सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि भारत में कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह को कानूनी नहीं बना सकता। अदालत ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम और POCSO कानून सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होते हैं। अगर किसी परंपरा या धार्मिक नियम में कम उम्र में शादी की अनुमति हो, तब भी भारतीय कानून के तहत वह अपराध माना जाएगा। कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को सबसे ऊपर रखने पर जोर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि भारत में कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह को कानूनी नहीं बना सकता। अदालत ने कहा कि बाल विवाह निषेध कानून (Prohibition of Child Marriage Act) और POCSO कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। अगर किसी समुदाय की परंपरा या धार्मिक नियम कम उम्र में शादी की इजाजत देते हैं, तब भी भारतीय कानून के अनुसार वह अपराध माना जाएगा। अदालत ने बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को सबसे ऊपर रखा है।
भारत में बाल विवाह को रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन कई बार अलग-अलग समुदायों के पर्सनल लॉ को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया है कि देश का कोई भी पर्सनल लॉ बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि अगर किसी समुदाय की परंपरा या धार्मिक नियम कम उम्र में शादी की अनुमति देते हैं, तब भी भारतीय कानून के अनुसार वह अपराध ही माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब कई मामलों में कम उम्र की लड़कियों की शादी को लेकर अलग-अलग तरह की कानूनी दलीलें दी जाती रही हैं। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानून पूरे देश में समान रूप से लागू होते हैं और इनके पालन में किसी तरह की छूट नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम (Prohibition of Child Marriage Act) और POCSO Act बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। इसलिए कोई भी पर्सनल लॉ या धार्मिक परंपरा इन कानूनों को कमजोर नहीं कर सकती। अगर किसी बच्चे की शादी कम उम्र में कराई जाती है, तो संबंधित कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
भारत में कानून के अनुसार लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष तय की गई है। इससे कम उम्र में शादी करना कानून के खिलाफ माना जाता है। इसके अलावा यदि किसी नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, तो POCSO कानून के तहत यह गंभीर अपराध माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से उन मामलों में भी स्पष्टता आई है, जहां पहले पर्सनल लॉ का हवाला देकर अलग-अलग दलीलें दी जाती थीं। अदालत ने कहा कि बच्चों के अधिकार सबसे पहले हैं और उन्हें किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
देश के कई हिस्सों में आज भी बाल विवाह की घटनाएं सामने आती हैं। इसके पीछे गरीबी, सामाजिक दबाव, दहेज का डर, सुरक्षा की चिंता और जागरूकता की कमी जैसे कई कारण बताए जाते हैं। कई परिवार आर्थिक परेशानी या समाज के दबाव में आकर कम उम्र में अपनी बेटियों की शादी कर देते हैं।
ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ कुछ शहरों में भी ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं। सरकार और कई सामाजिक संस्थाएं लंबे समय से लोगों को बाल विवाह के नुकसान के बारे में जागरूक कर रही हैं। इसके बावजूद कुछ जगहों पर यह समस्या अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। बाल विवाह का सबसे ज्यादा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। कम उम्र में शादी होने के बाद कई लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है। इससे उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है और आगे चलकर रोजगार के अवसर भी कम हो जाते हैं। कई मामलों में कम उम्र में मां बनने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
बाल विवाह केवल शिक्षा ही नहीं बल्कि बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर भी असर डालता है। कम उम्र में जिम्मेदारियां आने से बच्चों का बचपन प्रभावित होता है और वे अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाते।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी संकेत दिया कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर बने कानूनों का पालन सभी राज्यों में समान रूप से होना चाहिए। पुलिस और बाल संरक्षण से जुड़ी एजेंसियों को किसी भी मामले में धार्मिक परंपरा या पर्सनल लॉ का हवाला देकर कार्रवाई से पीछे नहीं हटना चाहिए।
इस फैसले का बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कई लोगों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे कम उम्र में शादी के शिकार बच्चों को न्याय मिलने में मदद मिलेगी। साथ ही यह फैसला समाज में यह संदेश भी देता है कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी परंपरा से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
कानून के जानकारों का भी मानना है कि इस फैसले से भविष्य में ऐसे मामलों में भ्रम की स्थिति कम होगी। अब अदालत का रुख साफ है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानून सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होंगे।
भारत सरकार और राज्य सरकारें समय-समय पर बाल विवाह रोकने के लिए अभियान चलाती हैं। स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और पंचायतों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाता है। कई जगह हेल्पलाइन नंबर और बाल संरक्षण समितियां भी काम करती हैं ताकि किसी भी बाल विवाह की जानकारी मिलने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके।
अगर किसी इलाके में बाल विवाह की जानकारी मिलती है, तो स्थानीय प्रशासन, पुलिस और बाल संरक्षण अधिकारी हस्तक्षेप कर सकते हैं। कानून के अनुसार बाल विवाह कराने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी है।
विशेषज्ञ लगातार यह कहते रहे हैं कि केवल कानून बनाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसके लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। परिवारों को यह समझना होगा कि बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य किसी भी सामाजिक दबाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बच्चों के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। चाहे मामला किसी भी समुदाय या परंपरा से जुड़ा हो, देश का कानून सबसे ऊपर रहेगा और बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।
आम लोगों के लिए भी यह फैसला महत्वपूर्ण है। इससे यह साफ हो गया है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी कानून के खिलाफ है। माता-पिता, रिश्तेदार, पंचायत और समाज के अन्य लोगों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कानून का पालन करें और किसी भी तरह के बाल विवाह को बढ़ावा न दें।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद उम्मीद की जा रही है कि बाल विवाह से जुड़े मामलों में कानून का पालन और सख्ती से होगा। इससे बच्चों को सुरक्षित माहौल मिलेगा और उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर भविष्य के अवसर मिल सकेंगे।
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