महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में इस साल अल्फांसो (हापुस) आम की पैदावार पर भीषण गर्मी और एल नीनो के असर का गहरा प्रभाव पड़ा है। उत्पादन घटने से किसानों की आय पर दबाव बढ़ा है, जबकि बाजार में कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।
"देश और विदेश में अपनी खास मिठास और गुणवत्ता के लिए पहचान रखने वाला हापुस (अल्फांसो) आम इस साल मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहा है। महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में इस प्रीमियम आम की फसल पर हीटवेव और एल नीनो के प्रभाव ने गंभीर असर डाला है, जिससे उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
मौसम से जुड़े असामान्य बदलावों ने आम के बागानों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। किसानों का कहना है कि इस बार फूल आने की प्रक्रिया सामान्य नहीं रही। कई जगहों पर फूल समय से पहले झड़ गए, जबकि जिन पेड़ों पर फल लगे भी, उनमें से बड़ी संख्या में फल पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए। कई बागानों में कच्चे फल समय से पहले गिरने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
अल्फांसो आम की खेती विशेष जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर मानी जाती है। फसल के शुरुआती चरण में संतुलित तापमान और पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। इस साल लंबे समय तक बनी गर्मी और मौसम के बदले पैटर्न ने इन परिस्थितियों को प्रभावित किया, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा।
एल नीनो को भी इस स्थिति का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। यह एक वैश्विक जलवायु घटना है, जो समुद्री सतह के तापमान में बदलाव के कारण दुनिया भर के मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है। इसके चलते कई क्षेत्रों में वर्षा कम हो सकती है, जबकि कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश की स्थिति बन सकती है। भारत में भी एल नीनो का असर कृषि और मानसून पर पड़ता रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, महाराष्ट्र के कई आम उत्पादक क्षेत्रों में किसानों को इस बार अपेक्षित उत्पादन नहीं मिला। जिन बागानों से हर साल अच्छी मात्रा में फल बाजार तक पहुंचते थे, वहां उत्पादन घटने से कारोबार पर असर पड़ने की आशंका है। अल्फांसो आम पहले से ही उच्च कीमत वाला फल माना जाता है और सीमित आपूर्ति के कारण बाजार में इसके दाम बढ़ सकते हैं।
इसका प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहने वाला है। उपभोक्ताओं को भी इस सीजन में हापुस आम खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। उत्पादन कम होने की स्थिति में बाजार में उपलब्धता घटती है, जिससे मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ जाता है।
कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि बदलती जलवायु परिस्थितियां अब केवल अनाज वाली फसलों तक सीमित चुनौती नहीं हैं। फल उत्पादन, विशेष रूप से आम जैसी संवेदनशील बागवानी फसलें, मौसम में छोटे बदलावों से भी प्रभावित हो सकती हैं। लगातार बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा के कारण किसानों को नई रणनीतियों की जरूरत महसूस हो रही है।
विशेषज्ञ बेहतर सिंचाई प्रबंधन, शेड नेट जैसी तकनीकों के उपयोग, फसल विविधीकरण और जल संरक्षण उपायों को महत्वपूर्ण बता रहे हैं। इसके साथ ही फसल बीमा योजनाओं की पहुंच बढ़ाने और जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखकर कृषि नीति तैयार करने की आवश्यकता भी रेखांकित की जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र और कई वैज्ञानिक संस्थानों ने भी एल नीनो के वैश्विक प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। उनके अनुसार, यह घटना दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मौसम की चरम स्थितियों को बढ़ा सकती है। दक्षिणी ब्राज़ील जैसे क्षेत्रों में बाढ़ या सूखे का जोखिम बढ़ने की चेतावनी भी दी गई है।
हापुस आम की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता अब कृषि उत्पादन के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। किसानों और नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी जरूरत ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करने की है, जो मौसम से जुड़े बढ़ते जोखिमों के बीच फसलों और किसानों की आय दोनों को सुरक्षित रख सकें।
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