अफ्रीका के शुष्क इलाकों में ऊँटों को हमेशा सबसे मजबूत और कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने वाला जानवर माना जाता रहा है। लेकिन अब बढ़ती गर्मी और लगातार बदलते मौसम ने ऊँटों के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। BBC World और जलवायु परिवर्तन से जुड़े शोधों के अनुसार, हाल के वर्षों में अफ्रीका के कई इलाकों में भीषण गर्मी के दौरान ऊँटों की असामान्य मौतों के मामले बढ़े हैं। इससे उन लाखों लोगों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है, जिनका जीवन पूरी तरह ऊँट पालन पर निर्भर है।
अफ्रीका के शुष्क इलाकों में ऊँटों को हमेशा सबसे मजबूत और कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने वाला जानवर माना जाता रहा है। लेकिन अब बढ़ती गर्मी और लगातार बदलते मौसम ने ऊँटों के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। BBC World और जलवायु परिवर्तन से जुड़े शोधों के अनुसार, हाल के वर्षों में अफ्रीका के कई इलाकों में भीषण गर्मी के दौरान ऊँटों की असामान्य मौतों के मामले बढ़े हैं। इससे उन लाखों लोगों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है, जिनका जीवन पूरी तरह ऊँट पालन पर निर्भर है।
जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने या समुद्र के जलस्तर बढ़ने तक सीमित नहीं रह गया है। इसका प्रभाव अब उन इलाकों में भी साफ दिखाई देने लगा है, जहां सदियों से लोग पशुपालन के सहारे अपना जीवन बिताते आए हैं। अफ्रीका के रेगिस्तानी और अति शुष्क क्षेत्रों में रहने वाले चरवाहों का कहना है कि पहले ऊँट अत्यधिक गर्मी को आसानी से सह लेते थे, लेकिन अब लगातार बढ़ते तापमान और लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव उनके लिए भी जानलेवा साबित हो रही है।
बढ़ती गर्मी से कमजोर पड़ रहे हैं ऊँट BBC की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में अफ्रीका के कई हिस्सों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंच रहा है। इतनी अधिक गर्मी केवल इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि ऊँट जैसे अधिक तापमान सहने वाले जानवरों के लिए भी खतरनाक बन गई है।
चरवाहों का कहना है कि पहले उनके ऊँट लंबी दूरी तक बिना किसी परेशानी के यात्रा कर लेते थे, लेकिन अब गर्मी के कारण कई ऊँट रास्ते में ही थककर गिर जाते हैं। कई मामलों में पानी के स्रोत दूर होने और लगातार लू चलने के कारण ऊँटों की मौत तक हो रही है। इससे पूरे परिवार की आय और जीवन पर असर पड़ता है, क्योंकि कई समुदायों की आजीविका पूरी तरह पशुपालन पर निर्भर है।
अफ्रीका में ऊँट केवल पशु नहीं, जीवन का आधार हैं अफ्रीका के कई देशों में ऊँटों की भूमिका केवल एक जानवर तक सीमित नहीं है। केन्या, अल्जीरिया और आसपास के क्षेत्रों में ऊँट दूध, मांस, परिवहन और सामाजिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कई परिवारों की आर्थिक स्थिति ऊँटों की संख्या पर निर्भर करती है और इन्हें भविष्य की सुरक्षा के रूप में भी देखा जाता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार कम होती बारिश, लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा और अचानक आने वाली बाढ़ ने इन क्षेत्रों की पारंपरिक पशुपालन व्यवस्था को प्रभावित किया है। चारागाह सिकुड़ रहे हैं और पानी के प्राकृतिक स्रोत पहले की तुलना में कम होते जा रहे हैं। इसका सीधा असर ऊँटों के स्वास्थ्य और उनके पालन-पोषण पर पड़ रहा है।
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बदलनी पड़ रही है चरवाहों की जीवनशैली जलवायु परिवर्तन पर प्रकाशित कई शोध बताते हैं कि अब चरवाहों को अपनी वर्षों पुरानी जीवनशैली बदलनी पड़ रही है। पहले जहां वे अपने झुंड को लंबे सफर पर ले जाते थे, अब उन्हें यात्रा के रास्ते, दूरी और समय में बदलाव करना पड़ रहा है।
अल्जीरिया के El Oued जैसे अति शुष्क क्षेत्रों में किए गए शोध में पाया गया कि कई चरवाहों ने दिन की बजाय रात में यात्रा करना शुरू कर दिया है ताकि ऊँटों को कम तापमान में चलाया जा सके। दिन के समय वे अधिक आराम कराते हैं और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए यात्रा की योजना बनाते हैं।
इन बदलावों का उद्देश्य केवल ऊँटों को बचाना नहीं बल्कि पूरे पशुपालन व्यवसाय को जलवायु संकट के अनुसार ढालना है।
वैज्ञानिकों ने जताई भविष्य को लेकर चिंता Nature में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भविष्य की हीटवेव के दौरान तापमान 56 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक पहुंच सकता है। शोधकर्ताओं ने इसे एक सतर्क अनुमान बताया है और कहा है कि वास्तविक परिस्थितियां इससे भी अधिक गंभीर हो सकती हैं।
अध्ययन के अनुसार, इतने अधिक तापमान में इंसानों के साथ-साथ ऊँट जैसे अधिक गर्मी सहने वाले जानवरों के लिए भी लंबे समय तक जीवित रहना बेहद कठिन हो जाएगा। यदि ग्लोबल वार्मिंग की गति इसी तरह बनी रही, तो आने वाले वर्षों में लाखों लोग अपनी पारंपरिक आजीविका खो सकते हैं।
ऊँटों को बचाने के लिए अपनाए जा रहे नए उपाय अत्यधिक गर्मी से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए कई इलाकों में नए उपाय अपनाए जा रहे हैं। कुछ पशु चिकित्सक ऊँटों के लिए विशेष स्वास्थ्य प्रोटोकॉल तैयार कर रहे हैं। इनमें गर्मी के मौसम में अतिरिक्त पानी, इलेक्ट्रोलाइट्स, बेहतर भोजन व्यवस्था और समय पर स्वास्थ्य देखभाल शामिल है।
चरवाहे भी अपने अनुभव के आधार पर नई रणनीतियां अपना रहे हैं। वे दिन की बजाय रात में यात्रा कर रहे हैं और झुंड को कम दूरी तक ले जा रहे हैं ताकि जानवरों पर गर्मी का असर कम हो। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद अत्यधिक गर्मी के दौरान कई ऊँटों के शरीर का तापमान और हृदय गति खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है, जिससे उनकी जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
चरवाहों की बदलती जिंदगी BBC की रिपोर्ट में कई चरवाहों ने बताया कि उन्होंने पहली बार अपने सबसे मजबूत ऊँटों को भी भीषण गर्मी के कारण मरते हुए देखा। कुछ लोगों का कहना है कि पहले जो ऊँट वर्षों तक रेगिस्तान में सफर करते थे, वे अब हीटवेव के दौरान अचानक गिर जाते हैं और फिर उठ नहीं पाते।
कई परिवारों को अब अपने बच्चों को कम उम्र में शहरों की ओर भेजना पड़ रहा है ताकि वे पढ़ाई कर सकें या दूसरा रोजगार तलाश सकें। उन्हें डर है कि यदि मौसम इसी तरह बदलता रहा तो केवल पशुपालन के सहारे परिवार चलाना मुश्किल हो जाएगा।
कुछ समुदाय कैमल मिल्क कोऑपरेटिव और स्थानीय कूलिंग पॉइंट जैसी नई पहल भी शुरू कर रहे हैं, लेकिन सीमित संसाधन और तेजी से बदलता मौसम उनके सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
जलवायु संकट का व्यापक असर यह स्थिति बताती है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की आजीविका, भोजन, पशुपालन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी सीधा प्रभाव डाल रहा है। यदि ऊँट जैसे मजबूत और गर्मी सहने वाले जानवर भी चरम तापमान का सामना नहीं कर पा रहे हैं, तो यह दुनिया के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।
भारत जैसे देशों के किसानों और पशुपालकों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संदेश है। बदलते मौसम के बीच केवल नई तकनीक या नई फसलें ही नहीं, बल्कि पूरे कृषि और पशुपालन मॉडल को बदलती परिस्थितियों के अनुसार तैयार करना जरूरी हो सकता है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर अनुकूलन (Adaptation) और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करना आने वाले समय की बड़ी जरूरत बनती जा रही है। desclaimer :
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