लिए सहज मानना मुश्किल हो सकता था।
गांधी भी विवाद से बचने के पक्ष में थे महात्मा गांधी वंदे मातरम् को पसंद करते थे और इसे आजादी की लड़ाई का अहम हिस्सा मानते थे। लेकिन उनका यह भी मानना था कि किसी साझा सभा में इस गीत की वजह से विवाद नहीं होना चाहिए। 1939 में गांधी ने कहा था कि अगर किसी मिली-जुली सभा में कोई व्यक्ति वंदे मातरम् के गाए जाने पर आपत्ति करता है, तो गीत का गायन रोक देना चाहिए। उनका जोर इस बात पर था कि गीत लोगों को जोड़ने का काम करे, विवाद बढ़ाने का नहीं।
बाकी चार अंतरों में क्या है? वंदे मातरम् के बाद के अंतरों में कई धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है। एक अंतरे में मातृभूमि की रक्षा के लिए करोड़ों भुजाओं और हथियारों की बात आती है।
इसके बाद के हिस्सों में मातृभूमि की तुलना मंदिरों और धार्मिक जगहों से की गई है। आगे दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का भी जिक्र आता है।
यही हिस्सा विवाद की मुख्य वजह बना। कुछ मुस्लिम विद्वानों का कहना रहा है कि देश को देवी के रूप में देखना इस्लाम की एकेश्वरवाद की मान्यता से मेल नहीं खाता। ‘आनंदमठ’ की कहानी में संघर्ष और युद्ध का संदर्भ भी है।
इसी वजह से पहले दो अंतरों को ज्यादा लोगों के बीच गाने के लिए उपयुक्त माना गया। इन हिस्सों में मातृभूमि के प्रति प्रेम और सम्मान की बात प्रमुख रूप से सामने आती है।
आजादी के बाद क्या हुआ? 1947 में देश आजाद होने के बाद वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बनाने की मांग भी उठी। संविधान सभा में इस पर अलग-अलग राय थी। जवाहरलाल नेहरू उन नेताओं में थे जो ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में पसंद करते थे।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा। साथ ही वंदे मातरम् को भी स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी अहम भूमिका के लिए समान सम्मान दिया जाएगा। इसके बाद ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान बना और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला।
फिर क्यों बढ़ी बहस? वंदे मातरम् को लेकर अब फिर राजनीतिक बहस तेज हुई है। केंद्र सरकार ने आधिकारिक कार्यक्रमों में इसके सभी छह अंतरे गाने को लेकर प्रोटोकॉल जारी किया है।
2026 में राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बदलाव के जरिए वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान कानूनी सुरक्षा देने का प्रावधान भी किया गया है। इसके तहत जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन को रोकना या इसे गाने वाली सभा में रुकावट डालना अपराध माना गया है।
कांग्रेस का कहना है कि 1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिए जाने के समय पहले दो अंतरे गाने की परंपरा पहले से चली आ रही थी। पार्टी का यह भी कहना है कि बाद में सभी छह अंतरे आधिकारिक तौर पर लागू करने का फैसला संसद की औपचारिक मंजूरी के बिना किया गया।
वंदे मातरम् का इतिहास भारत की आजादी की लड़ाई से गहराई से जुड़ा है। इसके पहले दो अंतरे देश के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना पर केंद्रित हैं, जबकि बाकी अंतरों में धार्मिक प्रतीकों और संघर्ष से जुड़े संदर्भ हैं। यही वजह है कि इस गीत को लेकर 1937 से बहस चली आ रही है और आज भी इसके सभी अंतरे गाने को लेकर अलग-अलग राजनीतिक राय सामने आती रहती है।
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