सूर्य पर हुए एक शक्तिशाली सौर विस्फोट के बाद कोरोनल मास इजेक्शन (CME) पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है। अंतरिक्ष मौसम विशेषज्ञों ने G3 श्रेणी के भू-चुंबकीय तूफान की संभावना जताई है, जो कुछ समय के लिए G4 स्तर तक पहुंच सकता है। इस गतिविधि के कारण उत्तरी भारत, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में ऑरोरा (रंग-बिरंगी आकाशीय रोशनी) दिखाई देने की संभावना है। हालांकि इसके वास्तविक प्रभाव और ऑरोरा की दृश्यता मौसम तथा भू-चुंबकीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। वैज्ञानिक स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
सूर्य पर हुए एक बड़े सौर विस्फोट (Solar Eruption) ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अंतरिक्ष मौसम पर नजर रखने वाली एजेंसियों के अनुसार सूर्य से बड़ी मात्रा में ऊर्जा और आवेशित कण अंतरिक्ष में निकले हैं, जो पृथ्वी की दिशा में बढ़ रहे हैं। इस घटना के बाद भू-चुंबकीय तूफान (Geomagnetic Storm) की संभावना जताई गई है। साथ ही उत्तरी भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में ऑरोरा (Aurora) दिखाई देने की उम्मीद भी व्यक्त की जा रही है।
हालांकि इस खबर को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं। क्या यह पृथ्वी के लिए खतरनाक है? क्या सच में सूर्य का विस्फोट पृथ्वी से टकराएगा? क्या भारत में आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी दिखाई दे सकती है? आइए आसान भाषा में पूरा मामला समझते हैं।
सूर्य पर समय-समय पर बड़े विस्फोट होते रहते हैं। ये विस्फोट पृथ्वी पर होने वाले बम विस्फोटों जैसे नहीं होते, बल्कि सूर्य की सतह पर जमा विशाल ऊर्जा के अचानक बाहर निकलने से पैदा होते हैं। जब ऐसा होता है तो बड़ी मात्रा में गर्म गैस, प्लाज्मा और चुंबकीय ऊर्जा अंतरिक्ष में फैल जाती है।
इस बार भी सूर्य से एक तेज कोरोनल मास इजेक्शन (CME) निकला है। CME को आसान शब्दों में समझें तो यह सूर्य से निकला विशाल गैसीय और चुंबकीय बादल होता है। जब यह पृथ्वी की दिशा में आता है तो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ उसकी प्रतिक्रिया हो सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह CME तेज गति से पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है। इसके पहुंचने पर पृथ्वी के आसपास का अंतरिक्ष वातावरण कुछ समय के लिए अधिक सक्रिय हो सकता है। इसी कारण भू-चुंबकीय तूफान की चेतावनी जारी की गई है।
भू-चुंबकीय तूफान सुनकर कई लोगों को लगता है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा है, लेकिन हर भू-चुंबकीय तूफान खतरनाक नहीं होता। यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में होने वाली अस्थायी हलचल है। सूर्य से आने वाले आवेशित कण जब पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराते हैं तो यह स्थिति पैदा होती है।
इस बार संभावित तूफान को G3 श्रेणी का बताया गया है। G3 को मजबूत स्तर का भू-चुंबकीय तूफान माना जाता है। कुछ समय के लिए इसकी तीव्रता G4 स्तर तक भी पहुंच सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पृथ्वी पर कोई बड़ी तबाही होने वाली है।
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ऐसे तूफानों का सबसे सुंदर प्रभाव ऑरोरा के रूप में दिखाई देता है। ऑरोरा आसमान में बनने वाली रंग-बिरंगी रोशनी होती है। यह हरे, गुलाबी, बैंगनी, लाल और नीले रंग की लहरों जैसी दिखाई देती है। आमतौर पर यह दृश्य उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के पास के देशों में देखा जाता है।
नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, आइसलैंड, कनाडा और अलास्का जैसे इलाकों में ऑरोरा अक्सर दिखाई देता है। लेकिन जब सौर गतिविधि बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तो ऑरोरा का दायरा सामान्य से कहीं अधिक फैल सकता है।
इसी वजह से इस बार उत्तरी भारत में भी ऑरोरा दिखने की संभावना की चर्चा हो रही है। हालांकि यह पूरी तरह तय नहीं है। ऑरोरा दिखाई देगा या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है। भू-चुंबकीय तूफान की वास्तविक ताकत, मौसम की स्थिति, बादलों की मौजूदगी और स्थानीय प्रकाश प्रदूषण जैसे कारक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अगर आसमान साफ रहा और भू-चुंबकीय गतिविधि अनुमान के अनुसार मजबूत रही, तो कुछ इलाकों में रात के समय हल्की रंगीन चमक दिखाई दे सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं दुर्लभ होती हैं और हर बार दिखाई देना जरूरी नहीं होता।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा शुरू हो गई है। कई लोग इसे "सूर्य का विस्फोट पृथ्वी से टकराने" जैसी भाषा में बता रहे हैं। वास्तव में ऐसा कहना पूरी तरह सही नहीं है। पृथ्वी से कोई आग का गोला नहीं टकराने वाला है। सूर्य से निकले कण और चुंबकीय ऊर्जा पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित करते हैं, न कि सूर्य का कोई हिस्सा पृथ्वी तक पहुंचता है।
वैज्ञानिक लंबे समय से अंतरिक्ष मौसम की निगरानी करते हैं। जैसे पृथ्वी पर मौसम विभाग बारिश, तूफान और गर्मी पर नजर रखता है, उसी तरह अंतरिक्ष मौसम विशेषज्ञ सूर्य की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। इससे उपग्रहों और संचार प्रणालियों को संभावित प्रभावों के बारे में पहले से जानकारी मिल जाती है।
भू-चुंबकीय तूफानों का असर कभी-कभी तकनीकी प्रणालियों पर भी पड़ सकता है। मजबूत गतिविधि के दौरान रेडियो संचार में बाधा, जीपीएस सिग्नल में मामूली गड़बड़ी या उपग्रहों के संचालन पर असर देखने को मिल सकता है। हालांकि इस समय किसी बड़े व्यवधान की पुष्टि नहीं की गई है।
दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां इस घटना पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। जैसे-जैसे CME पृथ्वी के करीब पहुंचेगा, उसके प्रभावों को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आएगी। कई संस्थाएं वास्तविक समय में डेटा जारी कर रही हैं ताकि अंतरिक्ष मौसम की स्थिति को समझा जा सके।
सूर्य इस समय अपने सक्रिय चक्र के एक महत्वपूर्ण दौर में है। वैज्ञानिकों के अनुसार सौर गतिविधियों में पिछले कुछ समय से बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसी वजह से सौर ज्वालाएं और CME जैसी घटनाएं पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही हैं।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सूर्य की ऐसी गतिविधियां कोई नई बात नहीं हैं। पृथ्वी अरबों वर्षों से सूर्य के साथ इसी तरह के संबंध में मौजूद है। आधुनिक तकनीक के दौर में इन घटनाओं पर ज्यादा ध्यान इसलिए दिया जाता है क्योंकि संचार, इंटरनेट, उपग्रह और नेविगेशन जैसी सेवाएं अब अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों पर काफी निर्भर हैं।
भारत में ऑरोरा दिखाई देगा या नहीं, इसका जवाब अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। लेकिन अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो यह खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष में रुचि रखने वाले लोगों के लिए एक खास मौका हो सकता है। रात के आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी देखना अपने आप में एक दुर्लभ अनुभव माना जाता है।
फिलहाल वैज्ञानिकों की नजर पृथ्वी की ओर बढ़ रहे CME पर है। आने वाले घंटों में भू-चुंबकीय गतिविधियों की वास्तविक स्थिति साफ हो जाएगी। तब यह भी पता चलेगा कि ऑरोरा कितनी दूर तक दिखाई दे सकता है और इसका प्रभाव किस स्तर का रहेगा। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मौसम घटना है, जिस पर दुनिया भर की एजेंसियां लगातार निगरानी रख रही हैं।
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