मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में 17 से 28 अगस्त 2026 तक UNCCD COP17 सम्मेलन होगा। इसमें दुनिया के कई देश जमीन खराब होने, सूखे, पानी की कमी, खेती, मिट्टी की सेहत और पशुपालकों से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा करेंगे। सम्मेलन की थीम “Restoring Land. Restoring Hope.” रखी गई है।
जमीन का खराब होना, सूखा और मरुस्थल बढ़ना अब दुनिया के कई देशों के लिए बड़ी परेशानी बनता जा रहा है। इसका असर खेती, पानी, पशुपालन और लोगों की रोजी-रोटी पर भी पड़ रहा है। इसी समस्या पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र का UNCCD COP17 सम्मेलन 17 से 28 अगस्त 2026 तक मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में होगा। इस सम्मेलन की थीम “Restoring Land.
Restoring Hope. ” यानी खराब हो रही जमीन को फिर से बेहतर बनाना और लोगों के लिए उम्मीद लौटाना रखी गई है। सम्मेलन में दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसमें सरकारों के साथ किसान, पशुपालक, वैज्ञानिक, युवा, कारोबार और समाज से जुड़े लोगों की भी भागीदारी होगी।
बैठक में जमीन को फिर से बेहतर बनाने, सूखे से निपटने, पानी बचाने, खेती को मजबूत करने और मिट्टी की सेहत सुधारने जैसे मुद्दों पर बात होगी।
जमीन खराब होने का असर सिर्फ खेत तक नहीं जमीन खराब होने की समस्या को अक्सर सिर्फ मिट्टी या खेती से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इसका असर काफी दूर तक जाता है। जब जमीन की हालत खराब होती है तो खेती करना मुश्किल हो सकता है। पानी की कमी बढ़ सकती है और पशुपालन पर भी असर पड़ सकता है।
कई ग्रामीण परिवार अपनी रोजी-रोटी के लिए खेती, पशुपालन और जमीन पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में जमीन की हालत बिगड़ने का सीधा असर उनकी कमाई और जीवन पर पड़ सकता है।
सूखे की स्थिति भी इसी समस्या को और बढ़ा सकती है। लंबे समय तक बारिश कम होने पर खेतों में पानी की कमी हो सकती है। पशुओं के लिए चारा और पानी मिलना मुश्किल हो सकता है। इसका असर खाने-पीने की चीजों की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। UNCCD COP17 में इन्हीं जुड़ी हुई समस्याओं पर मिलकर काम करने की कोशिश होगी।
17 से 28 अगस्त तक चलेगा COP17 UNCCD COP17 का आयोजन मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में 17 से 28 अगस्त 2026 तक किया जाएगा। इस बैठक में UNCCD से जुड़े 197 देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग भी सम्मेलन का हिस्सा होंगे।
इसमें सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ वैज्ञानिक, युवा, किसान, छोटे किसान, पशुपालक, आदिवासी समुदायों से जुड़े लोग, कारोबार और समाज से जुड़े संगठन शामिल होंगे। इतने अलग-अलग लोगों की भागीदारी का मकसद जमीन और सूखे से जुड़ी समस्या को अलग-अलग नजरिए से समझना और ऐसे रास्ते तलाशना है, जिन पर जमीन पर काम किया जा सके।
सम्मेलन की थीम क्या है? COP17 की थीम “Restoring Land. Restoring Hope.” है। इसका सीधा मतलब है कि खराब हो रही जमीन को दोबारा बेहतर बनाने के साथ उन लोगों की जिंदगी में भी उम्मीद लौटाना, जो जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं।
किसानों और पशुपालकों के लिए जमीन और पानी का सीधा संबंध उनकी रोजी-रोटी से है। अगर जमीन की हालत अच्छी रहे और पानी की सही व्यवस्था हो तो खेती और पशुपालन को बेहतर तरीके से चलाया जा सकता है। इसी वजह से सम्मेलन में जमीन को बचाने के साथ लोगों की जरूरतों पर भी ध्यान दिया जाएगा।
सूखे से निपटना भी बड़ी चुनौती COP17 में सूखे से निपटने का मुद्दा भी अहम रहेगा। सूखा आने पर सिर्फ पानी की कमी नहीं होती। इसका असर खेतों, पशुओं और उन लोगों पर भी पड़ता है जिनकी कमाई खेती या पशुपालन से होती है।
लंबे समय तक सूखे की स्थिति रहने पर जमीन और ज्यादा खराब हो सकती है। ऐसे में पानी का सही इस्तेमाल, जमीन की देखभाल और सूखे से पहले तैयारी करना जरूरी हो जाता है। सम्मेलन में सूखे से होने वाले नुकसान को कम करने और इससे निपटने की तैयारी बेहतर करने पर चर्चा होगी।
पानी को लेकर भी होगी बात जमीन और पानी का आपस में गहरा संबंध है। जहां पानी की कमी होती है, वहां खेती और पशुपालन दोनों पर असर पड़ सकता है। COP17 के कार्यक्रम में पानी से जुड़े मुद्दे को भी जगह दी गई है। इसमें पानी के सही इस्तेमाल और सूखे से जुड़ी समस्याओं पर बात होगी। पानी की कमी कई जगहों पर जमीन की हालत को और खराब कर सकती है। इसलिए जमीन को बचाने की कोशिश के साथ पानी को संभालना भी जरूरी है। इस बैठक में पानी, जमीन और लोगों के बीच के इस संबंध पर चर्चा की जाएगी।
खेती और खाने की चीजों पर भी असर जमीन की अच्छी हालत खेती के लिए बहुत जरूरी है। अगर मिट्टी की सेहत खराब होती है तो खेती करना मुश्किल हो सकता है। COP17 में खाने की चीजों से जुड़ी व्यवस्था और मिट्टी की सेहत पर भी बात होगी। इसका मकसद ऐसी खेती और जमीन की व्यवस्था पर ध्यान देना है, जिससे आगे भी लोगों के लिए पर्याप्त खाना पैदा किया जा सके।
खेती पर मौसम और पानी की कमी का असर बढ़ने से किसानों के सामने कई तरह की परेशानियां आ सकती हैं। इसलिए जमीन और पानी को बचाने के साथ खेती को भी मजबूत रखना जरूरी है।
चरवाहों और पशुपालकों की समस्या भी चर्चा में मंगोलिया में जमीन और चरागाहों से जुड़े लोगों की बड़ी भूमिका है। इसलिए COP17 में चरागाहों और पशुपालकों से जुड़े मुद्दों को भी खास जगह दी गई है। पशुपालकों के लिए अच्छी जमीन और पर्याप्त चारा जरूरी है। सूखे या जमीन की खराब हालत के कारण चरागाहों पर असर पड़ता है तो पशुपालन मुश्किल हो सकता है। सम्मेलन में पशुपालकों की जरूरतों और चरागाहों की बेहतर देखभाल पर भी चर्चा होगी।
मंगोलिया में सम्मेलन होने का खास मतलब मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में COP17 का आयोजन ऐसे समय हो रहा है, जब जमीन, सूखे और चरागाहों से जुड़ी समस्याओं पर दुनिया का ध्यान बढ़ रहा है।
मंगोलिया में बड़ी संख्या में लोग जमीन और पशुपालन से जुड़े हैं। इसलिए यहां होने वाला यह सम्मेलन स्थानीय लोगों की समस्याओं को भी दुनिया के सामने रखने का मौका देगा।
सम्मेलन में जमीन और सूखे से जुड़ी समस्याओं पर अलग-अलग देशों के अनुभव साझा किए जा सकते हैं। इससे एक-दूसरे से सीखने और मिलकर काम करने के रास्ते खुल सकते हैं।
सिर्फ बैठक नहीं, काम पर जोर COP17 में केवल बातचीत तक सीमित रहने के बजाय जमीन पर काम करने वाले कदमों पर जोर दिया जाएगा। UNCCD के कार्यक्रम में Action Agenda का भी जिक्र है। इसका मकसद बड़े स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों को ऐसे काम से जोड़ना है, जिन्हें जमीन पर लागू किया जा सके।
बैठक में सूखे से निपटने, पानी, चरागाह, पशुपालक, खाने की चीजों और मिट्टी की सेहत जैसे विषयों पर अलग-अलग चर्चा होगी। इसके अलावा जमीन, लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने, रेत और धूल के तूफान जैसे मुद्दों पर भी बात होगी।
जमीन बचाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत जमीन की समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं है। अलग-अलग देशों में इसका असर अलग तरीके से दिखाई देता है, लेकिन खेती, पानी और लोगों की रोजी-रोटी पर इसका असर कई जगह देखा जाता है।
इसी वजह से देशों के बीच मिलकर काम करना जरूरी है। एक देश में अपनाया गया कोई अच्छा तरीका दूसरे देश के लिए भी मददगार हो सकता है, अगर वहां की जरूरत के हिसाब से उसे अपनाया जाए। COP17 में ऐसे ही साझा काम और साझेदारी को आगे बढ़ाने पर जोर रहेगा।
भारत जैसे देशों के लिए भी अहम मुद्दा भारत में बड़ी संख्या में लोग खेती और ग्रामीण कामकाज से जुड़े हैं। ऐसे में जमीन और पानी की हालत का सीधा असर किसानों और ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है।
सूखा पड़ने या जमीन की गुणवत्ता खराब होने पर खेती पर असर पड़ सकता है। पानी की कमी होने पर पशुपालन भी मुश्किल हो सकता है। इसलिए UNCCD COP17 में होने वाली जमीन, पानी, सूखे और खेती से जुड़ी चर्चा भारत जैसे देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अगर अलग-अलग देश जमीन को बचाने, सूखे से निपटने और पानी का बेहतर इस्तेमाल करने के तरीके साझा करते हैं, तो इससे उन देशों को फायदा मिल सकता है जहां ऐसी समस्याएं पहले से मौजूद हैं।
लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा है जमीन का सवाल जमीन को बचाने की बात केवल पर्यावरण की बात नहीं है। इसका सीधा संबंध लोगों की रोजी-रोटी से भी है। किसान खेत से कमाई करते हैं। पशुपालक चरागाह और पानी पर निर्भर रहते हैं। ग्रामीण इलाकों में कई दूसरे काम भी खेती और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े होते हैं।
अगर जमीन की हालत लगातार खराब होती है तो इन लोगों की कमाई पर असर पड़ सकता है। इसलिए जमीन को बेहतर बनाने के साथ उन लोगों की जरूरतों को समझना भी जरूरी है, जो उस जमीन पर निर्भर हैं। COP17 में इसी तरह जमीन और लोगों के बीच के संबंध पर ध्यान दिया जाएगा।
रेत और धूल के तूफान पर भी होगी चर्चा सम्मेलन के कार्यक्रम में रेत और धूल के तूफानों का मुद्दा भी शामिल है। ऐसे तूफान कई इलाकों में लोगों और जमीन दोनों के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। जमीन की खराब हालत और सूखे जैसी समस्याओं के साथ इनका संबंध भी देखा जाता है। COP17 में इस विषय पर भी चर्चा होगी और इससे जुड़ी समस्याओं से निपटने के तरीकों पर बात की जाएगी।
आगे की राह पर नजर 17 से 28 अगस्त तक चलने वाले COP17 में दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रतिनिधि एक जगह जुटेंगे। यहां जमीन, पानी, सूखा, खेती, चरागाह और मिट्टी की सेहत जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। सम्मेलन का मकसद केवल समस्या पर बात करना नहीं, बल्कि ऐसे कामों को आगे बढ़ाना है जिनसे जमीन को बेहतर बनाया जा सके और सूखे से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
“Restoring Land. Restoring Hope.” की थीम के साथ होने वाला यह सम्मेलन जमीन की हालत सुधारने के साथ उन लोगों की जरूरतों पर ध्यान देने का मौका भी देगा, जिनकी जिंदगी खेती, पानी और पशुपालन से जुड़ी है।
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