संसद की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने पीएम नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो हटाए जाने के मामले में मेटा को तीन दिन के भीतर सार्वजनिक माफी मांगने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने को कहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो कुछ समय के लिए हटाए जाने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। संसद की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने मेटा (Meta) को तीन दिन के भीतर सार्वजनिक माफी मांगने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने को कहा है। समिति ने साफ किया है कि अगर कंपनी संतोषजनक जवाब नहीं देती है तो उसके खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हटने के बाद अब यह मामला संसद तक पहुंच गया है। संसद की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने इस मामले को गंभीर माना है और मेटा से जवाब मांगा है। समिति का कहना है कि किसी भी तकनीकी गलती के नाम पर इतनी बड़ी चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि देश के 140 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में उनका वीडियो हटना एक सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मेटा को इस मामले में अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए और लोगों के सामने सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए।
समिति ने कंपनी को तीन दिनों के भीतर जवाब देने के लिए कहा है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि वीडियो आखिर क्यों हटाया गया और इस गलती के लिए कौन जिम्मेदार था। समिति चाहती है कि जिन अधिकारियों की वजह से यह घटना हुई, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाए।
पूरा मामला 23 जुलाई का है। उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर अपना पहला सेल्फी वीडियो शेयर किया था। इस वीडियो में उन्होंने खास तौर पर युवाओं और जनरेशन Z से बात की थी। उन्होंने पेपर लीक जैसी समस्याओं पर सख्त कार्रवाई का भरोसा भी दिया था।
वीडियो इंस्टाग्राम पर सामान्य रूप से दिखाई देता रहा, लेकिन फेसबुक पर कुछ समय के लिए हट गया या लोगों को दिखाई नहीं दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस पर सवाल उठाए। मामला बढ़ने के बाद मेटा ने वीडियो को दोबारा बहाल कर दिया।
वीडियो वापस आने के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। संसदीय समिति का कहना है कि सिर्फ वीडियो बहाल कर देना काफी नहीं है। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि आखिर वीडियो हटा क्यों था और आगे ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
समिति ने साफ शब्दों में कहा है कि मेटा को अपनी पूरी प्रक्रिया की जानकारी देनी होगी। अगर जांच में किसी कर्मचारी या अधिकारी की गलती सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी करनी होगी। बैठक के दौरान समिति ने यह भी कहा कि बड़ी तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी केवल प्लेटफॉर्म चलाने तक सीमित नहीं है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी तरह की तकनीकी गलती से लोगों तक गलत संदेश न पहुंचे।
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा सेफ हार्बर (Safe Harbour) को लेकर हो रही है। समिति ने चेतावनी दी है कि अगर कंपनी ने तय समय में सही जवाब नहीं दिया तो उसके सेफ हार्बर संरक्षण को हटाने की सिफारिश की जा सकती है।
सेफ हार्बर एक कानूनी सुरक्षा है, जो सोशल मीडिया कंपनियों को मिलती है। इसके तहत अगर कोई उपयोगकर्ता किसी प्लेटफॉर्म पर कोई सामग्री पोस्ट करता है, तो हर मामले में कंपनी को सीधे जिम्मेदार नहीं माना जाता। इस सुरक्षा के कारण कंपनियों को सीमित कानूनी राहत मिलती है।
अगर किसी कंपनी की सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म हो जाती है तो उसके खिलाफ कई मामलों में सीधे कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर कंपनी और उसके अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो सकती है। यही कारण है कि यह सुरक्षा सोशल मीडिया कंपनियों के लिए काफी अहम मानी जाती है।
इस मामले में मेटा के अधिकारियों ने पहले संसदीय समिति के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखा था। कंपनी ने कहा था कि वीडियो हटने की वजह एक तकनीकी गड़बड़ी थी। साथ ही कंपनी ने इस पर खेद भी जताया था।
लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखा। मंत्रालय का कहना था कि अगर इतनी बड़ी कंपनी तकनीकी गड़बड़ी की बात करती है तो उसे अपनी व्यवस्था को और मजबूत बनाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी समस्या दोबारा न आए। समिति ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आज करोड़ों लोग करते हैं। ऐसे में किसी भी पोस्ट, वीडियो या जानकारी को हटाने का फैसला पूरी सावधानी के साथ होना चाहिए। अगर गलती होती है तो उसका असर लाखों लोगों पर पड़ सकता है। बैठक में केवल प्रधानमंत्री के वीडियो का मामला ही नहीं उठा। समिति ने बाल यौन शोषण सामग्री यानी Child Sexual Abuse Material (CSAM) से जुड़े मामलों पर भी चिंता जताई।
समिति ने कहा कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, एक्स (X), यूट्यूब, गूगल और स्नैपचैट जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भारतीय कानूनों का पूरी तरह पालन करना होगा। किसी भी तरह की आपत्तिजनक सामग्री को समय पर हटाना कंपनियों की जिम्मेदारी है।
समिति ने महिलाओं से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट पर भी सख्त रुख अपनाया। सदस्यों का कहना था कि अगर सोशल मीडिया कंपनियां ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई नहीं करती हैं तो उनके खिलाफ भी कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।
समिति का मानना है कि इंटरनेट पर बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर किसी प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री मिलती है तो उसे तुरंत हटाया जाना चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ऐसे में सरकार और संसद दोनों चाहते हैं कि बड़ी तकनीकी कंपनियां भारतीय कानूनों का पालन करें और अपनी जिम्मेदारी समझें।
प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो का मामला भी इसी वजह से अहम माना जा रहा है। यह केवल एक वीडियो हटने का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर सामग्री को किस तरह संभालती हैं और गलती होने पर क्या कदम उठाती हैं।
अब सभी की नजर मेटा के जवाब पर रहेगी। कंपनी को तय समय के भीतर सार्वजनिक माफी, पूरे मामले की जानकारी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर अपना पक्ष रखना होगा। इसके बाद संसदीय समिति आगे की प्रक्रिया पर फैसला करेगी।
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