संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संस्था (FAO) की नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में भूख से जूझने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल हल्की कमी दर्ज की गई है। इसके बावजूद रिपोर्ट चेतावनी देती है कि मौजूदा रफ्तार जारी रही तो 2030 तक भी 51 से 52 करोड़ लोग भूख का सामना कर सकते हैं। बढ़ती खाद्य महंगाई, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, युद्ध और जलवायु संबंधी आपदाएं अब भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संस्था (FAO) की नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में भूख से जूझने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल हल्की कमी दर्ज की गई है। इसके बावजूद रिपोर्ट चेतावनी देती है कि मौजूदा रफ्तार जारी रही तो 2030 तक भी 51 से 52 करोड़ लोग भूख का सामना कर सकते हैं। बढ़ती खाद्य महंगाई, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, युद्ध और जलवायु संबंधी आपदाएं अब भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
दुनिया भर में भूख और कुपोषण को लेकर संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संस्था (FAO) ने अपनी "स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन" रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल दुनिया की लगभग 7. 8 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 645 मिलियन (64.
5 करोड़) लोग, भूख का सामना कर रहे थे। यह आंकड़ा 2024 के 8. 1 प्रतिशत की तुलना में थोड़ा कम है। लगातार तीसरे साल भूख के आंकड़ों में मामूली सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भूख से प्रभावित लोगों की संख्या में कमी जरूर आई है, लेकिन दुनिया अभी भी उस लक्ष्य से काफी दूर है जिसे संयुक्त राष्ट्र ने टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत तय किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुधार की रफ्तार अभी धीमी है और यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में करोड़ों लोग पर्याप्त भोजन से वंचित रह सकते हैं।
FAO ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि यदि मौजूदा गति से ही सुधार होता रहा, तो 2030 तक भी लगभग 510 से 520 मिलियन (51 से 52 करोड़) लोग भूख से जूझते रहेंगे। यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) के लक्ष्य के अनुरूप नहीं मानी जा रही है। इन लक्ष्यों का उद्देश्य दुनिया से भूख और कुपोषण को समाप्त करना है, लेकिन मौजूदा हालात इस दिशा में बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य सुरक्षा पर सबसे अधिक असर बढ़ती ऊर्जा कीमतों और उर्वरकों की महंगाई का पड़ रहा है। जब ऊर्जा महंगी होती है तो खेती की लागत बढ़ जाती है। खेतों में इस्तेमाल होने वाले डीजल, बिजली और सिंचाई की लागत बढ़ने के साथ-साथ खाद और उर्वरकों की कीमतें भी ऊपर जाती हैं। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन की लागत पर पड़ता है और अंत में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
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खाद्य महंगाई का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। जब उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ती है, तो अनाज, फल, सब्जियां, दूध और अन्य जरूरी खाद्य वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं। इससे आम परिवारों के लिए पौष्टिक भोजन खरीदना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले कुछ वर्षों में कई वैश्विक घटनाओं ने खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किया है। यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और जलवायु संबंधी आपदाएं, जैसे सूखा और बाढ़, ने कई देशों में खाद्य उत्पादन और वितरण प्रणाली पर असर डाला है। इन परिस्थितियों के कारण कई क्षेत्रों में कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ और खाद्य आपूर्ति की प्रक्रिया भी बाधित हुई।
विशेष रूप से गरीब और संघर्ष प्रभावित देशों में इसका असर अधिक देखने को मिल रहा है। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन तक पहुंच पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। जब किसी देश में युद्ध, प्राकृतिक आपदा या आर्थिक संकट एक साथ आते हैं, तो वहां खाद्य संकट और भी गंभीर हो सकता है।
रिपोर्ट इस बात की ओर भी संकेत करती है कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा केवल कृषि उत्पादन का विषय नहीं है। इसके पीछे ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, परिवहन व्यवस्था, जलवायु परिवर्तन और राजनीतिक स्थिरता जैसे कई महत्वपूर्ण कारक जुड़े हुए हैं। यदि इनमें से किसी एक क्षेत्र में भी बड़ा संकट पैदा होता है तो उसका असर खाद्य आपूर्ति पर पड़ सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए भी यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी खाद्य जरूरतों का बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है, लेकिन वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का असर कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों या कृषि से जुड़े उत्पादों की कीमतें बढ़ती हैं, तो आयात लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर घरेलू खाद्य महंगाई और विभिन्न पोषण योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक खाद्य संकट का प्रभाव केवल कृषि या खाद्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसका असर आर्थिक गतिविधियों, सरकारी खर्च और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी दिखाई देता है। जब कई देशों की सरकारें खाद्य सुरक्षा और राहत कार्यक्रमों पर अधिक खर्च करती हैं, तो उनकी बजट प्राथमिकताएं भी बदल सकती हैं।
इसका प्रभाव फ्रीलांस सेक्टर और डिजिटल इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों पर भी परोक्ष रूप से पड़ सकता है। यदि किसी देश की आर्थिक प्राथमिकताएं बदलती हैं या कंपनियां अपने खर्च में कटौती करती हैं, तो प्रोजेक्ट, विज्ञापन बजट और नई सेवाओं पर होने वाला निवेश भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे में वैश्विक आर्थिक माहौल का असर अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों तक पहुंच सकता है।
FAO की रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले साल की तुलना में स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। दुनिया के कई हिस्सों में खाद्य सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, जलवायु परिवर्तन, युद्ध और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं आने वाले समय में भी खाद्य बाजार को प्रभावित कर सकती हैं।
रिपोर्ट का संकेत साफ है कि भूख की समस्या केवल किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा चुनौती है। आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने, कृषि उत्पादन बढ़ाने और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास करने की जरूरत होगी। साथ ही, बदलते वैश्विक हालात पर नजर रखना भी जरूरी होगा ताकि खाद्य संकट का प्रभाव कम किया जा सके। desclaimer :
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