जमशेदपुर से करीब 20 किलोमीटर दूर भितरदारी इलाके में मिली करीब 3.497 अरब साल पुरानी चट्टान ने पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। वैज्ञानिकों को इस चट्टान में कार्बन से जुड़े ऐसे संकेत मिले हैं, जिन्हें प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के अवशेष माना जा रहा है। इस खोज का नेतृत्व भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी GSI की वैज्ञानिक त्रिस्रोता चौधरी और उनके सहयोगियों ने किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह खोज पृथ्वी पर जीवन का अब तक का सबसे पुराना सीधे दिनांकित प्रमाण हो सकती है।
जमशेदपुर से करीब 20 किलोमीटर दूर भितरदारी इलाके में मिली करीब 3.497 अरब साल पुरानी चट्टान ने पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। वैज्ञानिकों को इस चट्टान में कार्बन से जुड़े ऐसे संकेत मिले हैं, जिन्हें प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के अवशेष माना जा रहा है।
इस खोज का नेतृत्व भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी GSI की वैज्ञानिक त्रिस्रोता चौधरी और उनके सहयोगियों ने किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह खोज पृथ्वी पर जीवन का अब तक का सबसे पुराना सीधे दिनांकित प्रमाण हो सकती है।
2014 में पहली बार नजर आए थे काले निशान इस खोज की कहानी करीब 12 साल पुरानी है। वर्ष 2014 में त्रिस्रोता चौधरी ने जमशेदपुर से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण में भितरदारी के पास मौजूद प्राचीन चट्टानों में काले और सफेद रंग के कुछ अलग तरह के निशान देखे थे।
चट्टान पर दिखाई देने वाली बेहद पतली काली पट्टियों ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा। शुरुआती तौर पर यह संभावना जताई गई कि इन काले हिस्सों में मौजूद कार्बन किसी पुराने जैविक पदार्थ से जुड़ा हो सकता है। इसके बाद इन चट्टानों के नमूनों पर लंबे समय तक जांच और वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। कई तरह के विश्लेषण के बाद शोधकर्ताओं ने इन काली परतों को प्राचीन माइक्रोबियल मैट्स से जोड़ने की संभावना जताई है।
माइक्रोबियल मैट्स का मतलब सूक्ष्मजीवों की ऐसी सामूहिक परतों से है, जो लंबे समय तक एक जगह पर रहकर जमा हो सकती हैं। आज भी कुछ जलमग्न और विशेष वातावरण में ऐसे सूक्ष्मजीवी समूह देखे जाते हैं।
चट्टान की उम्र करीब 3.497 अरब साल शोध में जिस चर्ट चट्टान का अध्ययन किया गया है, उसकी उम्र करीब 3.497 अरब साल बताई गई है। चर्ट सिलिका से भरपूर एक प्रकार की चट्टान होती है और प्राचीन भूगर्भीय इतिहास को समझने में ऐसी चट्टानों का काफी महत्व है।
वैज्ञानिकों ने चट्टान में मौजूद कार्बन की संरचना और उसके रासायनिक संकेतों का अध्ययन किया। इसके लिए लेजर रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
Disclaimer
Disclaimer :
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI. अस्वीकरण: तस्वीरें केवल उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल की गई हैं। तस्वीरों में कुछ बदलाव या संपादन AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से किया गया है।
Published by: Zoya. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.
इन जांचों का मकसद यह समझना था कि चट्टान में मौजूद कार्बन जैविक गतिविधि से जुड़ा हो सकता है या वह किसी सामान्य भूगर्भीय प्रक्रिया का परिणाम है। अध्ययन में मिले संकेतों को शोधकर्ताओं ने प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन से जोड़ा है।
इस खोज की खास बात यह है कि जिस चट्टान में कथित माइक्रोबियल मैट्स के संकेत मिले हैं, उसी चट्टान के नमूने की उम्र भी निर्धारित की गई है। इसी वजह से इसे पुराने जीवन के प्रमाण से जुड़े दूसरे दावों की तुलना में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पृथ्वी पर जीवन कब शुरू हुआ? पृथ्वी की उम्र करीब 4.6 अरब साल मानी जाती है। लेकिन पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कब हुई, इसका सटीक जवाब अभी भी वैज्ञानिकों के पास नहीं है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से बहुत पुरानी चट्टानों में जीवन के संभावित प्रमाण मिलने के दावे सामने आते रहे हैं। कनाडा के क्यूबेक में करीब 3.9 अरब साल पुराने संभावित जैविक संकेतों की चर्चा हुई है। ग्रीनलैंड में करीब 3.7 अरब साल पुराने प्रमाणों का अध्ययन हुआ है, जबकि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया से करीब 3.4 अरब साल पुराने संभावित जीवन के संकेत मिले हैं।
समस्या यह है कि अरबों साल पुरानी चट्टानों में जीवन और प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रियाओं से बने निशानों के बीच अंतर करना आसान नहीं होता। गर्मी, दबाव, रासायनिक बदलाव और दूसरी भूगर्भीय प्रक्रियाएं भी ऐसे आकार या रासायनिक संकेत बना सकती हैं, जिन्हें पहली नजर में जैविक समझ लिया जाए।
इसी वजह से भितरदारी की चट्टान पर हुई जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां चट्टान की उम्र और उसमें मौजूद कार्बन से जुड़े संकेतों का एक साथ अध्ययन किया गया है।
3.5 अरब साल पहले कैसा था जीवन? अगर शोधकर्ताओं की व्याख्या सही साबित होती है, तो करीब 3.5 अरब साल पहले पृथ्वी पर सूक्ष्मजीवी जीवन मौजूद था। उस समय पृथ्वी आज की तरह नहीं थी। वातावरण, समुद्र और भूगर्भीय परिस्थितियां काफी अलग थीं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ये सूक्ष्मजीव किसी प्राचीन जलमग्न वातावरण में रहते रहे होंगे। संभव है कि ये सूक्ष्मजीव कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बनिक पदार्थ बनाने जैसी रासायनिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करते रहे हों।
हालांकि, इस खोज का मतलब यह नहीं है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत ठीक 3.5 अरब साल पहले हुई थी। यह केवल इस बात का संकेत देता है कि उस समय तक पृथ्वी पर जीवन मौजूद था। जीवन इससे भी पहले शुरू हुआ हो सकता है, लेकिन उसके पुराने प्रमाण आज की चट्टानों में सुरक्षित न रहे हों या अभी तक वैज्ञानिकों को न मिले हों।
सिंहभूम की चट्टानें क्यों हैं खास? झारखंड का सिंहभूम क्षेत्र पृथ्वी की बहुत पुरानी चट्टानों के लिए जाना जाता है। यहां मौजूद कुछ चट्टानों की उम्र करीब 3.5 अरब साल तक आंकी गई है।
इतनी पुरानी चट्टानों का अध्ययन वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके जरिए पृथ्वी के शुरुआती दौर के वातावरण के बारे में जानकारी मिल सकती है। इन चट्टानों में उस समय के समुद्र और ज्वालामुखीय गतिविधियों से जुड़े संकेत भी देखे गए हैं।
वैज्ञानिकों के बीच लंबे समय से यह संभावना रही है कि पृथ्वी पर शुरुआती जीवन समुद्र के भीतर ज्वालामुखीय गतिविधियों के आसपास के वातावरण में विकसित हुआ होगा। ऐसे स्थानों पर खनिज, गर्मी और रासायनिक ऊर्जा मौजूद होती है, जो शुरुआती जीवन के लिए उपयोगी हो सकती थी।
भितरदारी में मिली चट्टान इसी प्राचीन वातावरण की एक झलक दे सकती है। अगर इसमें मिले संकेतों की वैज्ञानिक व्याख्या आगे के अध्ययनों में भी मजबूत होती है, तो इससे शुरुआती पृथ्वी और उस समय मौजूद सूक्ष्मजीवी जीवन को समझने में मदद मिलेगी।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? यह खोज केवल पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत से जुड़े सवालों के कारण महत्वपूर्ण नहीं है। इससे भारत के प्राचीन भूगर्भीय इतिहास का महत्व भी सामने आता है।
करीब 3.5 अरब साल पुरानी चट्टानों में जीवन के संभावित संकेतों की पहचान करना आसान काम नहीं है। इतने लंबे समय में चट्टानें कई भूगर्भीय बदलावों से गुजरती हैं। इसके बावजूद अगर जैविक गतिविधि के संकेत सुरक्षित रह गए हैं, तो वे शुरुआती पृथ्वी की परिस्थितियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं।
जमशेदपुर के पास मिली यह चट्टान इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें मौजूद काली परतों को संभावित माइक्रोबियल मैट्स से जोड़ा गया है और चट्टान की उम्र करीब 3.497 अरब साल बताई गई है।
क्या इससे जीवन की शुरुआत का जवाब मिल गया? अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा। यह खोज पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती इतिहास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देती है, लेकिन इससे जीवन की शुरुआत की निश्चित तारीख तय नहीं होती।
प्राचीन चट्टानों में मिले जैविक संकेतों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों को अलग-अलग तरीकों से जांच करनी पड़ती है। खासकर यह देखना जरूरी होता है कि मिले रासायनिक संकेत वास्तव में जीवों की गतिविधि से बने हैं या किसी प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रिया के कारण।
भितरदारी की चट्टान पर हुए अध्ययन ने इस दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। आगे के शोध से यह समझने में मदद मिल सकती है कि इन काली परतों की असली प्रकृति क्या थी और करीब 3.5 अरब साल पहले यहां किस तरह का वातावरण मौजूद था।
सरल शब्दों में कहें तो जमशेदपुर के पास मिली यह बेहद पुरानी चट्टान पृथ्वी के उस दौर की कहानी अपने भीतर छिपाए हुए हो सकती है, जब जीवन अपने शुरुआती चरण में था। अगर इन संकेतों की वैज्ञानिक पुष्टि आगे भी होती है, तो सिंहभूम की यह चट्टान पृथ्वी पर शुरुआती जीवन के अध्ययन में बेहद महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकती है।
जमशेदपुर, भितरदारी, सिंहभूम, 3.5 अरब साल पुरानी चट्टान, प्राचीन जीवन, सबसे पुराना जीवन प्रमाण, माइक्रोबियल मैट्स, त्रिस्रोता चौधरी, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, GSI, प्राचीन सूक्ष्मजीव, पृथ्वी पर जीवन
Jamshedpur, Bhitardari, Singhbhum, 3.5 arab saal purani chattaan, pracheen jeevan, sabse purana jeevan pramaan, microbial mats, Trisrota Chowdhury, pracheen sookshmajeev, dharti par jeevan
जमशेदपुर के पास 3.5 अरब साल पुरानी चट्टान में जीवन के संकेत, भितरदारी में मिली प्राचीन चट्टान और माइक्रोबियल मैट्स, सिंहभूम में मिले पृथ्वी के सबसे पुराने जीवन के संभावित प्रमाण, 3.497 billion year old rock Jamshedpur, oldest directly dated evidence of life on Earth, ancient microbial life in Singhbhum
जमशेदपुर, झारखंड, सिंहभूम, विज्ञान, प्राचीन जीवन, पृथ्वी, GSI, माइक्रोबियल मैट्स, NetGramNews, NetGram News