यूरोप में ऐसे नए नियमों पर विचार किया जा रहा है, जिनके तहत एयरलाइंस बच्चों को उनके माता-पिता या अभिभावकों के साथ बैठाने के लिए अतिरिक्त शुल्क नहीं ले सकेंगी। प्रस्ताव के अनुसार, परिवारों को साथ सीट देना एयरलाइन की जिम्मेदारी होगी, भले ही उन्होंने सस्ती टिकट खरीदी हो। इस कदम का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा और यात्रियों की सुविधा बढ़ाना है। यदि यह नियम लागू होता है, तो एयरलाइंस को अपने सीट आवंटन और बुकिंग सिस्टम में बदलाव करने पड़ सकते हैं। यह मॉडल भविष्य में दूसरे देशों की विमानन नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है।
हवाई यात्रा करने वाले परिवारों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। यूरोप में ऐसे नए नियमों पर काम चल रहा है जिनके तहत एयरलाइंस बच्चों को उनके माता-पिता या अभिभावकों के साथ बैठाने के लिए अलग से शुल्क नहीं ले सकेंगी। अगर यह नियम लागू होता है तो परिवारों को सिर्फ साथ बैठने के लिए अतिरिक्त पैसे खर्च नहीं करने पड़ेंगे।
पिछले कुछ वर्षों में एयरलाइंस ने कम किराए वाली टिकटों के साथ कई अतिरिक्त सेवाओं के लिए अलग-अलग शुल्क लेना शुरू किया है। इनमें सीट चुनने का शुल्क भी शामिल है। कई बार ऐसा होता है कि परिवार एक साथ टिकट बुक करते हैं, लेकिन उन्हें विमान में अलग-अलग सीटें मिलती हैं। यदि वे साथ बैठना चाहते हैं तो उन्हें अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है।
यही व्यवस्था लंबे समय से यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई थी। खासकर उन परिवारों के लिए जिनके साथ छोटे बच्चे यात्रा कर रहे होते हैं। कई माता-पिता का कहना था कि बच्चों को अलग सीट पर बैठाना न सिर्फ असुविधाजनक है बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी सही नहीं माना जा सकता।
यूरोप में प्रस्तावित नए नियम का मुख्य उद्देश्य यही है कि बच्चों और उनके माता-पिता को बिना अतिरिक्त शुल्क के साथ बैठाया जाए। इसके लिए जिम्मेदारी एयरलाइन की होगी। चाहे यात्री ने सस्ती टिकट खरीदी हो या किसी लो-कॉस्ट एयरलाइन की सेवा ली हो, फिर भी बच्चे और अभिभावक को एक साथ सीट देने की व्यवस्था करनी होगी।
एयरलाइन उद्योग में पिछले कुछ समय से अतिरिक्त सेवाओं से कमाई बढ़ाने का चलन तेजी से बढ़ा है। टिकट का मूल किराया कम रखा जाता है और बाद में सीट चयन, अतिरिक्त सामान, भोजन और दूसरी सुविधाओं के लिए अलग शुल्क लिया जाता है। इससे कंपनियों की आय बढ़ती है, लेकिन यात्रियों की कुल लागत भी बढ़ जाती है। सीट चयन शुल्क इसी मॉडल का एक हिस्सा बन गया है। कई एयरलाइंस यात्रियों को मुफ्त में सीट चुनने की सुविधा नहीं देतीं। यदि कोई व्यक्ति अपनी पसंद की सीट चाहता है तो उसे अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ती है। परिवारों के मामले में यह खर्च और बढ़ जाता है क्योंकि कई लोगों को एक साथ सीटें चुननी पड़ती हैं।
यात्री अधिकारों के लिए काम करने वाले कई संगठनों ने इस व्यवस्था का विरोध किया है। उनका कहना है कि बच्चों को माता-पिता से अलग बैठाना सिर्फ व्यावसायिक फैसला नहीं माना जा सकता। छोटे बच्चों को यात्रा के दौरान देखभाल की जरूरत होती है और उनके साथ अभिभावक का होना जरूरी है।
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विशेष रूप से लंबी दूरी की उड़ानों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। कई घंटों तक चलने वाली यात्रा में बच्चे को भोजन, पानी, दवा या अन्य मदद की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में यदि वह माता-पिता से दूर बैठा हो तो परेशानी बढ़ सकती है।
सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि किसी आपात स्थिति में बच्चों का अपने अभिभावक के पास होना बेहतर माना जाता है। विमान में अचानक कोई तकनीकी समस्या, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी या अन्य आपात स्थिति पैदा होने पर बच्चों को तुरंत सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
इसी वजह से यूरोप में इस विषय को केवल ग्राहक सुविधा नहीं बल्कि सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जा रहा है। नए नियमों के पीछे यही सोच बताई जा रही है कि परिवारों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ से बचाया जाए और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
यदि यह नियम लागू होता है तो एयरलाइंस को अपने टिकट बुकिंग सिस्टम में बदलाव करने पड़ सकते हैं। अभी कई कंपनियों के सिस्टम सीट आवंटन को अलग सेवा की तरह देखते हैं। नए नियम आने पर उन्हें परिवारों की पहचान कर उन्हें एक साथ सीट देने की व्यवस्था करनी होगी।
इसके लिए बुकिंग सॉफ्टवेयर और सीट आवंटन तकनीक में भी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। जब कोई परिवार टिकट बुक करेगा तो सिस्टम को यह समझना होगा कि कौन यात्री बच्चे हैं और उनके साथ कौन अभिभावक यात्रा कर रहे हैं।
तकनीकी स्तर पर यह बदलाव आसान नहीं माना जा रहा। एयरलाइंस को अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल ऐप और सीट मैनेजमेंट सिस्टम को अपडेट करना पड़ सकता है। इससे कंपनियों को अतिरिक्त निवेश भी करना पड़ सकता है।
हालांकि यात्री संगठनों का कहना है कि यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा किसी भी अतिरिक्त लागत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि एयरलाइंस को ऐसी व्यवस्था पहले से ही लागू करनी चाहिए थी। इस प्रस्तावित नियम का असर सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं रह सकता। दुनिया के कई देशों में एयरलाइन कंपनियां इसी तरह की सीट चयन नीति अपनाती हैं। यदि यूरोप में यह मॉडल सफल रहता है तो दूसरे देशों के नियामक भी इस दिशा में कदम उठा सकते हैं।
भारत में भी हवाई यात्रा करने वाले कई परिवारों को इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार एक ही बुकिंग के बावजूद यात्रियों को अलग-अलग सीटें मिल जाती हैं। बाद में साथ बैठने के लिए अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है।
यात्रियों का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से इस मुद्दे पर स्पष्ट नियमों की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले परिवारों को कम से कम एक साथ बैठने की सुविधा बिना अतिरिक्त शुल्क के मिलनी चाहिए।
यदि भविष्य में भारत में भी ऐसी व्यवस्था लागू होती है तो यात्रियों को राहत मिल सकती है। हालांकि फिलहाल इस संबंध में कोई नया नियम घोषित नहीं किया गया है। लेकिन यूरोप में चल रही चर्चा को वैश्विक विमानन उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एयरलाइन कंपनियों के सामने चुनौती यह होगी कि वे ग्राहक सुविधा और अपने व्यावसायिक मॉडल के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें। कई कंपनियां सीट चयन शुल्क से अच्छी आय कमाती हैं। ऐसे में नए नियम लागू होने पर उनकी कमाई के कुछ हिस्से पर असर पड़ सकता है।
फिर भी उपभोक्ता अधिकार समूहों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और परिवारों की सुविधा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनका तर्क है कि साथ बैठना कोई अतिरिक्त लग्जरी सुविधा नहीं बल्कि एक जरूरी व्यवस्था है।
यात्रियों के लिए यह खबर राहत देने वाली मानी जा रही है। यदि नियम लागू हो जाते हैं तो परिवारों को टिकट बुक करते समय अतिरिक्त खर्च की चिंता कम होगी। साथ ही यात्रा के दौरान बच्चों और अभिभावकों को अलग-अलग सीट मिलने की समस्या भी काफी हद तक खत्म हो सकती है।
फिलहाल यूरोप में इस प्रस्ताव पर चर्चा जारी है। विमानन क्षेत्र और यात्री संगठनों की नजर इस बात पर है कि अंतिम नियम किस रूप में सामने आते हैं। यदि इसे मंजूरी मिलती है तो यह हवाई यात्रा से जुड़े नियमों में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा और दुनिया के दूसरे देशों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
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