चुनाव आयोग के ECINET पोर्टल पर वोटर रजिस्ट्रेशन के नए नियम को लेकर सवाल उठ रहे हैं। नए आवेदकों को अब माता-पिता या बुजुर्ग रिश्तेदारों की SIR प्रक्रिया में स्थिति की जानकारी देनी होगी। इस बदलाव से आशंका जताई जा रही है कि SIR में हटाए गए मतदाताओं के बच्चों के पंजीकरण पर असर पड़ सकता है। SIR के दौरान कई राज्यों में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, जिसके बाद पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है।
चुनाव आयोग के ऑनलाइन वोटर रजिस्ट्रेशन पोर्टल ECINET में किए गए एक नए बदलाव को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चिंता बढ़ गई है। नए नियम के तहत नए मतदाता पंजीकरण या दोबारा वोटर कार्ड के लिए आवेदन करने वालों को अपने माता-पिता या बुजुर्ग रिश्तेदारों की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में स्थिति से जुड़ी जानकारी देनी होगी।
इस बदलाव को लेकर आशंका जताई जा रही है कि जिन परिवारों के सदस्यों के नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके बच्चों के लिए भी वोटर के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है।
चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया कई राज्यों में पूरी हो चुकी है और कुछ राज्यों में अभी जारी है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करना है, लेकिन इसके दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर विवाद भी सामने आए हैं। आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया का असर खासतौर पर उन लोगों पर पड़ा है जिनके दस्तावेज या नागरिकता से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठे।
जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हुई है, वहां करीब 5.58 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम SIR सूची में शामिल नहीं होने के बाद उनके मामलों की समीक्षा न्यायिक ट्रिब्यूनल में चल रही है। इन मामलों के निपटारे की गति को लेकर भी सवाल उठे हैं।
नए ऑनलाइन नियम को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब SIR को लेकर पहले से ही सार्वजनिक बहस चल रही है। आशंका जताई जा रही है कि अगर किसी व्यक्ति के माता-पिता या परिवार के बुजुर्गों का नाम मतदाता सूची से हट गया है, तो उसके प्रभाव का सामना अगली पीढ़ी को भी करना पड़ सकता है। कुछ राज्यों में ऐसे संकेत भी मिले हैं कि SIR से बाहर हुए लोगों के कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
इस बदलाव को लेकर पारदर्शिता का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि मतदाता अधिकारों से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव सार्वजनिक जानकारी और स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के साथ किए जाने चाहिए। उनका सवाल है कि ECINET पर यह नया प्रावधान किस कानूनी आधार पर जोड़ा गया और इसकी औपचारिक घोषणा क्यों नहीं की गई।
चुनाव आयोग की ओर से इस बदलाव को लेकर विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने आने की जानकारी नहीं है। यह नियम फिलहाल ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में दिखाई दे रहा है, जबकि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले भौतिक फॉर्म-6 में यह बदलाव अभी शामिल नहीं बताया गया है।
मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया सीधे नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी है। इसलिए आवेदन प्रक्रिया में किसी भी नए दस्तावेज या जानकारी की मांग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सार्वजनिक जानकारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। SIR से जुड़े विवादों के बीच ECINET में किए गए इस बदलाव ने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और समावेश को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।
चुनाव आयोग के सामने अब इस नए प्रावधान को लेकर उठ रही चिंताओं पर स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती है, ताकि मतदाताओं को आवेदन प्रक्रिया और इसके प्रभावों के बारे में साफ जानकारी मिल सके।
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