यूरोप में जंगल की आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और पिछले एक दशक में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज, बढ़ती गर्मी और सूखे मौसम के कारण ऐसे हादसों का खतरा बढ़ रहा है। इसका असर केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
यूरोप में पिछले कुछ वर्षों से जंगल की आग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। स्पेन, ग्रीस और कई दूसरे देशों में हाल की आग ने एक बार फिर दिखाया है कि बदलता मौसम अब केवल गर्मी तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज के कारण आग लगने की घटनाएं और उनसे होने वाले नुकसान का खतरा बढ़ रहा है।
यूरोप के कई देशों में जंगल की आग अब हर साल बड़ी चुनौती बनती जा रही है। पिछले एक दशक में इन आग की घटनाओं में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। हाल के दिनों में स्पेन, ग्रीस और आसपास के कई इलाकों में लगी आग ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार इसी तरह बनी रही तो आने वाले समय में ऐसे हादसे और बढ़ सकते हैं।
एबीसी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिणी स्पेन के कई इलाकों में तेज गर्मी, सूखा मौसम और तेज हवाओं ने आग को तेजी से फैलने में मदद की। कुछ जगहों पर आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। कई गांव खाली कराए गए, कुछ हाईवे बंद करने पड़े और बड़ी संख्या में पर्यटकों को होटल छोड़कर सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया।
यूरोप लंबे समय तक जंगल की आग के मामले में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जितना प्रभावित नहीं माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हालात बदलते दिखाई दिए हैं। अब हर गर्मी के मौसम में कई देशों में आग की बड़ी घटनाएं सामने आने लगी हैं। इससे स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटन और खेती पर भी असर पड़ रहा है।
जलवायु वैज्ञानिक काफी समय से चेतावनी देते रहे हैं कि पृथ्वी का बढ़ता तापमान जंगल की आग का खतरा बढ़ा रहा है। जब लंबे समय तक बारिश नहीं होती, जमीन और पेड़-पौधे सूख जाते हैं। ऐसे हालात में छोटी सी चिंगारी भी कुछ ही समय में बड़ी आग का रूप ले सकती है। इसे ही "फायर वेदर" कहा जाता है, यानी ऐसा मौसम जिसमें आग बहुत तेजी से फैलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गर्म दिनों की संख्या बढ़ने, सूखे की अवधि लंबी होने और तेज हवाओं के कारण जंगल की आग पर काबू पाना पहले से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। यही वजह है कि अब जंगलों के पास बसे गांव, छोटे शहर और पर्यटन स्थल भी ज्यादा खतरे में हैं। जंगल की आग का असर केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहता जो आग के पास रहते हैं। आग से उठने वाला धुआं कई किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है। इस धुएं में मौजूद छोटे-छोटे कण और जहरीली गैसें हवा को खराब कर देती हैं। इससे सांस लेने में परेशानी, अस्थमा और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका असर ज्यादा देखा जाता है।
जब किसी इलाके में लंबे समय तक धुआं बना रहता है, तो अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को ऐसी स्थिति में घर के अंदर रहने, जरूरत होने पर मास्क पहनने और परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह लेने की सलाह देते हैं।
भारत के लिए भी यह खबर अहम मानी जा रही है। देश के कई हिस्सों में हर साल भीषण गर्मी, जंगल की आग और खेतों में पराली जलाने से धुएं की समस्या सामने आती है। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान स्मॉग, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जंगल की आग तथा महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाकों में सूखे की स्थिति यह दिखाती है कि बदलता मौसम अलग-अलग रूप में लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। इसका असर खेती, पानी, स्वास्थ्य, पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए मौसम से जुड़ी ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए पहले से तैयारी करना और पर्यावरण की सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी माना जा रहा है।
यूरोप में हाल की जंगल की आग ने यह साफ कर दिया है कि बदलते मौसम की चुनौती अब दुनिया के कई हिस्सों में एक जैसी होती जा रही है। ऐसे समय में सरकारों के साथ आम लोगों की जागरूकता भी अहम भूमिका निभा सकती है।
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