अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब दुनिया के तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में 4.5 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त दर्ज की गई है। अगर समुद्री रास्तों में रुकावट आती है तो इसका असर भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे तनाव का असर अब तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज़ बढ़ोतरी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई (WTI) दोनों की कीमतें एक ही दिन में करीब 4.5 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गईं।
रिपोर्ट के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 88 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। वहीं डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 82.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यह पिछले एक महीने का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।
क्यों बढ़ रही हैं तेल की कीमतें? तेल की कीमतें केवल मौजूदा तनाव की वजह से नहीं बढ़ रही हैं। बाजार को इस बात की भी चिंता है कि अगर खाड़ी क्षेत्र के अहम समुद्री रास्तों पर कोई रुकावट आई तो दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्र के रास्ते होता है। खासकर खाड़ी देशों से निकलने वाला तेल जहाजों के जरिए कई देशों तक पहुंचता है। यदि इन रास्तों में किसी तरह की परेशानी आती है तो तेल की आपूर्ति धीमी हो सकती है। इसी डर के कारण निवेशक पहले से ही तेल खरीद रहे हैं, जिससे कीमतों में तेजी आ रही है।
रेड सी और बाब-अल-मंदब क्यों हैं महत्वपूर्ण? रेड सी (Red Sea) और बाब-अल-मंदब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में गिने जाते हैं। खाड़ी देशों से निकलने वाला काफी तेल इन्हीं रास्तों से होकर यूरोप और एशिया के कई देशों तक पहुंचता है। अगर इन रास्तों पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है। तेल की डिलीवरी में देरी होने से कीमतें और बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि इन समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे को दुनिया गंभीरता से देख रही है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य का भी बड़ा महत्व होर्मुज़ जलडमरूमध्य भी दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में शामिल है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यदि यहां किसी तरह की रुकावट आती है तो कई देशों में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
बाजार की चिंता केवल वर्तमान हालात को लेकर नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि यदि तनाव और बढ़ा तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
ऊर्जा कंपनियां भी कर रही हैं तैयारी बढ़ते खतरे को देखते हुए बड़ी ऊर्जा कंपनियां भी नए विकल्प तलाश रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार शेवरॉन (Chevron) इराक के साथ ऐसे पाइपलाइन प्रोजेक्ट पर बातचीत कर रही है जिससे तेल की सप्लाई केवल होर्मुज़ मार्ग पर निर्भर न रहे।
अगर ऐसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ते हैं तो भविष्य में तेल की सप्लाई को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि ऐसे प्रोजेक्ट तैयार होने में समय लगता है और इनका असर तुरंत देखने को नहीं मिलेगा।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है? भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत पर भी पड़ सकता है।
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की संभावना रहती है। हालांकि इसका असर तुरंत दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। कई बार सरकार और तेल कंपनियां कुछ समय तक कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश करती हैं।
लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार तेजी बनी रहती है तो आने वाले हफ्तों में इसका असर घरेलू बाजार में भी देखने को मिल सकता है।
महंगाई पर बढ़ सकता है दबाव तेल केवल गाड़ियों में ही इस्तेमाल नहीं होता। इसका असर लगभग हर क्षेत्र पर पड़ता है। ट्रक, बस, जहाज और कई उद्योग ईंधन पर निर्भर हैं।
जब ईंधन महंगा होता है तो सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का खर्च भी बढ़ जाता है। इसके बाद कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च को सामान की कीमतों में जोड़ सकती हैं। इससे खाने-पीने की चीजें, रोजमर्रा का सामान और कई अन्य उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इसी कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को महंगाई बढ़ने का एक बड़ा कारण माना जाता है।
आम लोगों की जेब पर असर यदि ईंधन महंगा होता है तो सबसे पहले असर रोजमर्रा के खर्च पर पड़ता है। निजी वाहन चलाने वालों का खर्च बढ़ सकता है। बस और अन्य परिवहन सेवाओं का किराया भी बढ़ सकता है। डिलीवरी का काम करने वाले लोगों, टैक्सी चालकों और छोटे कारोबारियों के लिए ईंधन का खर्च बढ़ना बड़ी चुनौती बन सकता है। जिन लोगों का काम रोज वाहन चलाने पर निर्भर है, उनकी कमाई पर भी इसका असर पड़ सकता है।
छोटे कारोबारियों के लिए बढ़ सकती है मुश्किल छोटे दुकानदार और कारोबारी सामान की ढुलाई के लिए परिवहन सेवाओं पर निर्भर रहते हैं। यदि माल ढुलाई महंगी होती है तो कारोबार का खर्च बढ़ सकता है।
कई छोटे व्यापारी बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक नहीं पहुंचा पाते। ऐसे में उनके मुनाफे पर असर पड़ सकता है। वहीं जो व्यापारी कीमतें बढ़ाते हैं, उन्हें ग्राहकों की संख्या कम होने का डर भी रहता है।
वैश्विक बाजार पर भी नजर तेल की कीमतों पर दुनिया भर के निवेशकों की नजर बनी हुई है। बाजार केवल मौजूदा हालात नहीं देख रहा, बल्कि आने वाले समय के संभावित जोखिमों को भी ध्यान में रख रहा है।
यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होता है और समुद्री रास्ते सामान्य रहते हैं तो कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं तो तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
फिलहाल क्या स्थिति है? अभी तक तेल की आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन बढ़ते तनाव के कारण बाजार में चिंता बनी हुई है। इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी देखने को मिली है।
भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा। यदि तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर ईंधन की कीमतों, महंगाई और आम लोगों के खर्च पर पड़ सकता है।
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