NATO ने पुष्टि की है कि 7 और 8 जुलाई 2026 को तुर्की की राजधानी अंकारा में गठबंधन का अगला शिखर सम्मेलन आयोजित होगा। यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व की अस्थिरता, माइग्रेशन संकट और उभरते सुरक्षा खतरों के बीच यह बैठक NATO की भविष्य की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
"NATO का अगला शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई 2026 को तुर्की की राजधानी अंकारा में आयोजित किया जाएगा। आधिकारिक घोषणा के साथ ही इस बैठक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि यह ऐसे दौर में होने जा रही है जब यूरोप और उसके आसपास का सुरक्षा परिदृश्य लगातार बदल रहा है। यह 2004 में इस्तांबुल में हुए सम्मेलन के बाद दूसरा मौका होगा जब तुर्की NATO सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं की मेजबानी करेगा।
लगभग दो दशक बाद तुर्की को फिर से यह जिम्मेदारी मिलना उसकी रणनीतिक भूमिका को भी रेखांकित करता है। यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के संगम पर स्थित तुर्की लंबे समय से गठबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। NATO के महासचिव मार्क रुटे ने बताया है कि यह शिखर सम्मेलन अंकारा स्थित बेष्तेपे प्रेसिडेंशियल कंपाउंड में आयोजित होगा। इसे NATO का 36वां शिखर सम्मेलन माना जा रहा है, जिसमें सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख शामिल होंगे। बैठक में गठबंधन की सामूहिक सुरक्षा रणनीति से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विचार होने की संभावना है।
सम्मेलन का सबसे प्रमुख विषय रूस-यूक्रेन युद्ध रहने की उम्मीद है। यूक्रेन को दी जा रही सैन्य और आर्थिक सहायता, उसकी दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था और रूस के साथ भविष्य के संबंधों की दिशा पर सदस्य देशों के बीच विस्तृत चर्चा हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में इस युद्ध ने यूरोपीय सुरक्षा ढांचे को गहराई से प्रभावित किया है और NATO की प्राथमिकताओं को भी बदल दिया है। पूर्वी मोर्चे के साथ-साथ गठबंधन के सामने दक्षिणी क्षेत्र की चुनौतियां भी लगातार बढ़ी हैं।
भूमध्यसागर, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व में जारी अस्थिरता, आतंकवाद से जुड़े खतरे और शरणार्थियों के बढ़ते प्रवाह ने सुरक्षा चिंताओं को नया आयाम दिया है। सीरिया, लीबिया और साहेल क्षेत्र से जुड़े घटनाक्रम भी एजेंडे का हिस्सा बन सकते हैं। प्रवासियों के समुद्री मार्गों को लेकर सदस्य देशों के बीच बेहतर समन्वय पर भी चर्चा की संभावना जताई जा रही है।
तुर्की की भौगोलिक स्थिति इन मुद्दों को और महत्वपूर्ण बना देती है। एक ओर वह यूरोप की सुरक्षा संरचना का हिस्सा है, तो दूसरी ओर उसका सीधा संपर्क मध्य पूर्व और एशियाई क्षेत्रों से है। यही वजह है कि कई विश्लेषक तुर्की को NATO के लिए ""फ्रंटलाइन स्टेट"" के रूप में देखते हैं। सुरक्षा चुनौतियों का दायरा अब पारंपरिक सैन्य खतरों तक सीमित नहीं रहा है। NATO के भीतर हाल के वर्षों में ""360-डिग्री सिक्योरिटी"" की अवधारणा पर जोर बढ़ा है। इसका अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि साइबर हमलों, दुष्प्रचार अभियानों, अंतरिक्ष सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को भी सामूहिक सुरक्षा ढांचे में शामिल करना है।
इसके साथ ही चीन को लेकर गठबंधन की रणनीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य प्रणालियों के इस्तेमाल और साइबर सुरक्षा के नए मानकों पर भी सदस्य देशों को साझा दृष्टिकोण विकसित करना होगा। बदलती तकनीक ने रक्षा नीति को नई दिशा दी है और NATO भी इसके अनुरूप अपनी प्राथमिकताएं तय करने की कोशिश कर रहा है
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