समुद्र की गहराई में होने वाली डीप-सी माइनिंग को लेकर वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है। नए शोध के अनुसार, इससे हाइड्रोथर्मल वेंट्स के आसपास रहने वाले कई दुर्लभ समुद्री जीवों के खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र तल से धातुओं की खुदाई समुद्री पर्यावरण, मछलियों और समुद्र पर निर्भर लोगों की आजीविका पर भी असर डाल सकती है। फिलहाल इस मुद्दे पर दुनिया भर में नियम बनाने और पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर चर्चा जारी है।
समुद्र की गहराई में होने वाली डीप-सी माइनिंग को लेकर नई चिंता सामने आई है। एक नए शोध के अनुसार, अगर बड़े स्तर पर समुद्र तल से खनन शुरू हुआ तो हाइड्रोथर्मल वेंट्स के आसपास रहने वाले कई दुर्लभ जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे समुद्री जीवन, पर्यावरण और समुद्र पर निर्भर लोगों की आजीविका पर भी असर पड़ सकता है।
समुद्र की गहराई में मौजूद खनिजों को निकालने की योजना को लेकर दुनिया भर में बहस तेज हो गई है। एक नए शोध में कहा गया है कि अगर बड़े पैमाने पर डीप-सी माइनिंग शुरू होती है, तो समुद्र की गहराई में रहने वाले कई दुर्लभ जीवों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। खास तौर पर हाइड्रोथर्मल वेंट्स के आसपास रहने वाले घोंघे और दूसरी छोटी समुद्री प्रजातियां इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, समुद्र की गहराई में ऐसे कई इलाके हैं जहां धरती के अंदर से बहुत गर्म पानी और खनिज बाहर निकलते हैं। इन्हें हाइड्रोथर्मल वेंट्स कहा जाता है। यहां रहने वाले जीव सामान्य समुद्री जीवों से अलग होते हैं। उन्होंने लाखों वर्षों में ऐसे कठिन माहौल में जीने की क्षमता विकसित की है। यही वजह है कि इन जीवों का वैज्ञानिक अध्ययन भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इन इलाकों में खनन शुरू होता है तो वहां का प्राकृतिक माहौल बदल सकता है। समुद्र तल की खुदाई से इन जीवों का घर पूरी तरह नष्ट हो सकता है। एक बार उनका रहने का स्थान खत्म हो गया तो उनके लिए दूसरी जगह जाकर जीवित रहना आसान नहीं होगा।
शोध करने वाले वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बड़े स्तर पर डीप-सी माइनिंग शुरू होने पर इन दुर्लभ जीवों की आधे से ज्यादा प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकती हैं। कई प्रजातियां ऐसी हैं जो केवल कुछ खास जगहों पर ही पाई जाती हैं। अगर उन जगहों को नुकसान पहुंचा तो उन्हें बचाना मुश्किल हो सकता है।
डीप-सी माइनिंग का मुख्य उद्देश्य समुद्र तल से कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ धातुएं निकालना है। इन धातुओं का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और दूसरी आधुनिक तकनीक में किया जाता है। दुनिया में साफ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए इन धातुओं की मांग लगातार बढ़ रही है।
इलेक्ट्रिक वाहनों और नई तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के कारण कई देश समुद्र की गहराई में मौजूद खनिजों को नए संसाधन के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि इससे भविष्य की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि खनन शुरू करने से पहले इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को पूरी तरह समझना जरूरी है।
समुद्री पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़ी कई कड़ियों से मिलकर बना है। अगर किसी एक हिस्से को नुकसान पहुंचता है तो उसका असर दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल दुर्लभ जीवों की नहीं, बल्कि पूरे समुद्री जीवन की चिंता जता रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र में रहने वाले छोटे जीव भी पर्यावरण का अहम हिस्सा होते हैं। इनकी संख्या कम होने से मछलियों और दूसरे समुद्री जीवों के जीवन पर असर पड़ सकता है। लंबे समय में इसका प्रभाव समुद्री भोजन, मछली पकड़ने के काम और समुद्र पर निर्भर लोगों की रोजी-रोटी पर भी दिखाई दे सकता है।
कुछ वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि समुद्र पृथ्वी के पर्यावरण को संतुलित रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। समुद्र ऑक्सीजन चक्र और कार्बन को संतुलित रखने में मदद करता है। अगर समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचता है तो इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा।
फिलहाल डीप-सी माइनिंग को लेकर दुनिया के देशों के बीच पूरी सहमति नहीं बन पाई है। कुछ देश इसे आर्थिक विकास और नई तकनीक के लिए जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि भविष्य में धातुओं की बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए नए स्रोत तलाशना जरूरी है।
दूसरी ओर, कई वैज्ञानिक और पर्यावरण से जुड़े संगठन चाहते हैं कि जब तक इसके सभी पर्यावरणीय असर पूरी तरह साफ नहीं हो जाते, तब तक बड़े स्तर पर डीप-सी माइनिंग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वे इस पर अस्थायी रोक लगाने की मांग कर रहे हैं ताकि आगे और अध्ययन किया जा सके।
यह मामला आम लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज पूरी दुनिया साफ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है। इन तकनीकों के लिए जिन धातुओं की जरूरत होती है, उन्हें हासिल करने का तरीका भी पर्यावरण के लिए सुरक्षित होना चाहिए। अगर नई तकनीकें पर्यावरण को नया नुकसान पहुंचाती हैं, तो उनका लाभ भी सवालों के घेरे में आ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। नई तकनीक अपनाने के साथ-साथ प्रकृति की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी बड़े फैसले से पहले वैज्ञानिक शोध, पर्यावरण की सुरक्षा और लंबे समय के प्रभावों को ध्यान में रखना जरूरी माना जा रहा है।
फिलहाल इस विषय पर दुनिया के कई देशों में चर्चा जारी है। आने वाले समय में डीप-सी माइनिंग को लेकर बनने वाले नियम यह तय करेंगे कि समुद्र की गहराई में मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा और समुद्री जीवों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
DeepSeaMining OceanConservation MarineLife SaveOceans Environment ClimateAction डीप-सी माइनिंग समुद्री जीव हाइड्रोथर्मल वेंट्स समुद्र तल खनन दुर्लभ जीव समुद्री पर्यावरण कोबाल्ट निकेल NetGramNews
Disclaimer
Disclaimer:
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI.
Published by: Gulam Rasool. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.