सोशल मीडिया पर यह दावा वायरल है कि PIB Fact Check अब किसी भी खबर को इंटरनेट से हटवा सकता है। फैक्ट चेक में पता चला कि दावा पूरी तरह सही नहीं है। प्रस्तावित और अधिसूचित प्रावधान मुख्य रूप से केंद्र सरकार से जुड़े कंटेंट तक सीमित हैं, हालांकि इसे लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया पर असर को लेकर बहस जारी है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पिछले कुछ समय से एक संदेश तेजी से साझा किया जा रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि PIB Fact Check यूनिट अब किसी भी खबर, पोस्ट या लेख को “फेक” घोषित करके इंटरनेट से हटवा सकती है। कई पोस्ट में यह भी कहा गया कि यदि सोशल मीडिया कंपनियां या वेबसाइटें ऐसा कंटेंट नहीं हटातीं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। इस दावे ने लोगों के बीच भ्रम पैदा किया है कि क्या सरकार को अब ऑनलाइन सामग्री पर व्यापक नियंत्रण मिल गया है।
फैक्ट चेक में सामने आया कि वायरल दावा वास्तविक नियमों की तुलना में काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने आईटी नियमों में संशोधन से जुड़े प्रावधानों के तहत ऐसी व्यवस्था प्रस्तावित की थी, जिसमें सरकार से संबंधित कुछ प्रकार की जानकारी को “फेक” या “फॉल्स” घोषित किए जाने पर इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारियां तय की गई थीं।
इन नियमों का दायरा सभी प्रकार की खबरों या हर विषय पर प्रकाशित सामग्री तक नहीं बताया गया था। प्रस्तावित व्यवस्था मुख्य रूप से केंद्र सरकार के कामकाज, योजनाओं, नीतियों, आधिकारिक सूचनाओं और सरकारी मामलों से जुड़े कंटेंट पर केंद्रित थी। यानी किसी सरकारी योजना, बजट, मंत्रालय के दावे या आधिकारिक आंकड़ों से जुड़ी गलत जानकारी को चिन्हित करने की बात की गई थी।
बाद में सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि इस उद्देश्य के लिए Press Information Bureau (PIB) की Fact Check Unit को नामित किया जा सकता है। PIB पहले से सरकार से संबंधित भ्रामक या गलत सूचनाओं की पहचान करने का काम करता रहा है। इस व्यवस्था के तहत यदि सरकार से जुड़े किसी दावे को फेक या फॉल्स माना जाता है तो संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उस कंटेंट के संबंध में कार्रवाई का दबाव बन सकता है।
यहीं से भ्रम की स्थिति पैदा हुई। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे इस रूप में प्रस्तुत किया कि PIB को अब इंटरनेट पर मौजूद किसी भी समाचार सामग्री को हटवाने का अधिकार मिल गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह निष्कर्ष सही नहीं माना जा सकता। नियमों की चर्चा केंद्र सरकार से जुड़े कंटेंट तक सीमित रही है और इसे सभी समाचार संस्थानों, निजी कंपनियों, राज्य सरकारों या अन्य स्वतंत्र विषयों पर लागू सार्वभौमिक सेंसरशिप के रूप में नहीं देखा गया है।
इस मुद्दे पर कानूनी और लोकतांत्रिक बहस भी सामने आई। कई डिजिटल अधिकार समूहों, मीडिया संगठनों और स्वतंत्र टिप्पणीकारों ने चिंता जताई कि यदि सरकार से जुड़े तथ्यों की अंतिम व्याख्या सरकार की ही किसी एजेंसी के हाथ में होगी तो निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। आलोचकों का तर्क रहा कि इससे आलोचनात्मक रिपोर्टिंग और तथ्य आधारित असहमति प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष यह रहा है कि फर्जी सूचनाओं और गलत दावों पर रोक लगाना जरूरी है, खासकर तब जब वे सरकारी योजनाओं, सार्वजनिक सेवाओं या आधिकारिक सूचनाओं से संबंधित हों। डिजिटल माध्यमों पर तेजी से फैलने वाली भ्रामक जानकारी को रोकने के लिए तथ्य जांच तंत्र को आवश्यक बताया गया है।
फैक्ट चेक का निष्कर्ष यह है कि “PIB Fact Check अब किसी भी खबर को हटवा सकता है” वाला दावा आंशिक रूप से भ्रामक है। उपलब्ध नियमों और अधिसूचनाओं के आधार पर PIB या किसी अधिकृत फैक्ट चेक यूनिट की भूमिका केंद्र सरकार से जुड़े कंटेंट तक सीमित बताई गई है। साथ ही, इस व्यवस्था को लेकर कानूनी चुनौतियां और सार्वजनिक बहस भी जारी रही हैं। इसलिए वायरल संदेश में किया गया यह दावा कि सरकार अब इंटरनेट पर मौजूद हर खबर को अपनी मर्जी से हटवा सकती है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जा सकता।
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