संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार AI और डेटा सेंटर्स की बढ़ती मांग से बिजली, पानी और जमीन की खपत तेजी से बढ़ रही है। 2025 में डेटा सेंटर्स ने 448 टेरावॉट-घंटे बिजली और भारी मात्रा में पानी का उपयोग किया, जिससे जलवायु पर दबाव बढ़ा है। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि AI उद्योग के विस्तार के साथ यह समस्या और गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञ ग्रीन डेटा सेंटर्स, नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की तेज़ी से बढ़ती दुनिया ने तकनीक, व्यापार, शिक्षा और दैनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। चैटबॉट्स, जेनरेटिव AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और मशीन लर्निंग आधारित सेवाओं का उपयोग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इस तकनीकी विस्तार के साथ एक नया पर्यावरणीय सवाल भी सामने आ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि AI और डेटा सेंटर्स की बढ़ती मांग ऊर्जा, पानी और भूमि जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया भर के डेटा सेंटर्स ने लगभग 448 टेरावॉट-घंटे बिजली की खपत की। यह खपत इतनी अधिक है कि यदि डेटा सेंटर्स को एक अलग देश माना जाए तो वे बिजली खपत के आधार पर दुनिया के 11वें सबसे बड़े “देश” के बराबर होंगे। रिपोर्ट का कहना है कि AI आधारित सेवाओं के तेज़ विस्तार ने इस ऊर्जा मांग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
AI और डेटा सेंटर्स की बढ़ती भूमिका आज अधिकांश डिजिटल सेवाएं डेटा सेंटर्स पर निर्भर हैं। चाहे कोई व्यक्ति वीडियो स्ट्रीमिंग कर रहा हो, सोशल मीडिया का उपयोग कर रहा हो, क्लाउड स्टोरेज में फाइलें सेव कर रहा हो या किसी AI टूल से प्रश्न पूछ रहा हो, इन सभी प्रक्रियाओं के पीछे बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग होती है।
डेटा सेंटर्स ऐसे विशाल परिसर होते हैं जहां हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों को चलाने, इंटरनेट सेवाओं को बनाए रखने और AI मॉडल्स को प्रशिक्षित करने के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। AI मॉडल जितने बड़े और जटिल होते हैं, उन्हें संचालित करने के लिए उतनी ही अधिक ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि AI आधारित सेवाओं की बढ़ती लोकप्रियता के कारण आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर्स की ऊर्जा मांग और बढ़ सकती है, यदि तकनीकी दक्षता में पर्याप्त सुधार नहीं किया गया।
ऊर्जा खपत और कार्बन उत्सर्जन की चुनौती संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट केवल बिजली खपत तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर्स की 448 टेरावॉट-घंटे बिजली खपत लगभग 189 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन के बराबर मानी गई है।
यह आंकड़ा जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कार्बन उत्सर्जन पृथ्वी के तापमान में वृद्धि और जलवायु असंतुलन के प्रमुख कारणों में से एक है। रिपोर्ट का अनुमान है कि इस स्तर के उत्सर्जन को संतुलित करने के लिए लगभग 3.2 अरब पेड़ लगाने और उन्हें 10 वर्षों तक बढ़ने देना होगा।
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो यह उत्सर्जन कई मध्यम आकार के देशों के कुल वार्षिक कार्बन उत्सर्जन के बराबर या उससे अधिक बताया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल दुनिया का पर्यावरणीय प्रभाव केवल वर्चुअल नहीं बल्कि वास्तविक और व्यापक है। केवल बिजली नहीं, पानी की भी भारी खपत डेटा सेंटर्स के संचालन में बिजली के साथ-साथ पानी की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बड़े सर्वर लगातार गर्मी उत्पन्न करते हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए विशेष कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में डेटा सेंटर्स ने इतनी मात्रा में पानी का उपयोग किया कि उससे लगभग 1.8 मिलियन ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरे जा सकते थे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि डेटा प्रोसेसिंग का प्रभाव केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी मात्रा का पानी उन लगभग 600 मिलियन लोगों की सालभर की मूलभूत घरेलू आवश्यकताओं के बराबर है जो सब-सहारन अफ्रीका क्षेत्र में रहते हैं। यह तुलना संसाधनों के उपयोग और उनकी प्राथमिकताओं पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है। भूमि उपयोग पर भी बढ़ता दबाव डेटा सेंटर्स का विस्तार केवल बिजली और पानी तक सीमित नहीं है। इनके निर्माण, संचालन और बिजली उत्पादन से जुड़ी संरचनाओं के लिए बड़े भू-भाग की आवश्यकता होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर्स के लिए उपयोग की गई भूमि और उनसे जुड़ी ऊर्जा अवसंरचना का कुल क्षेत्रफल ग्रेटर लंदन के क्षेत्रफल से लगभग 4.5 गुना अधिक बताया गया है। जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं की मांग बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए डेटा सेंटर्स का निर्माण भी बढ़ रहा है। इससे भूमि उपयोग और पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़े प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
AI उद्योग का तेजी से बढ़ता बाजार रिपोर्ट में AI उद्योग की आर्थिक वृद्धि पर भी प्रकाश डाला गया है। वर्ष 2023 में वैश्विक AI उद्योग का आकार लगभग 189 अरब डॉलर आंका गया था। अनुमान है कि वर्ष 2033 तक यह बढ़कर लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि केवल तकनीकी विकास का संकेत नहीं है, बल्कि संसाधनों की मांग में संभावित वृद्धि का भी संकेत देती है। जैसे-जैसे AI सेवाओं का विस्तार होगा, वैसे-वैसे डेटा प्रोसेसिंग और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता भी बढ़ेगी।
विशेष रूप से जेनरेटिव AI का विस्तार इस दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में जेनरेटिव AI कुल AI बाजार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। जेनरेटिव AI और बढ़ती संसाधन मांग जेनरेटिव AI मॉडल बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण करते हैं और नए टेक्स्ट, चित्र, वीडियो या अन्य सामग्री तैयार करते हैं। इन प्रक्रियाओं के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता होती है।
जैसे-जैसे इन सेवाओं का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे डेटा सेंटर्स पर भार भी बढ़ रहा है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि यदि तकनीकी दक्षता और ऊर्जा प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में ऊर्जा और जल संसाधनों पर दबाव और बढ़ सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अधिक कुशल AI मॉडल और ऊर्जा दक्ष डेटा सेंटर्स विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। समाधान की तलाश: ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स का विचार बढ़ती चुनौतियों के बीच कुछ कंपनियां नए समाधान भी तलाश रही हैं। इनमें सबसे चर्चित विचार “ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स” का है।
इस अवधारणा के तहत डेटा प्रोसेसिंग सुविधाओं को पृथ्वी के बजाय अंतरिक्ष में स्थापित करने की संभावना पर काम किया जा रहा है। विचार यह है कि अंतरिक्ष में उपलब्ध प्रत्यक्ष सौर ऊर्जा और प्राकृतिक ठंडे वातावरण का उपयोग करके ऊर्जा और कूलिंग से जुड़ी समस्याओं को कम किया जा सके। यदि यह तकनीक सफल होती है तो पृथ्वी पर बिजली, पानी और भूमि की मांग को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि इस विचार के सामने अभी कई तकनीकी, आर्थिक और संचालन संबंधी चुनौतियां मौजूद हैं।
आम उपयोगकर्ताओं के लिए क्या संदेश? रिपोर्ट केवल सरकारों और कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि आम उपयोगकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देती है। आज अधिकांश लोग प्रतिदिन डिजिटल सेवाओं का उपयोग करते हैं, लेकिन उनके पीछे लगने वाले संसाधनों पर कम ध्यान देते हैं।
हर AI क्वेरी, हर वीडियो स्ट्रीम और हर क्लाउड स्टोरेज गतिविधि के पीछे वास्तविक ऊर्जा, पानी और कंप्यूटिंग संसाधनों का उपयोग होता है। इसलिए डिजिटल सेवाओं का जिम्मेदार उपयोग भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट इस बात की ओर संकेत करती है कि तकनीक का उपयोग करते समय उसके पर्यावरणीय प्रभाव को समझना भी आवश्यक है। ग्रीन डेटा सेंटर्स की जरूरत विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ग्रीन डेटा सेंटर्स की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी। ऐसे डेटा सेंटर्स जो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करें और पानी तथा बिजली की खपत को कम करें, पर्यावरणीय प्रभाव घटाने में मदद कर सकते हैं। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। साथ ही अधिक ऊर्जा दक्ष हार्डवेयर और बेहतर कूलिंग तकनीकों का विकास भी आवश्यक बताया गया है।
सरकारों के सामने नीति संबंधी चुनौती डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ सरकारों के सामने भी नई चुनौतियां उभर रही हैं। रिपोर्ट संकेत देती है कि डिजिटल अवसंरचना नीतियों में जलवायु और संसाधन प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा।
डेटा सेंटर्स आर्थिक विकास और डिजिटल सेवाओं के लिए जरूरी हैं, लेकिन उनके पर्यावरणीय प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए भविष्य की नीतियों में तकनीकी विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा। जानकारी की सीमाएं और भविष्य की दिशा रिपोर्ट में उपयोग किए गए आंकड़े वर्ष 2025 से संबंधित हैं। वर्ष 2026 के लिए पूरी तरह अद्यतन वैश्विक आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। इसलिए वर्तमान स्थिति इन अनुमानों से बेहतर भी हो सकती है और अधिक चुनौतीपूर्ण भी। हालांकि रिपोर्ट में प्रस्तुत रुझान स्पष्ट संकेत देते हैं कि AI और डेटा सेंटर्स की बढ़ती मांग ऊर्जा, पानी और भूमि संसाधनों पर निरंतर दबाव बना रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नीति स्तर पर हस्तक्षेप और तकनीकी नवाचार नहीं किए गए तो इन संसाधनों की खपत में स्वतः कमी आने की संभावना सीमित है।
निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट ने AI और डेटा सेंटर्स के पर्यावरणीय प्रभाव को वैश्विक चर्चा का विषय बना दिया है। वर्ष 2025 में 448 टेरावॉट-घंटे बिजली खपत, 189 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन, 1.8 मिलियन ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूलों के बराबर जल उपयोग और विशाल भूमि आवश्यकता जैसे आंकड़े यह दिखाते हैं कि डिजिटल दुनिया की सुविधाओं की एक वास्तविक पर्यावरणीय लागत भी है।
AI उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है और आने वाले वर्षों में इसकी मांग और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में ऊर्जा दक्ष तकनीकों, ग्रीन डेटा सेंटर्स, नवीकरणीय ऊर्जा और नए समाधानों पर ध्यान देना आवश्यक होगा। साथ ही उपयोगकर्ताओं, कंपनियों और सरकारों को मिलकर ऐसे कदम उठाने होंगे जो तकनीकी विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रख सकें।
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