हाल के चुनावों के दौरान देश के कई हिस्से भीषण गर्मी और हीटवेव की चपेट में रहे, लेकिन चुनावी बहस में जलवायु परिवर्तन प्रमुख मुद्दा नहीं बन सका। विश्लेषण बताता है कि रोजगार, महंगाई और सामाजिक समीकरणों के बीच क्लाइमेट नीति पर गंभीर चर्चा सीमित रही।
"भारत में हाल के आम चुनाव ऐसे समय हुए जब देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही थी। दिल्ली में दर्ज 52.9 डिग्री सेल्सियस तापमान ने हीटवेव को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया, लेकिन चुनावी प्रचार और राजनीतिक घोषणापत्रों में जलवायु परिवर्तन अपेक्षित महत्व हासिल नहीं कर सका। क्लाइमेट नीति पर उपलब्ध विश्लेषण यह संकेत देता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का उल्लेख तो किया, लेकिन अत्यधिक गर्मी, जल संकट और लंबे समय के जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए विस्तृत नीति रोडमैप सामने नहीं रखा।
भारतीय चुनावों में मतदाताओं के सामने रोजगार, महंगाई, सामाजिक कल्याण योजनाएं, कर व्यवस्था, कृषि और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे स्वाभाविक रूप से प्रमुख रहते हैं। ऐसे माहौल में जलवायु परिवर्तन अक्सर दीर्घकालिक विषय मान लिया जाता है, जबकि उसका असर अब केवल भविष्य का नहीं बल्कि वर्तमान का भी सवाल बन चुका है। लगातार बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, जल संकट और प्रदूषण सीधे लोगों की आजीविका, स्वास्थ्य और काम करने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।
विश्लेषण यह भी बताता है कि भारत वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है और कुल वैश्विक उत्सर्जन में उसका हिस्सा लगभग दस प्रतिशत के आसपास माना जाता है। इसके बावजूद चुनावी बहस में इस विषय पर अपेक्षाकृत सीमित चर्चा देखने को मिली। जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दे अधिकतर सामान्य वादों तक सीमित रहे और अत्यधिक गर्मी जैसी परिस्थितियों से निपटने की स्पष्ट रणनीति प्रमुख राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन सकी।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान नहीं पड़ता। सबसे अधिक असर उन लोगों पर दिखाई देता है जो खुले में काम करते हैं, जैसे निर्माण श्रमिक, खेतिहर मजदूर, रेहड़ी-पटरी विक्रेता और अन्य असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी। इनके पास अक्सर अत्यधिक गर्मी से बचने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं होते। इसी तरह जिन परिवारों के पास सुरक्षित पेयजल, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं या तापमान नियंत्रित वातावरण उपलब्ध नहीं है, उनके लिए हीटवेव का जोखिम और बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से यह कहा जाता रहा है कि पर्यावरणीय चुनौतियां केवल प्राकृतिक संसाधनों का विषय नहीं हैं, बल्कि उनका सीधा संबंध सामाजिक और आर्थिक न्याय से भी है। जब तापमान लगातार बढ़ता है, तब कमजोर आय वर्ग, बुजुर्ग, बच्चे और खुले वातावरण में काम करने वाले लोग सबसे पहले प्रभावित होते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण मंत्रालय तक सीमित रखने के बजाय स्वास्थ्य, शहरी विकास, जल प्रबंधन और रोजगार जैसी नीतियों से भी जोड़कर देखने की जरूरत मानी जाती है।
विश्लेषण में यह भी रेखांकित किया गया है कि यदि जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रश्न चुनावी विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं पाएंगे, तो अत्यधिक गर्मी, जल संकट और चरम मौसम की घटनाओं के लिए दीर्घकालिक तैयारी कमजोर रह सकती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर हीट एक्शन प्लान, हरित क्षेत्र बढ़ाने, वर्षा जल संरक्षण, जल प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा जैसी नीतियों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं की प्राथमिकताएं राजनीतिक एजेंडा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए नागरिकों के सामने केवल अल्पकालिक राहत योजनाओं ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन योजनाओं पर भी सवाल उठाने की आवश्यकता बताई जा रही है। शहरों और गांवों में हरित आवरण बढ़ाना, जल संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था, हीट एक्शन प्लान और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने जैसी पहलें भविष्य की चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है। बढ़ती गर्मी, बदलते मौसम और संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और विकास से जुड़ा मुद्दा बना दिया है। ऐसे में नीति निर्माण और चुनावी चर्चा में इस विषय को व्यापक स्थान मिलने से दीर्घकालिक विकास और टिकाऊ भविष्य की दिशा में ठोस कदम उठाने की संभावना मजबूत हो सकती है।
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