Lancet Countdown 2025 की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन अब भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौती बन चुका है। बढ़ती गर्मी, हीटवेव और वायु प्रदूषण का असर लोगों की सेहत, कामकाज और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि PM2.5 और ओजोन जैसे प्रदूषक कई बीमारियों और समय से पहले होने वाली मौतों से जुड़े हैं। वहीं, बढ़ती गर्मी के कारण मजदूरों, किसानों और खुले में काम करने वाले लोगों की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को भी अब हीट स्ट्रोक, डेंगू, अस्थमा और प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों के लिए तैयार रहना पड़ रहा है। रिपोर्ट का संदेश साफ है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और विकास का भी बड़ा मुद्दा बन गया है।
Lancet Countdown 2025 की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ मौसम का मुद्दा नहीं रह गया है। बढ़ती गर्मी, वायु प्रदूषण और बदलते मौसम का असर सीधे लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि अस्पतालों से लेकर आम लोगों तक, सभी को इसके प्रभाव का सामना करना पड़ रहा है। भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में साफ दिखाई देने लगा है। कुछ साल पहले तक जलवायु परिवर्तन को भविष्य की समस्या माना जाता था, लेकिन अब इसका प्रभाव वर्तमान में महसूस किया जा रहा है। बढ़ती गर्मी, खराब होती हवा और मौसम में लगातार बदलाव लोगों की सेहत पर असर डाल रहे हैं।
Lancet Countdown 2025 की रिपोर्ट बताती है कि जलवायु और स्वास्थ्य का रिश्ता पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया है। देश के कई हिस्सों में लोग ऐसे मौसम का सामना कर रहे हैं जो पहले कम देखने को मिलता था। इसका असर सिर्फ पर्यावरण पर नहीं बल्कि इंसानों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार फॉसिल फ्यूल यानी कोयला, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों के इस्तेमाल से होने वाला वायु प्रदूषण आज भी भारत में बड़ी चिंता बना हुआ है। खासकर शहरों में रहने वाले लोगों को इसका ज्यादा असर झेलना पड़ रहा है। शहरों की हवा में मौजूद PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण और ओजोन का बढ़ता स्तर लोगों की सेहत को प्रभावित कर रहा है। ये छोटे-छोटे कण सांस के साथ शरीर के अंदर पहुंच जाते हैं और लंबे समय तक संपर्क में रहने पर कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं।
डॉक्टरों का मानना है कि प्रदूषित हवा का असर सबसे पहले फेफड़ों पर दिखाई देता है। सांस लेने में परेशानी, खांसी, एलर्जी और अस्थमा जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कई मामलों में दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
खराब हवा का असर केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। बच्चे, गर्भवती महिलाएं और युवा भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। लगातार प्रदूषण वाली हवा में रहने से शरीर पर धीरे-धीरे असर पड़ता है, जिसका पता कई बार देर से चलता है। रिपोर्ट में बढ़ती हीटवेव यानी लू को भी बड़ी चुनौती बताया गया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के कई राज्यों में रिकॉर्ड स्तर की गर्मी देखने को मिली है। कई जगहों पर तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंचा है।
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सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है जो खुले में काम करते हैं। किसान, मजदूर, निर्माण कार्य से जुड़े कर्मचारी, डिलीवरी एजेंट और सड़क पर काम करने वाले लाखों लोग हर दिन तेज धूप और गर्मी का सामना करते हैं।
जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो लंबे समय तक बाहर काम करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में लोगों को काम के घंटे कम करने पड़ते हैं या बीच-बीच में आराम करना पड़ता है। इससे उनकी कमाई भी प्रभावित हो सकती है।
गर्मी बढ़ने के साथ ही शरीर में पानी की कमी होने का खतरा भी बढ़ जाता है। कई लोगों को डिहाइड्रेशन, थकान और चक्कर जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। गंभीर स्थिति में हीट स्ट्रोक का खतरा भी रहता है।
रिपोर्ट बताती है कि बढ़ती गर्मी का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। इससे कामकाज और उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। जब लोग ज्यादा समय तक काम नहीं कर पाते तो कई क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
निर्माण और कृषि जैसे क्षेत्रों में यह चुनौती और बड़ी हो जाती है क्योंकि इन क्षेत्रों का अधिकांश काम खुले वातावरण में होता है। तेज गर्मी के कारण काम की गति धीमी पड़ सकती है। जलवायु परिवर्तन का असर अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। स्वास्थ्य केंद्रों को अब ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार रहना पड़ रहा है जो पहले कम देखने को मिलती थीं।
Continue Reading9 जून 2026
रिपोर्ट के अनुसार बदलते मौसम की वजह से कुछ बीमारियों का स्वरूप भी बदल रहा है। डेंगू जैसी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का मौसम कई क्षेत्रों में लंबा हो सकता है। इससे स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। तेज गर्मी के दौरान अस्पतालों में हीट स्ट्रेस और हीट स्ट्रोक से जुड़े मरीजों की संख्या बढ़ सकती है। ऐसे मामलों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को अतिरिक्त तैयारी की जरूरत पड़ती है।
वायु प्रदूषण के कारण सांस से जुड़ी बीमारियों वाले मरीजों की परेशानी भी बढ़ सकती है। अस्थमा और फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोगों को खराब हवा वाले दिनों में ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि जलवायु परिवर्तन को अब केवल पर्यावरण का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह स्वास्थ्य, रोजगार और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बन चुका है। आम लोगों के लिए यह समस्या रोज महसूस की जा सकती है। जब कोई व्यक्ति घर से बाहर निकलता है तो वह जिस हवा में सांस लेता है और जिस तापमान में काम करता है, उसका सीधा असर उसके शरीर पर पड़ता है।
गर्मी और प्रदूषण का असर गरीब और कमजोर वर्गों पर अधिक पड़ सकता है क्योंकि उनके पास कई बार पर्याप्त संसाधन नहीं होते। खुले में काम करने वाले लोगों को सबसे ज्यादा जोखिम का सामना करना पड़ता है।
Continue Reading8 जून 2026
रिपोर्ट में यह संकेत भी दिया गया है कि शहरों की योजना बनाते समय पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों को ध्यान में रखना जरूरी है। अधिक हरियाली, स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर सार्वजनिक परिवहन जैसी पहलें लोगों की सेहत को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ हवा और सुरक्षित तापमान केवल पर्यावरण से जुड़ा लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरत भी है। प्रदूषण कम होने से लाखों लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है।
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए स्वास्थ्य व्यवस्था को भी नई चुनौतियों के लिए तैयार करना जरूरी होता जा रहा है। अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मौसम से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है।
Lancet Countdown 2025 की रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। बढ़ती गर्मी, खराब हवा और बदलता मौसम अब भविष्य की चिंता नहीं बल्कि वर्तमान की सच्चाई हैं। इनका असर लोगों की सेहत, काम और जीवन पर दिखाई दे रहा है। भारत के लिए यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। यह स्वास्थ्य, रोजगार और विकास से जुड़ी चुनौती भी है। इसलिए जलवायु और स्वास्थ्य को एक साथ समझना और उसी हिसाब से नीतियां बनाना पहले से ज्यादा जरूरी होता जा रहा है।
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9 जून 2026