वैज्ञानिकों ने पहली बार लैब में स्टेम सेल से तैयार रेटिना की स्वस्थ रक्त वाहिका कोशिकाओं की मदद से चूहों की क्षतिग्रस्त आंखों में रक्त प्रवाह और रेटिना की कार्यक्षमता बहाल करने में सफलता हासिल की है। शुरुआती शोध भविष्य में डायबिटिक रेटिनोपैथी और मैक्यूलर डीजनरेशन जैसी बीमारियों के इलाज के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है।
"दृष्टि संबंधी गंभीर बीमारियों के इलाज की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक अहम उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने पहली बार प्रयोगशाला में स्टेम सेल की मदद से रेटिना की स्वस्थ रक्त वाहिका कोशिकाएं तैयार कीं और उन्हें चूहों की आंखों में प्रत्यारोपित कर रेटिना की कार्यक्षमता बहाल करने में सफलता पाई। यह अध्ययन भविष्य में उन बीमारियों के इलाज का आधार बन सकता है, जिनमें रेटिना की रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त होने के कारण धीरे-धीरे दृष्टि कमजोर होती चली जाती है।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने इन विशेष कोशिकाओं को ऐसे चूहों की आंखों में इंजेक्ट किया जिनकी रेटिना पहले से रोगग्रस्त थी। परिणामों में पाया गया कि प्रत्यारोपित कोशिकाएं आंख के मौजूदा ऊतकों के साथ सफलतापूर्वक जुड़ गईं और नई, मजबूत रक्त वाहिकाओं का निर्माण करने लगीं। इससे रेटिना तक ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बेहतर हुई, जो आंख के सामान्य कार्य के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार बेहतर रक्त प्रवाह के कारण कुछ पशु मॉडलों में रेटिना से जुड़े कार्य दोबारा सक्रिय होते दिखाई दिए। यह संकेत देता है कि यदि क्षतिग्रस्त रक्त वाहिकाओं को दोबारा विकसित किया जा सके, तो रेटिना की कार्यक्षमता को आंशिक रूप से बहाल करने की संभावना बन सकती है। हालांकि अभी यह निष्कर्ष केवल पशु अध्ययनों तक सीमित है।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का उपयोग ऐसे मॉडलों में भी किया, जहां बीमारी मौजूद थी लेकिन स्पष्ट रूप से दृष्टि हानि शुरू नहीं हुई थी। शुरुआती चरण में कोशिकाओं का इंजेक्शन देने पर नई रक्त वाहिकाएं बेहतर तरीके से विकसित हुईं और आगे होने वाली क्षति को रोकने में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में केवल इलाज ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में बीमारी की प्रगति को धीमा करने या रोकने के लिए भी इस तकनीक का उपयोग संभव हो सकता है।
रेटिना आंख का वह संवेदनशील हिस्सा है जो प्रकाश को पहचानकर उसे मस्तिष्क तक पहुंचने वाले संकेतों में बदलता है। यदि इसकी रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाएं, तो रेटिना को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता। लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने पर दृष्टि कमजोर हो सकती है और गंभीर मामलों में अंधेपन का खतरा भी बढ़ जाता है। डायबिटिक रेटिनोपैथी और उम्र से जुड़ी मैक्यूलर डीजनरेशन ऐसी ही प्रमुख बीमारियों में शामिल हैं।
इसी क्षेत्र में हुए अन्य अध्ययनों से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। सूखी उम्र-सम्बंधी मैक्यूलर डीजनरेशन के उपचार के लिए विकसित छोटे स्टेम सेल इम्प्लांट के क्लीनिकल ट्रायल में लगभग 27 प्रतिशत प्रतिभागियों में किसी न किसी स्तर पर दृष्टि में सुधार दर्ज किया गया। हालांकि यह अलग अध्ययन है, लेकिन इससे स्टेम सेल आधारित उपचार की संभावनाओं को और मजबूती मिलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक आगे चलकर इंसानों में भी सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में रेटिना से जुड़ी कई जटिल बीमारियों के उपचार का तरीका बदल सकता है। मौजूदा समय में इन बीमारियों के इलाज के विकल्प सीमित हैं और कई मरीजों में बीमारी को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं हो पाता।
फिलहाल यह शोध शुरुआती चरण में है और इसकी सफलता अभी केवल पशु मॉडलों तक सीमित है। मानवों पर उपयोग से पहले बड़े स्तर के क्लीनिकल ट्रायल, सुरक्षा संबंधी विस्तृत परीक्षण और लंबे समय तक मरीजों की निगरानी जरूरी होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन सभी चरणों के सफल होने के बाद ही इस तकनीक को नियमित चिकित्सा उपचार का हिस्सा बनाया जा सकेगा।
इसके बावजूद यह अध्ययन रेटिना रोगों के उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति माना जा रहा है। यदि आगामी परीक्षणों में भी सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो भविष्य में सेल-थैरेपी आधारित उपचार लाखों ऐसे लोगों के लिए नई उम्मीद बन सकता है जो डायबिटिक रेटिनोपैथी, मैक्यूलर डीजनरेशन और अन्य रेटिना संबंधी बीमारियों के कारण दृष्टि खोने के जोखिम का सामना कर रहे हैं।
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