झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के गुलशन लोहार जन्म से दोनों हाथों के बिना हैं, लेकिन आज वे स्कूल में गणित पढ़ाते हैं। पैरों की उंगलियों से ब्लैकबोर्ड पर सवाल हल कर वे बच्चों को पढ़ाई और आत्मनिर्भरता का महत्व समझाते हैं।
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर Gulshan Lohar की कहानी आज पूरे राज्य में प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी है। जन्म से ही दोनों हाथों के बिना पैदा हुए गुलशन लोहार ने कभी अपनी शारीरिक स्थिति को जीवन की बाधा नहीं बनने दिया। कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना सहारा बनाया और आज वे न सिर्फ एक शिक्षक हैं, बल्कि सैकड़ों बच्चों के लिए उम्मीद की किरण भी हैं।
गुलशन लोहार का बचपन आसान नहीं था। गांव में संसाधनों की कमी, सामान्य सुविधाओं का अभाव और शारीरिक चुनौतियों ने उनके जीवन को कठिन बना दिया था। लेकिन परिवार और खुद की इच्छाशक्ति ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी। उन्होंने शुरुआती शिक्षा स्थानीय स्कूलों से हासिल की और धीरे-धीरे पढ़ाई में रुचि बढ़ती गई।
समाज में कई बार उन्हें उनकी स्थिति के कारण नजरअंदाज किया गया, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपने पैरों की मदद से लिखना और काम करना सीखा। यही कौशल आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
आज गुलशन लोहार उसी गांव के स्कूल में बच्चों को गणित पढ़ाते हैं, जहां वे खुद कभी छात्र थे। उनका पढ़ाने का तरीका सामान्य शिक्षकों से बिल्कुल अलग है। वे ब्लैकबोर्ड पर पैरों की उंगलियों की मदद से बड़े ही सहज तरीके से सवाल हल करते हैं और बच्चों को समझाते हैं। यह दृश्य देखने वालों के लिए चौंकाने वाला नहीं, बल्कि प्रेरणादायक होता है।
गणित जैसे विषय को आसान बनाने के लिए गुलशन सरल उदाहरणों का उपयोग करते हैं। वे बच्चों को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर सवाल समझाते हैं, जिससे छात्र विषय को जल्दी समझ पाते हैं। उनकी कक्षा में बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि अनुभव से भी सीखते हैं।
गांव के छात्रों के अनुसार, गुलशन सर की कक्षा में अनुशासन और सीखने का माहौल अलग ही होता है। वे हर बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी छात्र पीछे न रह जाए। उनके पढ़ाने का तरीका इतना प्रभावी है कि कई बच्चे गणित को पहले की तुलना में ज्यादा रुचि से पढ़ने लगे हैं।
गुलशन लोहार का मानना है कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि जीवन को समझने का माध्यम होनी चाहिए। वे बच्चों को सिर्फ गणित नहीं पढ़ाते, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, मेहनत और आत्मनिर्भरता का महत्व भी सिखाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गुलशन की कहानी ने पूरे गांव की सोच बदल दी है। पहले जहां लोग सीमित अवसरों को लेकर निराश रहते थे, वहीं अब गुलशन की प्रेरणा से बच्चों और अभिभावकों में शिक्षा के प्रति सकारात्मक बदलाव देखा जा रहा है।
उनकी दिनचर्या भी काफी अनुशासित है। वे समय पर स्कूल पहुंचते हैं, कक्षाएं लेते हैं और बच्चों की प्रगति पर लगातार ध्यान देते हैं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया।
गुलशन लोहार का जीवन इस बात का प्रमाण है कि शारीरिक सीमाएं कभी भी मानसिक ताकत को रोक नहीं सकतीं। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से यह साबित कर दिया कि अगर इरादा मजबूत हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
आज उनकी कहानी न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश में प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है। कई सामाजिक संस्थाएं भी उनके काम की सराहना कर रही हैं और उन्हें शिक्षा क्षेत्र में एक उदाहरण के रूप में देख रही हैं।
फिलहाल गुलशन लोहार अपने स्कूल में बच्चों को शिक्षा देने के साथ-साथ उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनकी यह यात्रा संघर्ष से शुरू होकर सफलता तक पहुंची है और आज भी जारी है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत संदेश छोड़ती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, मेहनत और विश्वास से जिंदगी बदली जा सकती है।
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