केरल में शिगेला बैक्टीरियल संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 267 हो गई है। चार जिलों में प्रकोप घोषित करने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों, स्कूलों और स्थानीय निकायों को निगरानी बढ़ाने तथा स्वच्छता संबंधी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं।
"केरल में शिगेला बैक्टीरियल संक्रमण के बढ़ते मामलों ने राज्य के स्वास्थ्य तंत्र की चुनौती बढ़ा दी है। राज्य में अब तक संक्रमण के 267 मामले दर्ज किए जा चुके हैं और चार जिलों में आधिकारिक तौर पर शिगेला का प्रकोप घोषित किया गया है। मामलों में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों, स्कूलों और पंचायतों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं, जिनमें साफ-सफाई, सुरक्षित पेयजल, संक्रमण की समय पर पहचान और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि अभी संक्रमण नियंत्रण के दायरे में है, लेकिन मानसून के दौरान दूषित पानी और जलभराव जैसी परिस्थितियां इस बैक्टीरिया के फैलाव का जोखिम बढ़ा सकती हैं। इसी वजह से संबंधित जिलों में निगरानी बढ़ाने के साथ स्थानीय प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
मलयालम दैनिक Mathrubhumi की रिपोर्ट के अनुसार, कोल्लम जिले में एक नया मामला सामने आने के बाद राज्य में कुल संक्रमितों की संख्या 267 तक पहुंच गई। इसके बाद चार जिलों में औपचारिक रूप से आउटब्रेक घोषित किया गया है। स्वास्थ्य विभाग इन क्षेत्रों में क्लस्टर आधारित निगरानी, संपर्क में आए लोगों की पहचान और संक्रमण की श्रृंखला को रोकने के लिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर काम कर रहा है।
शिगेला एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो मुख्य रूप से दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलता है। यह संक्रमण आंतों को प्रभावित करता है और संक्रमित व्यक्ति में दस्त, बुखार, पेट दर्द तथा डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरक्षा क्षमता वाले लोगों में इसका असर अपेक्षाकृत अधिक गंभीर हो सकता है। समय पर इलाज मिलने से अधिकांश मरीज ठीक हो जाते हैं, लेकिन लक्षणों को नजरअंदाज करना जोखिम बढ़ा सकता है।
संक्रमण रोग विशेषज्ञों का मानना है कि शिगेला के उपचार में सही एंटीबायोटिक का चयन और शरीर में पानी की कमी को दूर करना महत्वपूर्ण होता है। सबसे बड़ी चुनौती शुरुआती पहचान की है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण कई अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमणों से मिलते-जुलते हैं। ऐसे में मरीज की समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह आवश्यक मानी जाती है।
केरल पहले भी नीपा वायरस और बाढ़ के बाद फैलने वाले जलजनित रोगों जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर चुका है। इसी अनुभव को देखते हुए राज्य सरकार इस बार शुरुआती स्तर पर ही निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और संक्रमण को सीमित रखने की रणनीति पर काम कर रही है। स्वास्थ्य विभाग का उद्देश्य संभावित संक्रमण श्रृंखला को शुरुआती चरण में ही रोकना है ताकि मामलों में तेजी से बढ़ोतरी न हो।
नई गाइडलाइंस के तहत अस्पतालों को संदिग्ध मरीजों की शीघ्र जांच और रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं स्कूलों और स्थानीय निकायों से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने, शौचालयों की साफ-सफाई बनाए रखने और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता संबंधी नियमों का पालन कराने को कहा गया है। जल स्रोतों की गुणवत्ता की निगरानी पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे केवल उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी पिएं, भोजन तैयार करने और खाने से पहले हाथों की अच्छी तरह सफाई करें तथा खुले में बिकने वाले भोजन का सेवन करते समय सावधानी बरतें। यदि किसी बच्चे या परिवार के सदस्य में लगातार दस्त, बुखार या डिहाइड्रेशन के लक्षण दिखाई दें तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करें।
मानसून के मौसम में जलजनित और खाद्यजनित संक्रमणों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि व्यक्तिगत स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल और समय पर चिकित्सकीय सलाह ही संक्रमण को नियंत्रित रखने में सबसे प्रभावी उपाय हैं। राज्य स्वास्थ्य विभाग प्रभावित जिलों की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और आवश्यकता के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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