जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए अपना अभियान दिल्ली तक पहुंचा दिया है। उनका कहना है कि पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता की भागीदारी मजबूत होगी। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से यह मांग लगातार उठ रही है, जबकि केंद्र सरकार अब तक राज्य का दर्जा बहाल करने की कोई तय समयसीमा घोषित नहीं कर पाई है।
जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग अब केवल घाटी तक सीमित नहीं रही। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए अपना अभियान दिल्ली तक पहुंचा दिया है। राजधानी में बैठकों, धरनों और जनभागीदारी के जरिए वह केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा जल्द बहाल करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और लोगों की भागीदारी से जुड़ा मुद्दा है। हाल के दिनों में दिल्ली में हुए कार्यक्रमों के दौरान उमर अब्दुल्ला ने साफ कहा कि अब केवल बयान देने का समय नहीं है। उन्होंने लोगों और राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर खुलकर साथ आने की अपील की। अभियान के दौरान "Enough is enough" जैसे नारे भी सुनाई दिए, जो यह दिखाते हैं कि राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग अब पहले से ज्यादा मजबूती के साथ उठाई जा रही है।
जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा अगस्त 2019 में समाप्त किया गया था। उसी समय राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में बांट दिया गया था। इसके बाद से कई राजनीतिक दल लगातार यह मांग करते रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर को दोबारा पूर्ण राज्य बनाया जाए। उनका कहना है कि राज्य का दर्जा खत्म होने से स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी और प्रशासनिक फैसलों में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रही।
उमर अब्दुल्ला का मानना है कि राज्य का दर्जा बहाल होने से चुनी हुई सरकार को अधिक अधिकार मिलेंगे और जनता से जुड़े कई फैसले स्थानीय स्तर पर लिए जा सकेंगे। उनका कहना है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब लोगों के प्रतिनिधियों को फैसले लेने का पूरा अधिकार मिले।
केंद्र सरकार पहले भी कई बार कह चुकी है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा और उचित समय पर राज्य का दर्जा बहाल करने पर विचार होगा। हालांकि, अब तक इसके लिए कोई तय समयसीमा या विस्तृत योजना सामने नहीं आई है। यही कारण है कि विपक्षी दल लगातार सरकार से स्पष्ट रोडमैप की मांग कर रहे हैं।
दिल्ली में चल रहे इस अभियान का उद्देश्य केवल सरकार तक अपनी बात पहुंचाना नहीं है, बल्कि पूरे देश में इस मुद्दे पर चर्चा बढ़ाना भी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब किसी क्षेत्र की मांग राष्ट्रीय राजधानी में उठती है तो उस पर व्यापक बहस शुरू होती है और अलग-अलग राजनीतिक दल भी अपनी राय सामने रखते हैं। इस मुद्दे का असर केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं माना जा रहा। कई लोग इसे भारत के संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के रूप में देख रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि राज्य का दर्जा मिलने से प्रशासन और जनता के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि विकास, सुरक्षा और राजनीतिक प्रक्रिया को साथ लेकर आगे बढ़ना उसकी प्राथमिकता है। आने वाले समय में संसद के सत्रों और राजनीतिक बैठकों में यह मुद्दा फिर चर्चा का विषय बन सकता है। विपक्षी दल इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर उठा रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार अपने पहले दिए गए आश्वासनों का हवाला दे रही है। ऐसे में राज्य का दर्जा बहाल करने का सवाल राष्ट्रीय राजनीति में एक अहम विषय बना हुआ है। फिलहाल उमर अब्दुल्ला का दिल्ली अभियान इसी संदेश के साथ आगे बढ़ रहा है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर सुना जाए और राज्य का दर्जा बहाल करने की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से आगे बढ़ाया जाए। अब इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की अगली पहल और राजनीतिक बातचीत पर सभी की नजर रहेगी।
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