भारत में प्री-मॉनसून सीजन के दौरान कई राज्यों में तापमान 46–48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। मौसम विशेषज्ञों ने जून से सितंबर के बीच Super El Niño जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई है, जिससे हीटवेव, सूखे और मॉनसून के पैटर्न पर असर पड़ सकता है।World Weather Attribution की एक स्टडी के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण दक्षिण एशिया में हीटवेव अधिक लंबी और तीव्र हो रही हैं। वहीं IMD ने भी माना है कि El Niño और हिंद महासागर के तापमान का असर मॉनसून पर पड़ सकता है। बढ़ती गर्मी का प्रभाव स्वास्थ्य, खेती, बिजली मांग और जल संसाधनों पर भी पड़ रहा है।
भारत समेत दक्षिण एशिया के कई हिस्से इस वर्ष भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं। कई राज्यों में तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। मौसम विशेषज्ञों और वैश्विक मौसम संस्थाओं ने जून से सितंबर के बीच Super El Niño जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई है, जिससे मॉनसून के पैटर्न, हीटवेव और सूखे का जोखिम बढ़ सकता है। जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ती गर्मी और लंबे हीटवेव दौर का प्रमुख कारण माना जा रहा है।
दक्षिण एशिया एक बार फिर अत्यधिक गर्मी और बदलते मौसम पैटर्न की चुनौती का सामना कर रहा है। भारत में प्री-मॉनसून सीजन के दौरान कई राज्यों में तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। मौसम से जुड़े आंकड़ों और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर इसे हाल के वर्षों की सबसे तीव्र गर्मियों में से एक माना जा रहा है।
देश के विभिन्न हिस्सों में गर्म हवाओं और ऊंचे तापमान ने आम जनजीवन पर असर डाला है। विशेष रूप से उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में लोगों को लगातार कई दिनों तक अत्यधिक गर्म मौसम का सामना करना पड़ा। दिन के समय बाहर निकलना कठिन हो गया और खुले में काम करने वाले लोगों पर इसका असर अधिक दिखाई दिया।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष केवल सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव ही चिंता का विषय नहीं हैं, बल्कि प्रशांत महासागर से जुड़े वैश्विक जलवायु संकेत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी संदर्भ में Super El Niño की संभावना पर चर्चा बढ़ी है।
विश्व मौसम समुदाय से जुड़े कई विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मौसम संस्थाओं ने संकेत दिए हैं कि जून से सितंबर के बीच ऐसी परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं जिन्हें Super El Niño जैसी स्थिति के रूप में देखा जा रहा है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वर्षा के वितरण और मॉनसून की प्रकृति पर भी पड़ सकता है।
El Niño एक ऐसी जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका प्रभाव दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के मौसम पर पड़ता है। भारत में भी El Niño का संबंध अक्सर कमजोर या असमान मॉनसून से जोड़ा जाता रहा है।
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10 जून 2026
10 जून 2026
9 जून 2026
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, जब El Niño अधिक मजबूत रूप लेता है तो वर्षा के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है जबकि कुछ क्षेत्रों में वर्षा का वितरण असंतुलित हो सकता है। इसी वजह से कृषि, जल संसाधन और बिजली उत्पादन जैसे क्षेत्रों पर इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि इस बीच मौसम में कुछ अस्थायी राहत भी देखने को मिली है। पश्चिमी विक्षोभ और स्थानीय स्तर पर विकसित आंधी-तूफान की गतिविधियों के कारण उत्तर भारत के कई इलाकों में कुछ दिनों के लिए तापमान में गिरावट दर्ज की गई। लेकिन विशेषज्ञ इसे स्थायी राहत नहीं मान रहे हैं।
मौसम विभाग और जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि अल्पकालिक मौसम घटनाएं कुछ दिनों के लिए तापमान कम कर सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक रुझान अभी भी अत्यधिक गर्मी की ओर संकेत कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समूह World Weather Attribution की एक हालिया स्टडी ने भी दक्षिण एशिया में बढ़ती गर्मी को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण प्री-मॉनसून हीटवेव पहले की तुलना में अधिक लंबी और अधिक तीव्र हो गई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में गर्मी की लहरों की अवधि और तीव्रता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और आर्थिक गतिविधियों तक पहुंच रहा है।
Continue Reading10 जून 2026
अध्ययन के मुताबिक इस वर्ष भारत में कम से कम 37 मौतें सीधे तौर पर अत्यधिक गर्मी से जुड़ी होने की रिपोर्ट की गई हैं। यह आंकड़ा गर्मी के बढ़ते प्रभाव की गंभीरता को दर्शाता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि वास्तविक प्रभाव इससे व्यापक हो सकता है क्योंकि कई मामलों में गर्मी से जुड़े अप्रत्यक्ष प्रभावों को अलग से दर्ज करना चुनौतीपूर्ण होता है।
World Weather Attribution की रिपोर्ट यह भी बताती है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों के करीब नियंत्रित रखा जा सकता, तो इस प्रकार की चरम हीटवेव घटनाओं की संभावना काफी कम होती। अध्ययन में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी के बीच स्पष्ट संबंध की ओर संकेत किया गया है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने भी स्वीकार किया है कि मॉनसून के आगमन और उसके वितरण पर कई समुद्री तथा वायुमंडलीय कारकों का प्रभाव पड़ता है। विभाग के अनुसार El Niño और हिंद महासागर के तापमान में होने वाले बदलाव इस वर्ष के मॉनसून व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
मॉनसून भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। देश के बड़े हिस्से में खेती अब भी वर्षा पर निर्भर करती है। इसलिए मॉनसून में किसी भी प्रकार की अनियमितता का प्रभाव खाद्य उत्पादन, ग्रामीण आय और कृषि बाजारों पर दिखाई दे सकता है। गर्मी का असर केवल मौसम संबंधी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक खुले वातावरण में काम करना पड़ता है। दिहाड़ी मजदूर, निर्माण कार्य से जुड़े श्रमिक, डिलीवरी कर्मी, किसान, ट्रैफिक पुलिसकर्मी और अन्य फील्ड वर्कर इस चुनौती का सीधा सामना करते हैं।
जब तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहता है तो शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। लंबे समय तक गर्म वातावरण में काम करने से हीट स्ट्रेस और हीट स्ट्रोक का जोखिम बढ़ जाता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ गर्म मौसम में पर्याप्त पानी पीने और अनावश्यक धूप से बचने की सलाह देते हैं। ऊंचे तापमान का असर ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ता है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य शीतलन उपकरणों का उपयोग बढ़ जाता है। इससे बिजली की मांग में तेजी आती है और पावर ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
Continue Reading9 जून 2026
यदि मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाए तो कुछ क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति प्रभावित होने का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए ऊर्जा क्षेत्र के लिए भी अत्यधिक गर्मी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनती जा रही है। जल संसाधनों पर इसका प्रभाव अलग से देखा जा रहा है। अधिक तापमान के कारण जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। यदि मॉनसून सामान्य से कमजोर रहता है या वर्षा का वितरण असमान होता है तो कई क्षेत्रों में जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
कृषि क्षेत्र के लिए भी स्थिति महत्वपूर्ण है। अत्यधिक गर्मी और नमी की कमी फसलों की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है। यदि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहती हैं तो उत्पादन पर असर पड़ सकता है, जिसका प्रभाव खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौसम से जुड़े ऐसे जोखिम खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हो सकते हैं। विशेष रूप से उन फसलों पर अधिक असर पड़ सकता है जो तापमान और जल उपलब्धता के प्रति संवेदनशील होती हैं।
फिलहाल मौसम विशेषज्ञ मॉनसून की प्रगति, प्रशांत महासागर की स्थितियों और हिंद महासागर के तापमान पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। आने वाले सप्ताह यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि El Niño का प्रभाव किस स्तर तक पहुंचता है और मॉनसून का वितरण किस प्रकार होता है।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह केवल एक मौसम संबंधी चुनौती नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है। बढ़ती गर्मी और संभावित Super El Niño को देखते हुए सरकारी एजेंसियां, मौसम वैज्ञानिक और नीति निर्माता आने वाले महीनों के हालात पर करीबी निगरानी बनाए हुए हैं।
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9 जून 2026