नई दिल्ली में होने जा रहा इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट अब तक एआई क्षेत्र की सबसे बड़ी बैठकों में से एक माना जा रहा है। दुनिया भर के नेता, बड़े तकनीकी कंपनियों के प्रमुख और एआई संस्थापक इसमें शामिल होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंच के जरिए भारत को वैश्विक एआई दौड़ में मजबूत स्थिति दिलाने की कोशिश करेंगे। भारत अपनी बड़ी डिजिटल आबादी, आधार आधारित पहचान व्यवस्था और मजबूत इंजीनियरिंग प्रतिभा के दम पर एआई में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। सरकार डिजिटल पहचान, भुगतान, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासन के मौजूदा ढांचे में एआई जोड़कर तेज विकास का लक्ष्य रख रही है।
दुनिया भर के नेता, टेक दिग्गज, AI फाउंडर्स और निवेशक नई दिल्ली पहुंचने वाले हैं India AI Impact Summit के लिए। इसे अब तक AI क्षेत्र की सबसे बड़ी गेदरिंग में से एक माना जा रहा है। सोमवार से शुरू हो रहे इस बड़े AI समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के लिए ग्लोबल AI रेस में मजबूत रास्ता बनाने की कोशिश करेंगे।
गेस्ट लिस्ट में बड़े नाम शामिल हैं — Alphabet Inc. के सुंदर पिचाई, OpenAI Inc. के सैम ऑल्टमैन, Anthropic PBC के डारियो अमोदेई, Meta Platforms Inc. के एलेक्जेंडर वांग। साथ ही मशहूर रिसर्चर यान लेकुन और आर्थर मेंश भी शामिल होंगे।
समिट के आखिरी दो दिन — 19 और 20 फरवरी — फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की कीनोट स्पीच से शुरू होंगे, उसके बाद पीएम मोदी संबोधन देंगे। पीएम मोदी के लिए यह समिट एक मौका है दिखाने का कि भारत की बड़ी टेक-सेवी आबादी और इंजीनियरिंग टैलेंट AI की अगली ग्लोबल रेस में देश को आगे ले जा सकते हैं।
भारत के पास एक अरब से ज्यादा लोगों का डिजिटल डेटा है, जो आधार बायोमेट्रिक आईडी सिस्टम से जुड़ा है।
देश ने पहले भी साबित किया है कि वह देर से शुरुआत के बावजूद टेक्नोलॉजी को तेज़ी से स्केल कर सकता है — पर्सनल कंप्यूटर बूम मिस करने के बाद भी सॉफ्टवेयर सर्विस पावरहाउस बनना और कुछ दशकों में सीमित लैंडलाइन से लगभग एक अरब स्मार्टफोन तक पहुंचना इसका उदाहरण है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और IT मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव अभिषेक सिंह ने कहा, “डिजिटल आईडी, पेमेंट सिस्टम, हेल्थकेयर, एजुकेशन और गवर्नेंस के मौजूदा ढांचे पर AI जोड़कर भारत सालों का विकास कुछ ही वर्षों में समेटना चाहता है। भारत पहले ही अपना डिजिटल आईडी और पेमेंट मॉडल दूसरे देशों को दे रहा है।
Aadhaar की तर्ज पर बना ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म MOSIP अब फिलीपींस, मोरक्को और युगांडा जैसे देशों को नेशनल ID सिस्टम बनाने में मदद कर रहा है। कुछ देश इसी ढांचे पर डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म भी बना रहे हैं।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के Institute for Human-Centered AI के अनुसार, AI प्रतिस्पर्धा में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है — अमेरिका और चीन के बाद। ग्लोबल टेक कंपनियां भी भारत पर नजर रखे हुए हैं। OpenAI और Anthropic भारत में अपने ऑपरेशन बढ़ा रहे हैं और एंटरप्राइज ग्राहकों, डेवलपर्स और सरकारी एजेंसियों से जुड़ रहे हैं।
Google और Meta तेजी से बढ़ते मार्केट के लिए डेटा सेंटर विस्तार कर रहे हैं, जहां ChatGPT, Gemini और Claude जैसे मॉडल लोकप्रिय हो रहे हैं। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि रिसर्च और डेवलपमेंट में वर्षों की कम निवेश भारत की AI ग्रोथ को धीमा कर सकती है।
Activate फंड के फाउंडर आक्रित वैष ने कहा कि असली सफलता तब मिलेगी जब भारत अपना रिसर्च इकोसिस्टम मजबूत करेगा, ताकि वह सिर्फ “सिलिकॉन वैली के एल्गोरिद्म की टेस्टिंग लैब” न बनकर रह जाए। भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए लोकल मॉडल पर काम शुरू हो चुका है।
इस हफ्ते कई ऐसे सिस्टम लॉन्च होंगे जो दर्जनों भारतीय भाषाओं के लिए voice-first तरीके से काम करेंगे। सरकार समर्थित BharatGen, जो देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों के रिसर्च से बना है, Param2 नाम का 17-बिलियन पैरामीटर मॉडल पेश करेगा, जो 22 भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करेगा।
Sarvam AI, जिसे Lightspeed Venture Partners और Khosla Ventures का समर्थन है, इससे भी बड़ा voice-first मॉडल पेश करेगा। इन दोनों प्रोजेक्ट्स का मकसद कम लागत वाला AI आम जनता तक पहुंचाना है, ताकि क्लासरूम, क्लिनिक और खेत तक बदलाव लाया जा सके।
अमेरिकी कंपनियों के लिए लोकल मॉडल से बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारत में AI बिजनेस से मुनाफा कमाने में देरी कर सकती है, जैसा चीन में देखा गया है। कम लागत पर फोकस जानबूझकर किया जा रहा है और यह गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
BharatGen के CEO ऋषि बाल ने कहा, “हमारा मॉडल गवर्नेंस, एजुकेशन, हेल्थकेयर और खेती जैसे अहम क्षेत्रों में तेजी से अपनाने के लिए डिजाइन किया गया है।
Sentient AI के सह-संस्थापक हिमांशु त्यागी का मानना है कि अगर भारत साइंस और रोबोटिक्स में एडवांस रीजनिंग जैसे क्षेत्रों पर फोकस करे, तो वह खोया हुआ समय वापस पा सकता है, क्योंकि “इंटेलिजेंस की अगली लहर इंटरनेट के डेटा पर नहीं चलेगी।”
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