इज़राइल की स्थापना 1948 में हुई और इसके बाद से फिलिस्तीन के साथ जमीन, विस्थापन, कब्जे और स्वतंत्रता को लेकर लंबा विवाद चला आ रहा है। 1967 के बाद वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा इस संघर्ष के प्रमुख केंद्र बने। गाजा में युद्ध के कारण बड़ी संख्या में लोग मारे गए, घायल हुए और विस्थापित हुए, जबकि भोजन, पानी, स्वास्थ्य और आश्रय जैसी जरूरी सुविधाओं का संकट भी गंभीर रहा। इज़राइल पर नरसंहार के आरोप भी लगाए गए हैं और इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कानूनी कार्यवाही हुई है।
इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद दुनिया के सबसे लंबे और जटिल राजनीतिक संघर्षों में से एक है। इसके पीछे जमीन, राष्ट्रीय पहचान, सुरक्षा, विस्थापन, धार्मिक महत्व और फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं। पिछले वर्षों में खासकर गाजा में सैन्य कार्रवाई, बड़े पैमाने पर विस्थापन और नागरिकों की स्थिति ने इस संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और गंभीर बना दिया है। इस विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि इज़राइल की स्थापना, 1967 के बाद का कब्जा, वेस्ट बैंक में बस्तियों का विस्तार, गाजा की स्थिति और फिलिस्तीनियों के अधिकारों से जुड़े सवाल एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं।
इज़राइल की राजधानी, मुद्रा और शासन इज़राइल पश्चिम एशिया में भूमध्यसागर के पूर्वी किनारे पर स्थित देश है। इसकी सरकार यरुशलम को राजधानी मानती है, हालांकि शहर की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय से विवादित है। इज़राइल की मुद्रा इज़राइली न्यू शेकेल (Israeli New Shekel) है। देश में संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है और राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष जबकि प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख होते हैं। इज़राइल की आधुनिक राजनीति को समझने के लिए यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि फिलिस्तीन का प्रश्न उसके इतिहास और सुरक्षा नीति का केंद्रीय मुद्दा रहा है।
इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद कैसे शुरू हुआ? 20वीं सदी में इस क्षेत्र में यहूदी और अरब दोनों समुदायों के राष्ट्रीय आंदोलनों ने राजनीतिक रूप लिया। ब्रिटिश शासन के दौर में फिलिस्तीन में यहूदी आबादी बढ़ी और अरब फिलिस्तीनियों के साथ जमीन तथा राजनीतिक अधिकारों को लेकर तनाव बढ़ता गया। 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने ब्रिटिश फिलिस्तीन को एक यहूदी और एक अरब राज्य में बांटने की योजना प्रस्तावित की। यह योजना अरब पक्ष ने स्वीकार नहीं की। 1948 में इज़राइल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और इसके बाद युद्ध हुआ। इस युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी अपने घरों से विस्थापित हुए। फिलिस्तीनी इस घटना को नकबा यानी तबाही के नाम से याद करते हैं।
1967 के बाद क्या हुआ? 1967 के छह दिवसीय युद्ध के बाद इज़राइल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा सहित कई क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया। बाद के दशकों में इन क्षेत्रों की स्थिति अंतरराष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी रही। वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में इज़राइली बस्तियों के विस्तार को संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में लगातार विवादित किया गया है। 2024 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने अपनी सलाहकारी राय में कहा कि इज़राइल की कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में लगातार मौजूदगी गैरकानूनी है। न्यायालय ने नई इज़राइली बस्तियों को रोकने और कब्जे वाले क्षेत्र से बसने वालों को हटाने की बात भी कही।
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क्या इज़राइल फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा कर रहा है? यह सवाल सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ा है। ICJ ने 2024 की सलाहकारी राय में कहा कि वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में इज़राइली बस्तियों, संबंधित ढांचे और अन्य नीतियों ने फिलिस्तीनी क्षेत्र पर इज़राइल के नियंत्रण को मजबूत किया है। न्यायालय ने इन नीतियों को बड़े हिस्से के विलय यानी annexation की दिशा में प्रभाव डालने वाला बताया। न्यायालय ने यह भी कहा कि बल के जरिए किसी क्षेत्र पर संप्रभुता हासिल करना अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांत के खिलाफ है और इज़राइल का कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में लगातार रहना गैरकानूनी है। इसलिए यह कहना ज्यादा सटीक है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अनुसार इज़राइल की कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में निरंतर मौजूदगी और उससे जुड़ी कुछ नीतियां अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती हैं।
फिलिस्तीन के मुख्य क्षेत्र कौन से हैं? फिलिस्तीनी क्षेत्र मुख्य रूप से दो हिस्सों से जुड़े हैं: वेस्ट बैंक: यह क्षेत्र इज़राइल के पूर्व में स्थित है और इसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है, जिसे फिलिस्तीनी भविष्य के राज्य की राजधानी के रूप में देखते हैं। गाजा पट्टी: भूमध्यसागर के किनारे स्थित यह छोटा और अत्यधिक घनी आबादी वाला क्षेत्र है। 2007 से यहां हमास का वास्तविक नियंत्रण रहा है। इज़राइल ने 2005 में गाजा के अंदर से अपने स्थायी सैनिक और बस्तियां हटाई थीं, लेकिन ICJ ने 2024 में कहा कि इसके बावजूद इज़राइल ने सीमा, आवाजाही और कुछ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ऐसा प्रभाव बनाए रखा जिससे कब्जे के कानून के तहत उसकी कुछ जिम्मेदारियां बनी रहीं।
गाजा में युद्ध और आम लोगों की स्थिति 7 अक्टूबर 2023 को हमास और अन्य सशस्त्र समूहों ने इज़राइल पर बड़ा हमला किया, जिसमें इज़राइली नागरिकों और सुरक्षा बलों की मौत हुई और लोगों को बंधक बनाया गया। इसके बाद इज़राइल ने गाजा में व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। युद्ध के दौरान गाजा में बड़ी संख्या में लोग मारे गए, घायल हुए और विस्थापित हुए। अस्पतालों, घरों, स्कूलों और अन्य नागरिक ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के कार्यालय (OCHA) की जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, गाजा में लगातार सैन्य गतिविधियों, विस्थापन और आवाजाही पर प्रतिबंधों के कारण मानवीय स्थिति गंभीर बनी हुई थी। लोगों के लिए सुरक्षित पानी, स्वास्थ्य सेवाओं, आश्रय और अन्य जरूरी सुविधाओं तक पहुंच में भी समस्याएं बनी हुई थीं। वेस्ट बैंक में भी इज़राइली सैन्य कार्रवाई, घरों का ध्वस्तीकरण, बस्तियों का विस्तार, आवाजाही पर प्रतिबंध और बसने वालों की हिंसा के कारण फिलिस्तीनी नागरिकों के विस्थापन और सुरक्षा संबंधी समस्याएं जारी रही हैं।
क्या गाजा में नरसंहार यानी Genocide हुआ है? Genocide यानी नरसंहार अंतरराष्ट्रीय कानून में बहुत गंभीर कानूनी शब्द है। इसका अर्थ किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्ली या धार्मिक समूह को पूरी तरह या उसके किसी बड़े हिस्से को नष्ट करने के इरादे से किए गए विशेष कृत्यों से है। इज़राइल के खिलाफ गाजा में नरसंहार का आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया है और इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला भी चल रहा है। लेकिन किसी भी पक्ष के आरोप और अंतिम न्यायिक फैसला एक ही चीज नहीं होते। इसलिए किसी रिपोर्ट में यह लिखना अधिक जिम्मेदार होगा कि “इज़राइल पर गाजा में नरसंहार के आरोप लगे हैं और इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कानूनी कार्यवाही हुई है”, न कि बिना अंतिम न्यायिक निर्णय के इसे अंतिम रूप से स्थापित तथ्य बताना। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इज़राइल अपने सैन्य अभियानों को हमास के हमलों के बाद अपनी सुरक्षा और आत्मरक्षा के संदर्भ में उचित ठहराता रहा है। लेकिन आत्मरक्षा का दावा भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों को समाप्त नहीं करता।
फिलिस्तीनियों पर किस तरह के अत्याचार के आरोप हैं? संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में गाजा में सैन्य हमलों, विस्थापन, आवश्यक सेवाओं की कमी और मानवीय सहायता तक सीमित पहुंच की गंभीर स्थिति दर्ज की गई है। वेस्ट बैंक में भी घरों के ध्वस्तीकरण, भूमि से विस्थापन, आवाजाही पर प्रतिबंध, सैन्य अभियानों और बसने वालों की हिंसा को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गई हैं। जुलाई 2026 की OCHA रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में बसने वालों के हमले फिलिस्तीनियों के घायल होने और विस्थापन के प्रमुख कारणों में शामिल रहे। इन घटनाओं का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ता है, जिनमें बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और पहले से विस्थापित परिवार शामिल हैं।
इज़राइली बस्तियों का विवाद क्या है? वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में इज़राइली बस्तियों का विस्तार लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय है। ICJ ने 2024 में कहा कि कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में इज़राइली बस्तियां और उनसे जुड़ी व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती है। न्यायालय ने इज़राइल को नई बस्ती गतिविधियां तुरंत रोकने और कब्जे वाले क्षेत्र में मौजूद बसने वालों को हटाने की जिम्मेदारी बताई। यही वजह है कि फिलिस्तीनी पक्ष और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बस्तियों को फिलिस्तीनी राज्य बनने की संभावना और क्षेत्रीय निरंतरता के लिए बड़ी समस्या मानती हैं।
फिलिस्तीनियों का मुख्य दावा क्या है? फिलिस्तीनी नेतृत्व और जनता का प्रमुख दावा अपने स्वतंत्र राज्य और आत्मनिर्णय के अधिकार से जुड़ा है। आम तौर पर प्रस्तावित दो-राष्ट्र समाधान में इज़राइल और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के साथ रहने की बात की जाती है। ICJ ने भी 2024 की अपनी राय में फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को महत्वपूर्ण माना और कहा कि इज़राइली नीतियां तथा क्षेत्र का विखंडन इस अधिकार के इस्तेमाल में बाधा डाल रहे हैं।
इज़राइल का पक्ष क्या है? इज़राइल का कहना है कि उसकी सुरक्षा चिंताएं वास्तविक हैं और 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद हमास से अपने नागरिकों की रक्षा करना उसका अधिकार है। इज़राइल हमास को एक सशस्त्र संगठन मानता है और गाजा में सैन्य कार्रवाई को बंधकों की वापसी तथा सुरक्षा से जोड़ता है। दूसरी ओर, फिलिस्तीनी पक्ष का कहना है कि दशकों से चले आ रहे कब्जे, बस्तियों के विस्तार, आवाजाही पर प्रतिबंध और सैन्य नियंत्रण ने फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसलिए संघर्ष को केवल एक सैन्य घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे दशकों पुराना राजनीतिक और क्षेत्रीय विवाद भी है।
दुनिया इस विवाद को कैसे देखती है? अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इज़राइल और फिलिस्तीन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण हैं। कई देश इज़राइल की सुरक्षा की चिंता को स्वीकार करते हैं, साथ ही फिलिस्तीनी राज्य और आत्मनिर्णय के अधिकार का भी समर्थन करते हैं। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं ने कब्जे, बस्तियों, नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय कानून से जुड़े मुद्दों पर लगातार चिंता जताई है। ICJ की 2024 की सलाहकारी राय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायालय ने इज़राइल की कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में निरंतर मौजूदगी को गैरकानूनी माना और उसे जल्द से जल्द समाप्त करने की बात कही।
आगे रास्ता क्या हो सकता है? इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष का स्थायी समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं माना जाता। इसमें सुरक्षा, फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय, क्षेत्रीय सीमाएं, यरुशलम, शरणार्थी, बस्तियां और दोनों पक्षों की राजनीतिक आकांक्षाओं जैसे मुद्दों का समाधान जरूरी है। फिलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय जरूरतों को पूरा करना भी तत्काल प्राथमिकता है। साथ ही इज़राइली नागरिकों की सुरक्षा और किसी भी प्रकार के सशस्त्र हमले से उनकी रक्षा भी महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों पक्षों के लिए ऐसा राजनीतिक समाधान निकाला जा सकता है जिसमें सुरक्षा के साथ फिलिस्तीनियों को भी स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय का अधिकार मिले। निष्कर्ष इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष को केवल धर्म या दो देशों की लड़ाई के रूप में समझना अधूरा होगा। यह जमीन, इतिहास, विस्थापन, कब्जे, सुरक्षा और राष्ट्रीय अधिकारों से जुड़ा जटिल विवाद है। गाजा में नागरिकों की भयावह मानवीय स्थिति और वेस्ट बैंक में कब्जे, बस्तियों तथा विस्थापन से जुड़े मुद्दों ने अंतरराष्ट्रीय चिंता को और बढ़ाया है। ICJ ने 2024 में इज़राइल की कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में निरंतर मौजूदगी को गैरकानूनी बताया और बस्ती गतिविधियां रोकने की बात कही। वहीं, 2026 में भी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें गाजा और वेस्ट बैंक में नागरिकों के सामने जारी मानवीय और सुरक्षा संकट को दर्ज कर रही हैं। इस विवाद को समझने के लिए जरूरी है कि फिलिस्तीनी नागरिकों के अधिकारों और पीड़ा को गंभीरता से देखा जाए, लेकिन साथ ही इज़राइली नागरिकों की सुरक्षा और सशस्त्र हमलों के प्रभाव को भी नजरअंदाज न किया जाए। स्थायी समाधान तभी संभव होगा जब दोनों पक्षों के अधिकार, सुरक्षा और राजनीतिक भविष्य को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में संबोधित किया जाए।
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