नीदरलैंड और ब्रिटेन की सरकारों ने अतीत में अपनाई गई जबरन गोद लेने की नीतियों के लिए आधिकारिक माफी मांगी है। दशकों तक हजारों अविवाहित महिलाओं पर बच्चों को गोद देने का दबाव बनाया गया। अब मानवाधिकार संगठन प्रभावित लोगों के लिए मुआवजा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सरकारी रिकॉर्ड तक पूरी पहुंच की मांग कर रहे हैं।
दुनिया के कई देशों में बीते दशकों के दौरान अपनाई गई जबरन गोद लेने (Forced Adoption) की नीतियां एक बार फिर चर्चा में हैं। हाल ही में नीदरलैंड और ब्रिटेन की सरकारों ने स्वीकार किया कि अतीत में ऐसी नीतियों के कारण हजारों महिलाओं और उनके बच्चों को गंभीर मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक पीड़ा झेलनी पड़ी। दोनों देशों ने इस ऐतिहासिक अन्याय के लिए आधिकारिक माफी मांगी है।
मानवाधिकार संगठनों और पीड़ित परिवारों का कहना है कि सरकारों की माफी एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन केवल माफी से दशकों का दर्द खत्म नहीं होगा। उनका मानना है कि प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
किन महिलाओं को बनाया गया निशाना? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर 1970 और 1980 के दशक तक यूरोप के कई हिस्सों में अविवाहित महिलाओं के मां बनने को सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता था। ऐसे मामलों में कई महिलाओं पर परिवार, चर्च, सामाजिक संस्थाओं और कुछ सरकारी व्यवस्थाओं की ओर से बच्चों को गोद देने के लिए दबाव बनाया जाता था। कई महिलाओं ने बाद में बताया कि उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि बच्चे को छोड़ देना ही उसके भविष्य के लिए बेहतर होगा। कुछ मामलों में मां की पूरी सहमति भी नहीं ली गई और बच्चों को गोद देने की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
नीदरलैंड ने क्या कहा? नीदरलैंड सरकार ने स्वीकार किया कि उस दौर में कई महिलाओं के साथ अन्याय हुआ। सरकार ने माना कि सामाजिक व्यवस्था और संबंधित संस्थाएं महिलाओं की स्वतंत्र इच्छा का सम्मान करने में विफल रहीं। आधिकारिक माफी के साथ सरकार ने इस पूरे मामले को देश के इतिहास का एक दुखद अध्याय बताया।
ब्रिटेन में भी वर्षों से उठ रही थी मांग ब्रिटेन में भी लंबे समय से पीड़ित महिलाएं और मानवाधिकार संगठन सरकार से औपचारिक माफी की मांग कर रहे थे। कई संसदीय रिपोर्टों और स्वतंत्र जांचों में यह सामने आया कि हजारों महिलाओं पर बच्चों को गोद देने के लिए मानसिक और सामाजिक दबाव डाला गया था। इसके बाद सरकार ने अपनी भूमिका स्वीकार करते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।
पीड़ितों की क्या मांग है? प्रभावित परिवारों का कहना है कि सिर्फ माफी काफी नहीं है। वे चाहते हैं कि सरकारें उन सभी लोगों को उनके पुराने सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध कराएं, ताकि वर्षों पहले अलग हुए परिवार एक-दूसरे को खोज सकें। इसके अलावा आर्थिक सहायता, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और कानूनी सहयोग भी उपलब्ध कराया जाए। कई पीड़ितों का कहना है कि दशकों बाद भी वे अपने बच्चों या जैविक माता-पिता की तलाश कर रहे हैं। कई मामलों में रिकॉर्ड अधूरे या गोपनीय होने के कारण परिवारों का मिलना अब भी मुश्किल बना हुआ है।
मानवाधिकार संगठनों की राय मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन उसके साथ प्रभावी पुनर्वास कार्यक्रम भी होने चाहिए। उनका कहना है कि जिन लोगों का बचपन या मातृत्व उनसे छीन लिया गया, उनके लिए केवल औपचारिक माफी पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
इतिहास से सीख विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में अलग-अलग समय पर ऐसी नीतियां लागू की गई थीं, जिनमें महिलाओं की इच्छा और अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। आज इन मामलों की दोबारा समीक्षा कर सरकारें अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार कर रही हैं। नीदरलैंड और ब्रिटेन की हालिया माफी को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि प्रभावित परिवारों का कहना है कि वास्तविक न्याय तभी होगा, जब माफी के साथ ठोस कार्रवाई, पारदर्शिता और पुनर्वास की प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी।
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