राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के ताज़ा आंकड़ों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कई प्रमुख संकेतकों में सुधार दर्ज किया गया है। संस्थागत प्रसव 90.6% तक पहुंचा है, जबकि बच्चों के पूर्ण टीकाकरण का दायरा 87.1% दर्ज किया गया है।
देश में मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने के संकेत राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) की हालिया रिपोर्ट में सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, संस्थागत प्रसव की दर 90.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में महिलाएं अब अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी में प्रसव करा रही हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ लंबे समय से संस्थागत प्रसव को मातृ और नवजात मृत्यु दर कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानते रहे हैं। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच में सुधार का असर अब जमीनी स्तर पर भी दिखाई देने लगा है। प्रसव के दौरान चिकित्सा सहायता उपलब्ध होने से जटिल परिस्थितियों में समय पर इलाज की संभावना बढ़ती है।
रिपोर्ट में बच्चों के टीकाकरण से जुड़े आंकड़े भी उत्साहजनक रहे हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण कवरेज 87.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि अधिक बच्चों को समय पर जरूरी टीके मिल रहे हैं, जिससे कई गंभीर और संक्रामक बीमारियों से बचाव संभव हो रहा है।
बच्चों के पोषण से जुड़े संकेतकों में भी सुधार दर्ज किया गया है। NFHS-6 के आंकड़ों के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग यानी उम्र के मुकाबले कम लंबाई की समस्या में गिरावट आई है। स्टंटिंग को लंबे समय तक पोषण की कमी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का संकेतक माना जाता है। इस सूचकांक में कमी को बाल स्वास्थ्य की दिशा में सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
रिपोर्ट महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी में बढ़ोतरी की ओर भी इशारा करती है। शिक्षा तक बेहतर पहुंच, बैंक खातों का विस्तार और स्वयं सहायता समूहों में बढ़ती भागीदारी ने महिलाओं में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता को मजबूत किया है। इसका प्रभाव परिवारों के स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों और सेवाओं के उपयोग पर भी दिखाई देता है।
सरकारी स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की भूमिका भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण मानी गई है। आयुष्मान भारत, जननी सुरक्षा योजना, जनधन योजना और पोषण अभियान जैसी पहलें स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इलाज के खर्च का दबाव कम करने में सहायक रही हैं। इन योजनाओं के संयुक्त प्रभाव से कई परिवारों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ पहले की तुलना में अधिक आसानी से मिल रहा है।
डिजिटल स्वास्थ्य क्षेत्र में भी विस्तार दर्ज किया गया है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत 90 करोड़ से अधिक आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (ABHA) बनाए जा चुके हैं। इससे लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने और विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं के बीच जानकारी साझा करने की सुविधा बढ़ी है। डिजिटल व्यवस्था के विस्तार से भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और पहुंच को और बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट के सकारात्मक संकेतों के बावजूद कुछ चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। देश के कई ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता में अंतर देखा जाता है। कई इलाकों में पोषण, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़े मुद्दे अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं।
कुपोषण और एनीमिया जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक स्तर पर काम किए जाने की जरूरत बनी हुई है। स्वास्थ्य संकेतकों में दीर्घकालिक और समान सुधार सुनिश्चित करने के लिए पोषण कार्यक्रमों, स्वच्छता अभियानों, महिलाओं की शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर लगातार ध्यान देना होगा। NFHS-6 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश स्वास्थ्य सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन सभी क्षेत्रों तक समान लाभ पहुंचाना अभी भी एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बना हुआ है।
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