उत्तर प्रदेश के मथुरा में साइबर ठगों ने खुद को CBI अधिकारी बताकर एक पूर्व रिफाइनरी अधिकारी को मनी लॉन्ड्रिंग जांच का डर दिखाया और अलग-अलग खातों में 44 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
उत्तर प्रदेश के मथुरा में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें ठगों ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) का अधिकारी बताकर एक पूर्व रिफाइनरी अधिकारी से 44 लाख रुपये की ठगी कर ली। मामले की एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और साइबर अपराधियों तक पहुंचने के लिए बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और कॉल रिकॉर्ड की पड़ताल की जा रही है।
जानकारी के अनुसार, मथुरा की चंद्रलोक कॉलोनी निवासी पूर्व रिफाइनरी अधिकारी गोपाल प्रसाद को 7 मार्च को एक महिला का फोन आया। कॉल करने वाली ने खुद को CBI अधिकारी बताया और दावा किया कि उनका नाम कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक मामले में सामने आया है। इसके बाद पीड़ित पर लगातार मानसिक दबाव बनाया गया और उन्हें कानूनी कार्रवाई का भय दिखाया गया।
एफआईआर के मुताबिक, साइबर ठगों ने बातचीत के दौरान खुद को जांच एजेंसियों से जुड़ा अधिकारी बताते हुए विश्वास जीतने की कोशिश की। उन्होंने कथित जांच प्रक्रिया का हवाला देते हुए गोपाल प्रसाद से कहा कि यदि वे सहयोग नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है। इसी डर का फायदा उठाकर ठगों ने अलग-अलग बैंक खातों में कई चरणों में पैसे ट्रांसफर करा लिए। कुल मिलाकर 44 लाख रुपये की रकम उनके खातों से निकल गई।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ठगी की पूरी वारदात योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी गई। साइबर अपराधियों ने पहले पीड़ित का भरोसा जीता, फिर जांच और गिरफ्तारी का भय दिखाकर उन्हें लगातार निर्देश दिए। इस दौरान पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि पैसा जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और बाद में वापस कर दिया जाएगा।
साइबर अपराध की दुनिया में इस तरह की ठगी को 'ऑथोरिटी इम्पर्सनेशन' कहा जाता है। इसमें अपराधी CBI, RBI, आयकर विभाग, पुलिस, बैंक या अन्य सरकारी संस्थानों के अधिकारी बनकर लोगों से संपर्क करते हैं। वे कानूनी कार्रवाई, गिरफ्तारी, बैंक खाता फ्रीज होने या वित्तीय जांच का डर दिखाकर लोगों से गोपनीय जानकारी या पैसे हासिल करने की कोशिश करते हैं।
पुलिस का कहना है कि मामले में संबंधित मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन की जांच की जा रही है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से धन के प्रवाह और इस्तेमाल किए गए खातों का पता लगाया जा रहा है। हालांकि ऐसे मामलों में पूरी रकम की रिकवरी आसान नहीं होती, क्योंकि अपराधी अक्सर फर्जी बैंक खाते, किराए के खाते और तेजी से बदलते डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं।
हाल के वर्षों में देशभर में इस तरह की साइबर ठगी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। जांच एजेंसियों के नाम पर लोगों को डराकर पैसे ऐंठने का तरीका साइबर अपराधियों के बीच तेजी से फैल रहा है। बुजुर्ग, सेवानिवृत्त कर्मचारी और डिजिटल लेनदेन पर कम जानकारी रखने वाले लोग अक्सर ऐसे गिरोहों के निशाने पर रहते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी सरकारी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति से जांच के नाम पर बैंक खाते में रकम ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। यदि कोई व्यक्ति खुद को CBI, पुलिस, RBI, ED, आयकर विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पैसे जमा कराने, बैंक खाते की जानकारी देने या गोपनीय सूचना साझा करने के लिए दबाव बनाता है, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। ऐसे मामलों में कॉल पर भरोसा करने के बजाय संबंधित विभाग के आधिकारिक माध्यमों से जानकारी की पुष्टि करें और तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या www.
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