प्रसिद्ध इंजीनियर और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल जारी है। चिकित्सकीय सलाह पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है, लेकिन उन्होंने IV फ्लूड और ग्लूकोज़ लेने से इनकार कर दिया है। डॉक्टरों ने इसे स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम बताया है, जबकि वांगचुक अपनी मांगों पर कायम हैं।
प्रसिद्ध इंजीनियर और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल जारी है। चिकित्सकीय सलाह पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है, लेकिन उन्होंने IV फ्लूड और ग्लूकोज़ लेने से इनकार कर दिया है। डॉक्टरों ने इसे स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम बताया है, जबकि वांगचुक अपनी मांगों पर कायम हैं।
प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक बार फिर अपने आंदोलन को लेकर चर्चा में हैं। पर्यावरण संरक्षण और CJP आंदोलन से जुड़ी मांगों के समर्थन में चल रही उनकी भूख हड़ताल लगातार जारी है। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद चिकित्सकों की सलाह पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन अस्पताल में भी उन्होंने IV फ्लूड और ग्लूकोज़ लेने से इनकार कर दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार डॉक्टरों ने उन्हें बार-बार समझाने की कोशिश की कि लंबे समय तक बिना पोषण के रहने से शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है, फिर भी उन्होंने अपना अनशन जारी रखने का फैसला किया है।
अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद वांगचुक का यह रुख उनके आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक भोजन और आवश्यक तरल पदार्थ न लेने से शरीर में पानी की कमी, कमजोरी, रक्तचाप में गिरावट और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसी कारण डॉक्टर लगातार उन्हें चिकित्सकीय सहायता लेने की सलाह दे रहे हैं। फिलहाल वे अस्पताल में निगरानी में हैं और उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर डॉक्टर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
सोनम वांगचुक का यह आंदोलन पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है। CJP आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनकी प्रमुख मांग हिमालयी क्षेत्रों, ग्लेशियरों और अन्य पर्यावरण-संवेदनशील इलाकों में अनियंत्रित विकास गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उनका मानना है कि इन क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहे निर्माण कार्य और प्रदूषण का असर स्थानीय पर्यावरण के साथ-साथ देश की जल सुरक्षा और पारिस्थितिकी पर भी पड़ रहा है।
सोनम वांगचुक लंबे समय से हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते रहे हैं। लेह-लद्दाख और उत्तराखंड सहित कई पर्वतीय क्षेत्रों में उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता पर लगातार आवाज उठाई है। उनका कहना रहा है कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।
उनकी भूख हड़ताल ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। आंदोलन से जुड़े लोग इसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध का माध्यम बता रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे विषय केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर पूरे देश पर पड़ता है। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों को इन मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
दूसरी ओर, चिकित्सकीय दृष्टि से लंबे समय तक भूख हड़ताल जारी रखना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। डॉक्टरों के अनुसार शरीर को सामान्य रूप से काम करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा, पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत होती है। यदि लंबे समय तक इनकी कमी बनी रहती है तो कई अंगों के कामकाज पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से अस्पताल में भर्ती मरीजों को आवश्यकता पड़ने पर IV फ्लूड या ग्लूकोज़ देने की सलाह दी जाती है।
हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार सोनम वांगचुक ने इस चिकित्सकीय सहायता को स्वीकार नहीं किया है। फिलहाल आंदोलन जारी है और अस्पताल में उनका इलाज तथा स्वास्थ्य की निगरानी की जा रही है। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनकी मांगों को लेकर किसी नई आधिकारिक घोषणा की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में इस मामले में क्या निर्णय होता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है। desclaimer :
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