जोधपुर में स्वास्थ्य विभाग की जांच के दौरान तीन दवाओं के सैंपल क्वालिटी टेस्ट में फेल पाए गए हैं। इनमें एंटीबायोटिक, हार्ट अटैक में इस्तेमाल होने वाली दवा और एक अन्य सामान्य दवा शामिल है, जिनमें सक्रिय तत्व कम या अशुद्धियां पाई गईं। इसके बाद विभाग ने अलर्ट जारी कर निगरानी बढ़ाने और अस्पतालों व मेडिकल स्टोर्स को इन दवाओं के स्टॉक की दोबारा जांच करने के निर्देश दिए हैं।
जोधपुर में स्वास्थ्य विभाग की नियमित जांच के दौरान भेजे गए तीन दवाओं के सैंपल क्वालिटी टेस्ट में फेल पाए गए हैं। रिपोर्ट में एंटीबायोटिक, हार्ट अटैक में इस्तेमाल होने वाली दवा और एक अन्य सामान्य मेडिसिन में मानकों से गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल अलर्ट जारी किया है और निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, लैब टेस्ट में पाया गया कि कुछ दवाओं में या तो सक्रिय तत्व (एक्टिव इंग्रेडिएंट) निर्धारित मात्रा से कम थे या उनमें अशुद्धियां मौजूद थीं। यह स्थिति सीधे तौर पर दवा की गुणवत्ता और मरीजों के इलाज पर असर डाल सकती है। विभाग का कहना है कि शुरुआती जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि समस्या मैन्युफैक्चरिंग स्तर पर है या सप्लाई चेन के किसी हिस्से में, इसकी विस्तृत जांच की जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स को निर्देश दिए हैं कि इन दवाओं के स्टॉक की दोबारा जांच की जाए और किसी भी संदिग्ध बैच को अलग रखा जाए। साथ ही संबंधित कंपनियों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा गया है और पूरे सप्लाई नेटवर्क की समीक्षा शुरू कर दी गई है। प्राथमिक जानकारी के मुताबिक, ये दवाएं सरकारी सप्लाई के साथ-साथ कुछ निजी मेडिकल स्टोर्स तक भी पहुंच चुकी थीं, जिससे सतर्कता और बढ़ा दी गई है।
इस घटना ने एक बार फिर दवा गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दवा नियमन की जिम्मेदारी केंद्रीय और राज्य स्तर पर साझा रूप से निभाई जाती है, जिसमें रैंडम सैंपलिंग और निरीक्षण जैसे प्रावधान मौजूद हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर निगरानी और नियमों के पालन को लेकर अक्सर खामियां सामने आती रही हैं। छोटे शहरों और कस्बों में कई बार दवा दुकानों के लाइसेंस रिन्यूअल, स्टोरेज की स्थिति और बिलिंग प्रक्रिया जैसे बुनियादी मानकों पर भी पूरी तरह से सख्ती नहीं दिखती। यही कारण है कि कई बार सब-स्टैंडर्ड या घटिया गुणवत्ता वाली दवाएं बाजार तक पहुंच जाती हैं और मरीजों को इसकी जानकारी भी नहीं हो पाती।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी दवाओं का सबसे बड़ा असर उन मरीजों पर पड़ता है जो पहले से गंभीर बीमारियों जैसे हृदय रोग, किडनी समस्या या संक्रमण से जूझ रहे होते हैं। कम प्रभावी दवा से इलाज पूरा नहीं हो पाता, जिससे बीमारी लंबी खिंच सकती है और कई मामलों में दुष्प्रभाव भी बढ़ सकते हैं। खासकर एंटीबायोटिक दवाओं में गड़बड़ी से एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ता है, जो आगे चलकर संक्रमण के इलाज को और कठिन बना देता है।
विभाग ने संकेत दिए हैं कि जांच पूरी होने के बाद संबंधित कंपनियों और सप्लायर पर कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही पूरे बैच और वितरण चैनल की ट्रैकिंग की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि गड़बड़ी कहां और किस स्तर पर हुई।
स्वास्थ्य विभाग ने आम लोगों से अपील की है कि वे दवाएं हमेशा विश्वसनीय और लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर से ही खरीदें, बिल जरूर लें और किसी भी तरह के साइड इफेक्ट या दवा की प्रतिक्रिया दिखने पर तुरंत डॉक्टर या स्वास्थ्य विभाग को जानकारी दें। अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी और सप्लाई चेन की निगरानी और सख्त की जाएगी।
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