जून 2026 की एक नई क्लाइमेट रिपोर्ट के अनुसार, AI और डेटा सेंटर्स का पर्यावरण पर असर तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2025 में दुनिया भर के डेटा सेंटर्स ने करीब 448 टेरावॉट-घंटे बिजली की खपत की, जिससे लगभग 189 मिलियन टन CO₂-इक्विवेलेंट कार्बन उत्सर्जन हुआ।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है। चैटबॉट, इमेज जनरेशन, वीडियो रिकमेंडेशन और कई डिजिटल सेवाओं के पीछे बड़े डेटा सेंटर्स लगातार काम करते हैं। लेकिन इन सुविधाओं के साथ पर्यावरण पर बढ़ रहे दबाव को लेकर अब नई चिंताएं सामने आने लगी हैं। जून 2026 के क्लाइमेट राउंड-अप में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने AI और डेटा सेंटर्स के पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़े कई महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया भर के डेटा सेंटर्स ने लगभग 448 टेरावॉट-घंटे (TWh) बिजली की खपत की। यदि डेटा सेंटर्स को एक अलग देश माना जाए तो बिजली की खपत के आधार पर वे दुनिया के 11वें सबसे बड़े उपभोक्ता होते। यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इतनी बिजली की मात्रा सब-सहारन अफ्रीका के करीब 1.
3 अरब लोगों की घरेलू बिजली जरूरतों को लगभग 2. 6 वर्षों तक पूरा करने के बराबर है। यह तुलना केवल इस बात को समझाने के लिए की गई है कि डेटा सेंटर्स की ऊर्जा खपत कितनी बड़ी है।
बिजली की इस खपत का असर केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में डेटा सेंटर्स से लगभग 189 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂-इक्विवेलेंट) का उत्सर्जन हुआ। कार्बन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजहों में माना जाता है और दुनिया भर के देश इसे कम करने के लिए अलग-अलग योजनाओं पर काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि इस कार्बन उत्सर्जन की भरपाई करने के लिए लगभग 3.2 अरब पेड़-पौधों को 10 वर्षों तक उगाना पड़ेगा। इस तुलना का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन के पैमाने को समझाना है।
डेटा सेंटर्स का असर केवल बिजली और कार्बन तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार इन सेंटर्स में इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा भी काफी अधिक है। वर्ष 2025 में डेटा सेंटर्स ने इतना पानी उपयोग किया कि उससे लगभग 18 लाख ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक यह पानी की मात्रा सब-सहारन अफ्रीका के लगभग 60 करोड़ लोगों की बुनियादी घरेलू पानी की जरूरतों के बराबर है। डेटा सेंटर्स में सर्वर को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है, इसलिए पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट में भूमि उपयोग का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि डेटा सेंटर्स की बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए जितनी भूमि की आवश्यकता पड़ी, वह ग्रेटर लंदन के क्षेत्रफल से लगभग 4.5 गुना अधिक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रभाव केवल बिजली तक सीमित नहीं बल्कि भूमि संसाधनों पर भी पड़ रहा है।
पर्यावरण से जुड़े अन्य विश्लेषणों और एपी की रिपोर्टों में भी इस विषय पर चिंता जताई गई है। इन रिपोर्टों के अनुसार AI और बड़े डेटा सेंटर्स बिजली, पानी और भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं। यह चुनौती उन देशों में अधिक गंभीर हो सकती है जहां बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा अब भी कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI तकनीक का विस्तार जारी रहेगा, इसलिए भविष्य की नीतियों में केवल तकनीकी विकास पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन और टिकाऊ विकास को भी प्राथमिकता देनी होगी। ऊर्जा दक्ष डेटा सेंटर्स, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग और बेहतर कूलिंग तकनीक जैसे उपाय इस दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
यह विषय आम लोगों से भी जुड़ा हुआ है। आज करोड़ों लोग रोजाना AI आधारित सेवाओं का उपयोग करते हैं, लेकिन इन सेवाओं के पीछे चलने वाले विशाल डेटा सेंटर्स की ऊर्जा और संसाधन जरूरतें अक्सर दिखाई नहीं देतीं। रिपोर्ट इसी अदृश्य ढांचे की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
भारत जैसे तेजी से डिजिटल हो रहे देशों के सामने भी एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी। देश में AI और डेटा आधारित सेवाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है। ऐसे में भविष्य के डेटा सेंटर्स को अधिक ऊर्जा दक्ष, पानी की कम खपत वाले और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की आवश्यकता होगी। इससे तकनीकी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा।
नई रिपोर्ट यह संकेत देती है कि AI केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि इसके साथ ऊर्जा, पानी, भूमि और जलवायु से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू भी जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में AI का विस्तार जितनी तेजी से होगा, उतनी ही गंभीरता से इसके पर्यावरणीय प्रभावों पर भी ध्यान देना आवश्यक होगा।
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