जयपुर और जैसलमेर के बीच गर्मियों में शुरू की गई समर फ्लाइट सेवा महज छह हफ्ते बाद बंद हो गई। कमजोर यात्री संख्या और ऑफ-सीजन में मांग नहीं बनने से एयरलाइन को करीब 90 लाख रुपये के नुकसान का सामना करना पड़ा।
"राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर गर्मियों में नई संभावनाएं तलाशने के उद्देश्य से शुरू की गई जयपुर–जैसलमेर समर फ्लाइट सेवा उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। 3 मई को शुरू हुई यह उड़ान 14 जून को अपनी आखिरी सेवा देने के बाद बंद कर दी गई। महज छह हफ्तों में इस रूट का संचालन रोक दिया जाना पर्यटन उद्योग और स्थानीय कारोबारियों के लिए निराशाजनक खबर माना जा रहा है।
इस फ्लाइट को ऐसे समय शुरू किया गया था जब जैसलमेर में पर्यटन गतिविधियां अपने सबसे कमजोर दौर में होती हैं। सर्दियों में देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों से गुलजार रहने वाला स्वर्णनगरी जैसलमेर गर्मियों में अपेक्षाकृत शांत रहता है। मई और जून के दौरान यहां तापमान कई बार 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिससे अवकाश मनाने वाले यात्रियों की संख्या स्वाभाविक रूप से घट जाती है।
इसी चुनौती को अवसर में बदलने की कोशिश के तहत जयपुर और जैसलमेर के बीच सप्ताह में दो दिन समर फ्लाइट शुरू की गई थी। उम्मीद थी कि इससे ऑफ-सीजन में भी कुछ यात्री यातायात बना रहेगा। पर्यटन कारोबार से जुड़े लोग यह मानकर चल रहे थे कि यदि शुरुआत सफल रही तो जैसलमेर को सालभर बेहतर हवाई कनेक्टिविटी मिल सकती है। कॉन्फ्रेंस टूरिज्म, कॉर्पोरेट यात्राएं और वीकेंड ट्रैवल को भी इससे बढ़ावा मिलने की संभावना जताई जा रही थी।
लेकिन शुरुआत से ही इस सेवा को पर्याप्त यात्री नहीं मिले। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कई उड़ानों में केवल 20 से 25 यात्रियों ने सफर किया। जबकि ATR श्रेणी के विमानों के संचालन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखने के लिए आमतौर पर 60 से 70 प्रतिशत लोड फैक्टर जरूरी माना जाता है। कम बुकिंग के चलते हर उड़ान एयरलाइन के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी।
रिपोर्ट्स में बताया गया है कि लगभग छह हफ्तों के दौरान कुल 12 रोटेशन के बाद एयरलाइन ने ""ऑपरेशनल कारणों"" का हवाला देते हुए सेवा स्थगित कर दी। अनुमान है कि इस अवधि में ईंधन, क्रू, एयरपोर्ट शुल्क और ग्राउंड हैंडलिंग जैसी परिचालन लागत को मिलाकर कंपनी को करीब 90 लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।
स्थानीय टूर ऑपरेटरों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी के साथ-साथ सीमित प्रचार-प्रसार और अपेक्षाकृत कम तैयारी भी इस रूट की कमजोर शुरुआत की वजह बनी। उनका कहना है कि किसी भी नए हवाई मार्ग को स्थिर होने में समय लगता है। यदि एयरलाइन, होटल उद्योग, ट्रैवल एजेंसियां और पर्यटन विभाग मिलकर पैकेज आधारित रणनीति तैयार करें तो ऑफ-सीजन पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में इस वर्ष भी भीषण गर्मी का असर देखने को मिला। मौसम विभाग ने कई बार हीटवेव को लेकर चेतावनी जारी की। ऐसे हालात में दिन के समय पर्यटकों को रेगिस्तानी पर्यटन के लिए आकर्षित करना आसान नहीं रहा। इसका असर हवाई यात्रा की मांग पर भी पड़ा।
इस सेवा के बंद होने का असर केवल एयरलाइन तक सीमित नहीं है। स्थानीय होटल व्यवसायियों, टैक्सी चालकों और पर्यटक गाइडों को भी इससे अतिरिक्त आय की उम्मीद थी। समर सीजन में पर्यटन गतिविधियों को सहारा देने वाली यह पहल समय से पहले थम गई है। फिलहाल यह अनुभव इस बात की ओर इशारा करता है कि मरु-पर्यटन के ऑफ-सीजन बाजार को विकसित करने के लिए केवल उड़ान शुरू करना पर्याप्त नहीं, बल्कि दीर्घकालिक योजना और समन्वित रणनीति की भी जरूरत होती है।"
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