केंद्र सरकार ने वाहनों में इस्तेमाल होने वाली उन्नत सुरक्षा और सेल्फ-ड्राइविंग तकनीकों के लिए बड़ा नियामकीय बदलाव करते हुए 77–81 GHz रडार सेंसर और 5.9 GHz वाहन संचार बैंड पर स्पेक्ट्रम लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म कर दी है। इस फैसले से ऑटो कंपनियों के लिए क्रैश-अवॉइडेंस सिस्टम, अडैप्टिव क्रूज़ कंट्रोल, लेन-कीपिंग असिस्ट और ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग जैसी तकनीकों को अपनाना आसान होगा। सरकार का मानना है कि इससे सड़क सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा, तकनीकी लागत कम होगी और आने वाले वर्षों में आधुनिक सुरक्षा फीचर्स मिड-सेगमेंट कारों तक भी पहुंच सकेंगे। साथ ही, दुर्घटनाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान और जोखिम में कमी आने की संभावना भी जताई जा रही है।
केंद्र सरकार ने वाहनों में इस्तेमाल होने वाले उन्नत सुरक्षा सिस्टम और सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए कुछ विशेष रेडियो स्पेक्ट्रम बैंड पर लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। नई व्यवस्था के तहत 77–81 GHz रडार सेंसर और 5.9 GHz वाहन संचार तकनीक के उपयोग के लिए अलग से स्पेक्ट्रम लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी। इस फैसले से ऑटोमोबाइल उद्योग में नई सुरक्षा तकनीकों को अपनाने की प्रक्रिया आसान होने की उम्मीद है।
भारत में सड़क सुरक्षा को मजबूत बनाने और आधुनिक ऑटोमोबाइल तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण नियामकीय बदलाव किया है। सरकार ने उन रेडियो स्पेक्ट्रम बैंड्स पर लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी है जिनका उपयोग आधुनिक कारों में क्रैश-अवॉइडेंस सिस्टम, एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस फीचर्स और सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक से जुड़ी प्रणालियों में किया जाता है।
नई अधिसूचना के अनुसार 77–81 गीगाहर्ट्ज़ बैंड में काम करने वाले रडार सेंसर और 5.9 गीगाहर्ट्ज़ बैंड में वाहन-से-वाहन तथा वाहन-से-इन्फ्रास्ट्रक्चर संचार प्रणालियों के लिए अलग स्पेक्ट्रम लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी। अब तक यह प्रक्रिया तकनीक अपनाने में सबसे बड़ी प्रशासनिक और नियामकीय बाधाओं में से एक मानी जाती थी।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल हो रही सुरक्षा तकनीकों को भारत में लागू करने के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया को सरल बनाया जाए। नई व्यवस्था के बाद कंपनियों के लिए ऐसे सेंसर और मॉड्यूल को भारतीय बाजार में लाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सड़क दुर्घटनाओं की संख्या चिंता का विषय बनी हुई है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक सड़क हादसों में उल्लेखनीय कमी लाने का लक्ष्य तय किया है। ऐसे में आधुनिक वाहन सुरक्षा तकनीकों को बढ़ावा देने वाला यह कदम सड़क सुरक्षा नीति के व्यापक ढांचे का हिस्सा माना जा रहा है।
77–81 GHz बैंड में संचालित होने वाले रडार सेंसर आधुनिक वाहनों की "आंख" की तरह काम करते हैं। ये सेंसर वाहन के आसपास मौजूद अन्य गाड़ियों, पैदल यात्रियों, अवरोधों और सड़क की परिस्थितियों का लगातार आकलन करते हैं। सेंसर द्वारा जुटाई गई जानकारी के आधार पर वाहन चालक को चेतावनी दी जा सकती है या कुछ परिस्थितियों में वाहन स्वतः प्रतिक्रिया भी दे सकता है।
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इसी तरह 5.9 GHz बैंड का उपयोग वाहन-से-वाहन और वाहन-से-इन्फ्रास्ट्रक्चर संचार तकनीक में किया जाता है। इस तकनीक के माध्यम से वाहन अपने आसपास मौजूद अन्य वाहनों या सड़क से जुड़े स्मार्ट सिस्टम के साथ जानकारी साझा कर सकते हैं। इससे दुर्घटनाओं की संभावना कम करने और यातायात को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद मिल सकती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और यूरोपीय संघ पहले से ही इन स्पेक्ट्रम बैंड्स को ऑटोमोबाइल सुरक्षा तकनीकों के लिए अपेक्षाकृत सरल नियामकीय व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराते हैं। इसके कारण वहां वाहन निर्माता कंपनियां तैयार मॉड्यूल और सेंसर का इस्तेमाल करके नई तकनीकों को तेजी से अपने मॉडलों में शामिल कर पाती हैं।
भारत का नया निर्णय भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे घरेलू वाहन निर्माताओं के साथ-साथ वैश्विक ऑटोमोबाइल कंपनियों को भी फायदा हो सकता है। कंपनियों को अब अलग स्पेक्ट्रम लाइसेंस प्राप्त करने और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं पर समय तथा संसाधन खर्च नहीं करने पड़ेंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि इससे उन्नत सुरक्षा फीचर्स धीरे-धीरे अधिक किफायती वाहनों तक पहुंच सकते हैं। अभी तक कई आधुनिक तकनीकें मुख्य रूप से प्रीमियम या आयातित मॉडलों तक सीमित रहती थीं। इसका एक कारण तकनीकी लागत के साथ-साथ नियामकीय प्रक्रियाओं से जुड़ा अतिरिक्त खर्च भी था। नई व्यवस्था के बाद जिन तकनीकों को अधिक बढ़ावा मिलने की संभावना जताई जा रही है, उनमें अडैप्टिव क्रूज़ कंट्रोल प्रमुख है। यह प्रणाली वाहन की गति को सामने चल रहे वाहन की दूरी के अनुसार स्वतः नियंत्रित करती है। इससे लंबी दूरी की यात्रा के दौरान चालक को अतिरिक्त सुविधा मिल सकती है।
लेन-कीपिंग असिस्ट भी ऐसी ही तकनीक है जो वाहन को उसकी निर्धारित लेन में बनाए रखने में सहायता करती है। यदि वाहन अनजाने में लेन से बाहर जाने लगता है तो यह सिस्टम चालक को चेतावनी देता है या कुछ मामलों में स्टीयरिंग नियंत्रण में सहायता करता है।
ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग को आधुनिक वाहन सुरक्षा तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह प्रणाली संभावित टक्कर का आकलन कर चालक को चेतावनी देती है और आवश्यकता पड़ने पर स्वतः ब्रेक भी लगा सकती है। कई देशों में इस तकनीक को सड़क सुरक्षा के लिए प्रभावी माना गया है।
हालांकि लाइसेंसिंग बाधा हटने का मतलब यह नहीं है कि कंपनियों को सभी नियामकीय प्रक्रियाओं से छूट मिल जाएगी। नई अधिसूचना के बाद भी वाहन निर्माताओं को निर्धारित ऑटोमोटिव सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा। उन्हें संबंधित परीक्षणों और होमोलोगेशन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तकनीक सुरक्षित और मानकों के अनुरूप है।
उद्योग जगत का मानना है कि इससे अनुसंधान और विकास की प्रक्रिया को भी गति मिल सकती है। स्थानीय स्तर पर तकनीकी समाधान विकसित करने वाली कंपनियों को अब अपेक्षाकृत अनुकूल वातावरण मिल सकता है। इससे भारतीय ऑटोमोबाइल क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
आम वाहन चालकों के लिए इस फैसले का महत्व केवल नई तकनीक उपलब्ध होने तक सीमित नहीं है। यदि आने वाले वर्षों में ये सुरक्षा प्रणालियां अधिक वाहनों में शामिल होती हैं तो सड़क पर चलने वाले लोगों को अतिरिक्त सुरक्षा मिल सकती है। वाहन अपने आसपास की परिस्थितियों को बेहतर ढंग से पहचान सकेंगे और संभावित जोखिमों का पहले से आकलन कर पाएंगे।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि जैसे-जैसे इन तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ेगा, दुर्घटनाओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। सड़क सुरक्षा से जुड़े कई वैश्विक अध्ययनों में एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम को दुर्घटनाओं की गंभीरता कम करने वाला कारक माना गया है।
बीमा क्षेत्र पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। यदि सुरक्षा तकनीकों के कारण दुर्घटनाओं की संख्या या उनकी गंभीरता में कमी आती है तो लंबे समय में आर्थिक नुकसान कम हो सकता है। इससे वाहन स्वामियों को अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। भारत में ऑटोमोबाइल उद्योग तेजी से तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों, कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी और स्मार्ट मोबिलिटी समाधानों के बीच यह नया नियामकीय कदम उद्योग को एक और दिशा देने वाला माना जा रहा है। सुरक्षा आधारित तकनीकों को प्रोत्साहन मिलने से वाहन निर्माण का स्वरूप भी बदल सकता है।
नई अधिसूचना से स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार आधुनिक सड़क सुरक्षा समाधानों को अपनाने की दिशा में नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर दे रही है। उद्योग जगत अब इस बात पर नजर रखेगा कि कंपनियां इस अवसर का कितना लाभ उठाती हैं और उन्नत सुरक्षा फीचर्स कितनी तेजी से आम भारतीय वाहनों तक पहुंच पाते हैं।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि स्पेक्ट्रम लाइसेंस की बाधा हटने से तकनीकी अपनाने की राह आसान हुई है। इससे वाहन सुरक्षा से जुड़ी नई प्रणालियों को भारतीय बाजार में जगह बनाने का अवसर मिलेगा और सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयासों को भी नई गति मिल सकती है।
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