हांगकांग के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा ब्रेन-इंस्पायर्ड (न्यूरोमॉर्फिक) चिप विकसित किया है जो लगभग एब्सोल्यूट ज़ीरो के करीब, यानी करीब 10 मिली-केल्विन जैसे अत्यंत ठंडे तापमान पर भी काम कर सकता है। यह चिप मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की तरह ऊर्जा-कुशल "स्पाइकिंग" सिग्नल उत्पन्न करता है और क्रायोजेनिक वातावरण में स्थानीय स्तर पर डेटा प्रोसेसिंग कर सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक क्वांटम कंप्यूटिंग, डीप-स्पेस मिशनों, सुपरकंडक्टिंग सिस्टम और अल्ट्रा-लो पावर AI के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। भविष्य में ऐसे चिप्स क्वांटम कंप्यूटरों के लिए "ऑनबोर्ड ब्रेन" की भूमिका निभा सकते हैं और कम ऊर्जा में अधिक शक्तिशाली AI सिस्टम विकसित करने में मदद कर सकते हैं।
हांगकांग के शोधकर्ताओं और उनके सहयोगी संस्थानों ने एक ऐसा ब्रेन-इंस्पायर्ड चिप विकसित किया है जो लगभग एब्सोल्यूट ज़ीरो के करीब, यानी करीब 10 मिली-केल्विन जैसे अत्यंत ठंडे तापमान पर भी काम कर सकता है। यह तकनीक क्वांटम कंप्यूटिंग, डीप-स्पेस मिशन और अल्ट्रा-लो पावर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह चिप मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की तरह ऊर्जा-कुशल तरीके से सिग्नल प्रोसेस कर सकता है।
दुनिया भर में वैज्ञानिक ऐसे कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो कम ऊर्जा में अधिक जटिल काम कर सकें। इसी दिशा में हांगकांग के शोधकर्ताओं और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने का दावा किया है। उन्होंने एक ऐसा ब्रेन-इंस्पायर्ड या न्यूरोमॉर्फिक चिप विकसित किया है जो अत्यधिक ठंडे वातावरण में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।
यह शोध खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि सामान्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बेहद कम तापमान पर अपनी कार्यक्षमता खो देते हैं। लेकिन नया चिप उन परिस्थितियों में भी सक्रिय रह सकता है जहां पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक लगभग 10 मिली-केल्विन तक के तापमान पर काम करने में सक्षम है, जो एब्सोल्यूट ज़ीरो के बेहद करीब माना जाता है।
एब्सोल्यूट ज़ीरो वह सैद्धांतिक तापमान है जहां किसी पदार्थ में ऊष्मीय ऊर्जा लगभग समाप्त हो जाती है। वैज्ञानिक मापदंडों के अनुसार यह तापमान शून्य केल्विन या माइनस 273.15 डिग्री सेल्सियस के बराबर होता है। नया चिप इसी सीमा के बेहद नजदीक कार्य करने के लिए डिजाइन किया गया है।
शोधकर्ताओं ने इस उपलब्धि के लिए किसी पूरी तरह नई सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने उद्योग में पहले से उपयोग होने वाले सिलिकॉन कार्बाइड MOSFET को एक नए तरीके से कॉन्फ़िगर किया। इसी प्रक्रिया के दौरान उन्होंने उसमें “नेगेटिव डिफरेंशियल रेजिस्टेंस” नामक विशेष व्यवहार उत्पन्न किया। वैज्ञानिकों के अनुसार यही विशेषता इस डिवाइस को न्यूरॉन जैसा व्यवहार करने में सक्षम बनाती है। मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स जिस तरह विद्युत संकेतों के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं, उसी प्रकार यह डिवाइस भी “स्पाइकिंग” पैटर्न उत्पन्न कर सकता है। यही कारण है कि इसे ब्रेन-इंस्पायर्ड तकनीक की श्रेणी में रखा जा रहा है।
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न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग का मूल उद्देश्य मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से प्रेरित कंप्यूटर सिस्टम तैयार करना है। पारंपरिक कंप्यूटर बड़ी मात्रा में डेटा प्रोसेस करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं, जबकि मानव मस्तिष्क बेहद कम ऊर्जा में जटिल निर्णय लेने और पैटर्न पहचानने में सक्षम है। वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो इस दक्षता को तकनीकी रूप में दोहरा सके।
Continue Reading12 जून 2026
नए शोध में विकसित चिप इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे एक प्रोग्रामेबल न्यूरोमॉर्फिक हार्डवेयर प्लेटफॉर्म में परिवर्तित किया, जो क्रायोजेनिक तापमान पर भी स्थानीय स्तर पर डेटा प्रोसेस कर सकता है।
क्रायोजेनिक तापमान वे अत्यंत ठंडे वातावरण होते हैं जिनका उपयोग विशेष वैज्ञानिक उपकरणों और क्वांटम कंप्यूटरों में किया जाता है। क्वांटम कंप्यूटिंग की अधिकांश प्रणालियां बेहद कम तापमान पर संचालित होती हैं क्योंकि क्वांटम बिट्स या क्यूबिट्स को स्थिर बनाए रखने के लिए ऐसी परिस्थितियों की आवश्यकता होती है।
वर्तमान क्वांटम कंप्यूटिंग प्रणालियों में एक बड़ी चुनौती यह है कि डेटा को क्रायोजेनिक वातावरण से निकालकर सामान्य तापमान वाले कंप्यूटरों तक पहुंचाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में समय, ऊर्जा और अतिरिक्त हार्डवेयर की आवश्यकता होती है।
यदि डेटा प्रोसेसिंग उसी अत्यंत ठंडे वातावरण में की जा सके जहां क्वांटम कंप्यूटर कार्य कर रहे हैं, तो पूरी प्रणाली अधिक कुशल बन सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि नया चिप इसी समस्या का संभावित समाधान प्रदान कर सकता है।
नया न्यूरोमॉर्फिक प्लेटफॉर्म स्थानीय स्तर पर डेटा विश्लेषण और निर्णय प्रक्रिया को संभाल सकता है। इससे क्वांटम कंप्यूटरों की स्केलेबिलिटी बढ़ाने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में बड़े और अधिक जटिल क्वांटम सिस्टम विकसित करने के लिए ऐसी तकनीकों की आवश्यकता होगी।
Continue Reading13 जून 2026
शोध दल ने यह भी प्रदर्शित किया कि कृत्रिम “क्रायो-न्यूरॉन्स” को आपस में जोड़ा जा सकता है। इनकी मदद से बड़े नेटवर्क बनाए जा सकते हैं जो जटिल पैटर्न पहचानने और नियंत्रण संबंधी कार्य करने में सक्षम हों।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि एक अकेला कृत्रिम न्यूरॉन सीमित कार्य कर सकता है, जबकि हजारों या लाखों न्यूरॉन्स का नेटवर्क उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी क्षमताएं विकसित कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक क्वांटम कंप्यूटरों के लिए “ऑनबोर्ड ब्रेन” की भूमिका निभा सकती है। इसका मतलब यह है कि क्वांटम सिस्टम के भीतर ही निर्णय लेने और डेटा प्रबंधन करने वाली बुद्धिमान परत विकसित की जा सकती है।
इस शोध का एक अन्य संभावित उपयोग डीप-स्पेस मिशनों में देखा जा रहा है। अंतरिक्ष के दूरस्थ क्षेत्रों में भेजे जाने वाले रोबोटिक प्रोब्स को अत्यंत कठिन और ठंडे वातावरण में काम करना पड़ता है। ऐसे मिशनों में ऊर्जा की उपलब्धता सीमित होती है और हर निर्णय को पृथ्वी से नियंत्रित करना संभव नहीं होता।
यदि ऐसे मिशनों में अल्ट्रा-लो पावर AI आधारित न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम लगाए जाएं तो वे स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने में सक्षम हो सकते हैं। इससे अंतरिक्ष मिशनों की दक्षता बढ़ सकती है और संचार में होने वाली देरी का प्रभाव कम हो सकता है।
Continue Reading13 जून 2026
शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि यह तकनीक अत्यंत ठंडे सेंसर नेटवर्क में उपयोगी साबित हो सकती है। वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, सुपरकंडक्टिंग सिस्टम और अंतरिक्ष अनुसंधान में ऐसे कई उपकरण उपयोग किए जाते हैं जिन्हें बेहद कम तापमान पर संचालित करना पड़ता है। हालांकि यह तकनीक अभी शोध और प्रयोगशाला स्तर पर है, लेकिन इसका संभावित प्रभाव भविष्य की कई तकनीकों पर पड़ सकता है। इतिहास बताता है कि कंप्यूटिंग क्षेत्र में होने वाली कई वैज्ञानिक खोजें वर्षों बाद उपभोक्ता तकनीकों का हिस्सा बनती हैं।
आज के स्मार्टफोन, लैपटॉप, सैटेलाइट संचार नेटवर्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों की नींव भी कभी प्रयोगशालाओं में हुए ऐसे ही अनुसंधानों पर रखी गई थी। इसलिए वैज्ञानिक समुदाय इस नई उपलब्धि को केवल एक प्रयोगात्मक सफलता के रूप में नहीं बल्कि भविष्य की तकनीकी दिशा से जोड़कर देख रहा है।
विशेष रूप से AI के तेजी से बढ़ते उपयोग के दौर में ऊर्जा दक्षता सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है। बड़े भाषा मॉडल, डेटा सेंटर और उन्नत कंप्यूटिंग सिस्टम भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत करते हैं। ऐसे में कम ऊर्जा में अधिक काम करने वाले हार्डवेयर की मांग लगातार बढ़ रही है। न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग को इसी चुनौती का संभावित समाधान माना जाता है। यदि मानव मस्तिष्क जैसी ऊर्जा दक्षता के करीब पहुंचने वाले सिस्टम विकसित हो जाते हैं, तो भविष्य के AI प्लेटफॉर्म अधिक शक्तिशाली होने के साथ-साथ ऊर्जा की दृष्टि से भी अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
फिलहाल यह शोध वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। अत्यंत ठंडे तापमान पर काम करने वाले ब्रेन-इंस्पायर्ड चिप्स का विकास क्वांटम कंप्यूटिंग, डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन और अगली पीढ़ी की कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक अनुप्रयोगों तक पहुंचती है या नहीं, इस पर दुनिया भर के शोधकर्ताओं और तकनीकी कंपनियों की नजर बनी रहेगी।
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13 जून 2026