पेरू के राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला बेहद करीबी हो गया है। 99 फीसदी के करीब मतगणना पूरी होने के बाद भी वामपंथी रोबर्टो सांचेज़ और दक्षिणपंथी केइको फुजिमोरी के बीच बढ़त कुछ सौ से कुछ हजार वोटों के दायरे में सिमटी हुई है।
"दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा अब तक साफ नहीं हो पाया है। लगभग पूरी मतगणना होने के बावजूद दोनों प्रमुख उम्मीदवारों के बीच अंतर इतना कम है कि देशभर में लोग अंतिम घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों में कभी वामपंथी उम्मीदवार रोबर्टो सांचेज़ बढ़त बनाते दिखाई देते हैं तो कभी दक्षिणपंथी नेता केइको फुजिमोरी मामूली अंतर से आगे निकल जाती हैं।
ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 98 से 99 फीसदी तक वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है, लेकिन दोनों उम्मीदवारों के बीच अंतर कुछ सौ से लेकर कुछ हजार वोटों के बीच बना हुआ है। यही वजह है कि चुनावी नतीजों को लेकर अनिश्चितता का माहौल कायम है और राजनीतिक हलकों से लेकर आम नागरिकों तक सभी की निगाहें चुनाव अधिकारियों पर टिकी हुई हैं।
पेरू लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता का सामना करता रहा है। पिछले एक दशक में देश ने कई राष्ट्रपति देखे हैं। भ्रष्टाचार के आरोप, संसद और सरकार के बीच टकराव तथा बार-बार होने वाले राजनीतिक संकटों ने जनता के भरोसे को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में हुए इस चुनाव को पेरू की दिशा तय करने वाले अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
चुनावी मुकाबले में केइको फुजिमोरी एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। वह पूर्व राष्ट्रपति अल्बर्टो फुजिमोरी की बेटी हैं और कानून-व्यवस्था को सख्ती से लागू करने तथा निवेश-अनुकूल आर्थिक नीतियों की समर्थक मानी जाती हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि पेरू को आर्थिक स्थिरता और अपराध नियंत्रण के लिए मजबूत नेतृत्व की जरूरत है।
दूसरी ओर, रोबर्टो सांचेज़ ने सामाजिक न्याय और आय असमानता को अपने चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा बनाया। उनका जोर इस बात पर रहा कि देश की प्राकृतिक संपदा, खासकर खनन क्षेत्र से होने वाली आय का लाभ गरीब और उपेक्षित इलाकों तक पहुंचना चाहिए। उनके समर्थक इसे सामाजिक संतुलन और आर्थिक समानता की दिशा में जरूरी बदलाव मानते हैं।
चुनावी तस्वीर मतगणना के अलग-अलग चरणों में लगातार बदलती रही। शुरुआती दौर में आधिकारिक गिनती के एक चरण में फुजिमोरी को 52.65 फीसदी और सांचेज़ को 47.35 फीसदी वोट मिलते दिखाई दिए थे, लेकिन उस समय कुल मतों का लगभग आधा हिस्सा ही गिना गया था। बाद के चरणों में अंतर तेजी से कम होता गया।
प्रतिष्ठित सर्वे एजेंसी इप्सोस के क्विक काउंट ने भी इस चुनाव की कांटे की टक्कर को उजागर किया। कुछ अनुमानों में सांचेज़ को 50.3 फीसदी और फुजिमोरी को 49.7 फीसदी समर्थन मिलता दिखा, जबकि अन्य चरणों में स्थिति सांख्यिकीय रूप से ""टेक्निकल टाई"" तक पहुंच गई, जहां किसी एक उम्मीदवार को स्पष्ट बढ़त देना संभव नहीं था।
ग्रामीण इलाकों और विदेशों से डाले गए मतों की गिनती आगे बढ़ने के साथ चुनावी समीकरण कई बार बदले। रिपोर्टों के अनुसार करीब 1,600 मतदान केंद्रों के नतीजों को लेकर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। इन विवादित बैलेट्स की जांच राष्ट्रीय चुनाव जूरी (JNE) द्वारा की जा रही है, जिससे अंतिम नतीजों की घोषणा में अतिरिक्त समय लग सकता है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों, जिनमें यूरोपीय संघ और ऑर्गेनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स शामिल हैं, ने अब तक की चुनावी प्रक्रिया को कुल मिलाकर शांतिपूर्ण और व्यवस्थित बताया है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और समर्थकों से आधिकारिक नतीजों का सम्मान करने और धैर्य बनाए रखने की अपील की है।
पेरू के आम नागरिकों के लिए यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है। यह दो अलग-अलग आर्थिक और राजनीतिक सोच के बीच चयन जैसा बन गया है। एक ओर निवेश आधारित विकास और सख्त प्रशासन का मॉडल है, तो दूसरी ओर संसाधनों के पुनर्वितरण और कल्याणकारी नीतियों की मांग। बेहद करीबी मुकाबले और विवादित मतों की जांच के कारण देश में राजनीतिक अनिश्चितता कुछ समय तक बनी रह सकती है, जिसका असर रोजगार, महंगाई और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी पड़ सकता है।
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