Consumer Reports की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 तक अमेरिका में 3,000 से अधिक डेटा सेंटर संचालित हो रहे हैं और करीब 1,500 नए सेंटर योजना या निर्माण के चरण में हैं। बड़े एआई डेटा सेंटर भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं, जिससे ऊर्जा ग्रिड, जल संसाधनों और स्थानीय पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है।रिपोर्ट में कहा गया है कि 2028 तक डेटा सेंटर अमेरिका की कुल बिजली खपत का लगभग 12% उपयोग कर सकते हैं। वहीं, कुछ बड़े डेटा सेंटर प्रतिदिन लाखों गैलन पानी कूलिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिससे जल संकट वाले क्षेत्रों में चिंता बढ़ रही है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से विस्तार के साथ दुनिया भर में डेटा सेंटरों की मांग बढ़ रही है। एआई मॉडल, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल सेवाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को संचालित करने के लिए बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ती है। लेकिन इस बढ़ते विस्तार के साथ बिजली, पानी और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताएं भी तेज होती जा रही हैं। अमेरिका में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस बहस को और गति दे दी है।
Consumer Reports की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में एआई डेटा सेंटरों का विस्तार अब केवल तकनीकी या आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह ऊर्जा, जल संसाधनों और स्थानीय समुदायों से जुड़ा बड़ा सार्वजनिक विषय बनता जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2026 तक अमेरिका में 3,000 से अधिक डेटा सेंटर संचालित हो रहे हैं, जबकि करीब 1,500 अतिरिक्त डेटा सेंटर या तो योजना के चरण में हैं या निर्माणाधीन हैं।
इनमें बड़ी संख्या तथाकथित “हाइपरस्केल” डेटा सेंटरों की है। ये ऐसे विशाल केंद्र होते हैं जिन्हें बड़ी टेक कंपनियां क्लाउड सेवाओं और एआई प्रणालियों को चलाने के लिए विकसित करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर अकेले 50 से 100 मेगावॉट तक बिजली की खपत कर सकता है। यह खपत कई छोटे शहरों की कुल बिजली मांग के बराबर मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई तकनीकों के विकास ने डेटा प्रोसेसिंग की मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया है। बड़े भाषा मॉडल, मशीन लर्निंग सिस्टम और एआई आधारित सेवाओं को प्रशिक्षित और संचालित करने के लिए हजारों उच्च क्षमता वाले सर्वरों की आवश्यकता होती है। इन सर्वरों को लगातार बिजली की आपूर्ति और उन्नत कूलिंग सिस्टम की जरूरत पड़ती है, जिससे ऊर्जा की खपत तेजी से बढ़ रही है।
Bloom Energy और विभिन्न प्रयोगशाला अध्ययनों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 से 2028 के बीच केवल अमेरिका में डेटा सेंटरों की कुल बिजली मांग 80 गीगावॉट से बढ़कर 150 गीगावॉट तक पहुंच सकती है। इसका अर्थ है कि महज तीन वर्षों में बिजली की मांग लगभग दोगुनी हो सकती है।
Lawrence Berkeley National Laboratory के अनुमान के अनुसार, 2028 तक डेटा सेंटर अमेरिका की कुल बिजली खपत का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा अकेले उपयोग कर सकते हैं। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो ऊर्जा क्षेत्र पर इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती मांग के कारण बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है और ऊर्जा उत्पादन क्षमता को भी विस्तार देना पड़ सकता है।
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हालांकि चिंता केवल बिजली तक सीमित नहीं है। डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की भी आवश्यकता होती है। हजारों सर्वर लगातार गर्मी उत्पन्न करते हैं और उनकी कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए प्रभावी कूलिंग सिस्टम जरूरी होता है। कई आधुनिक डेटा सेंटर इस उद्देश्य के लिए पानी आधारित कूलिंग तकनीकों का उपयोग करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, एक बड़ा डेटा सेंटर प्रतिदिन लाखों गैलन पानी का उपयोग कर सकता है। कुछ अनुमानों में यह खपत 50 लाख गैलन प्रतिदिन तक बताई गई है। यह मात्रा हजारों घरों की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर मानी जाती है। ऐसे में जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर स्थानीय समुदायों में चिंता बढ़ रही है।
अमेरिका के एरिजोना राज्य का फीनिक्स क्षेत्र इस बहस का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यह इलाका पहले से ही जल संकट और सूखे की चुनौतियों का सामना कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, वहां मौजूद डेटा सेंटर केवल कूलिंग के लिए सालाना लगभग 385 मिलियन गैलन पानी का उपयोग करते हैं। यदि प्रस्तावित नई परियोजनाएं शुरू होती हैं तो यह खपत बढ़कर 3.7 बिलियन गैलन तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जल संकट वाले क्षेत्रों में इस तरह की बढ़ती मांग भविष्य में संसाधन प्रबंधन को और जटिल बना सकती है। स्थानीय प्रशासन को उद्योग, कृषि और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
डेटा सेंटरों को लेकर एक और महत्वपूर्ण चिंता पारदर्शिता से जुड़ी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, कई बार स्थानीय समुदायों को इन परियोजनाओं के वास्तविक प्रभावों की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती। विश्वविद्यालयों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि वर्जीनिया के कई शहरों ने डेटा सेंटर कंपनियों के साथ नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (NDA) पर हस्ताक्षर किए थे।
Continue Reading8 जून 2026
इन समझौतों के कारण नागरिकों के लिए यह जानना कठिन हो गया कि प्रस्तावित परियोजनाओं का पानी और बिजली की खपत पर कितना प्रभाव पड़ेगा। साथ ही कर छूट और अन्य प्रोत्साहनों की वास्तविक लागत को लेकर भी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इस स्थिति ने स्थानीय स्तर पर असंतोष को जन्म दिया।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब बड़े पैमाने की परियोजनाएं सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करती हैं, तब स्थानीय समुदायों को उनके संभावित प्रभावों की जानकारी मिलना महत्वपूर्ण होता है। पारदर्शिता की कमी कई बार परियोजनाओं के प्रति अविश्वास को बढ़ा सकती है। इसी पृष्ठभूमि में वर्जीनिया और टेक्सास जैसे राज्यों में डेटा सेंटरों के खिलाफ विरोध तेज होता दिखाई दे रहा है। स्थानीय समूहों और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देने से पहले उनके ऊर्जा और जल प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2025 के कुछ महीनों के दौरान ही लगभग 98 अरब डॉलर मूल्य की संभावित डेटा सेंटर परियोजनाएं या तो रोक दी गईं या स्थगित कर दी गईं। यह आंकड़ा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि डेटा सेंटर उद्योग को लेकर सामाजिक और राजनीतिक बहस तेजी से बढ़ रही है।
कुछ पर्यावरण समूहों ने तो इससे भी आगे बढ़कर मांग की है कि जब तक उद्योग पर्याप्त पारदर्शिता और प्रभावी नियमन के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक नए डेटा सेंटरों पर राष्ट्रीय स्तर पर अस्थायी रोक लगाने पर विचार किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किए बिना अनियंत्रित विस्तार लंबे समय में गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है।
दूसरी ओर, तकनीकी उद्योग से जुड़े कई लोग इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि डेटा सेंटर आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार हैं। एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों का संचालन इन्हीं सुविधाओं पर निर्भर करता है। ऐसे में अत्यधिक प्रतिबंध तकनीकी विकास की गति को प्रभावित कर सकते हैं।
Continue Reading9 जून 2026
फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि उद्योग और समुदायों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा। ऊर्जा दक्षता बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक उपयोग करना और कम पानी वाली कूलिंग तकनीकों को अपनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
भारत के संदर्भ में भी यह बहस महत्वपूर्ण होती जा रही है। देश तेजी से डेटा सेंटर हब के रूप में उभर रहा है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, क्लाउड सेवाओं, ऑनलाइन लेनदेन और एआई आधारित तकनीकों के विस्तार के साथ बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग क्षमता की मांग बढ़ रही है। कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में नए डेटा सेंटर स्थापित करने की योजनाओं पर काम कर रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अभी से टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल विकसित करने का अवसर है। यदि ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों और जल संरक्षण तकनीकों को प्राथमिकता दी जाती है, तो भविष्य में संसाधनों पर दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके विपरीत यदि केवल क्षमता विस्तार पर ध्यान दिया गया और संसाधन प्रबंधन को पर्याप्त महत्व नहीं मिला, तो भविष्य में भारत को भी बिजली की मांग, जल उपयोग और स्थानीय पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़ी उसी प्रकार की बहस का सामना करना पड़ सकता है जैसी आज अमेरिका में दिखाई दे रही है।
एआई क्रांति के साथ डेटा सेंटरों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि इस डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार किस प्रकार किया जाए ताकि तकनीकी विकास और संसाधनों के सतत उपयोग के बीच संतुलन बना रहे। अमेरिका में चल रही बहस इसी चुनौती को रेखांकित करती है और आने वाले वर्षों में दुनिया के कई देशों के लिए एक महत्वपूर्ण नीति विषय बन सकती है।
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9 जून 2026