जेनेवा में चल रही WHO की 79वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में जलवायु परिवर्तन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों, महामारी तैयारी और वैक्सीन की वैश्विक पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। भारत समेत कई विकासशील देशों ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में बराबरी की भागीदारी की मांग उठाई है।
स्विट्जरलैंड के जेनेवा में चल रही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 79वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली (WHA 79) में इस बार जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़े स्वास्थ्य संकट प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। दुनिया भर से पहुंचे स्वास्थ्य मंत्री, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, शोधकर्ता और सिविल सोसायटी समूह बढ़ती गर्मी, बाढ़, प्रदूषण और नए संक्रमणों के खतरे पर कई दौर की चर्चा कर रहे हैं।
बैठकों में बार-बार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। कई देशों ने हीटवेव, वायु प्रदूषण और जलजनित बीमारियों के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव नई बीमारियों और रोगजनकों के उभरने का खतरा भी बढ़ा सकते हैं।
असेंबली के कई सत्रों में महामारी से जुड़ी तैयारियों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। कोविड-19 महामारी के अनुभव के बाद सदस्य देश इस बात पर विचार कर रहे हैं कि भविष्य में किसी वैश्विक स्वास्थ्य संकट की स्थिति में देशों के बीच सहयोग, संसाधनों का वितरण और मेडिकल सप्लाई कैसे बेहतर बनाई जाए। महामारी समझौते को मजबूत करने और आपातकालीन स्वास्थ्य ढांचे को तैयार रखने पर कई प्रस्तावों पर चर्चा जारी है।
विकासशील देशों ने इस मंच पर स्वास्थ्य संसाधनों की असमान उपलब्धता का मुद्दा भी उठाया। भारत समेत कई देशों ने कहा कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में केवल नीतिगत चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि संसाधनों और निर्णय प्रक्रिया में भी समान भागीदारी जरूरी है। कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन और दवाओं की पहुंच में जो अंतर दिखाई दिया, उसे भविष्य के लिए गंभीर सबक के तौर पर देखा जा रहा है।
बैठकों में स्वास्थ्य वित्त पोषण पर भी खास जोर दिया गया। कई प्रतिनिधियों ने कहा कि कम और मध्यम आय वाले देशों में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक निवेश की जरूरत है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, स्थानीय स्तर पर दवा और वैक्सीन उत्पादन तथा आपदा के समय तेजी से प्रतिक्रिया देने वाली प्रणालियों को मजबूत बनाने पर भी चर्चा हुई।
जलवायु और स्वास्थ्य के संबंध पर हो रही बातचीत का असर आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर भी दिखाई दे रहा है। स्वच्छ हवा, सुरक्षित पेयजल, पोषण और शहरी प्रदूषण जैसे विषयों को अब सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अस्पतालों और इलाज की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि लोगों के रहने के माहौल और पर्यावरणीय स्थितियों को भी स्वास्थ्य नीतियों में शामिल करना पड़ेगा।
कई सत्रों में “क्लाइमेट जस्टिस” और “हेल्थ इक्विटी” जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने कहा कि जलवायु संकट का असर गरीब और संवेदनशील आबादी पर ज्यादा पड़ता है। अत्यधिक गर्मी, जल संकट और प्रदूषण उन समुदायों को अधिक प्रभावित करते हैं जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पहले से सीमित है।
WHO की यह वार्षिक बैठक वैश्विक स्वास्थ्य नीति तय करने का अहम मंच मानी जाती है। आने वाले दिनों में महामारी तैयारी, स्वास्थ्य फंडिंग, वैक्सीन पहुंच और जलवायु से जुड़े स्वास्थ्य उपायों पर सदस्य देशों के बीच आगे भी चर्चा जारी रहने की संभावना है। कई प्रस्तावों पर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है ताकि भविष्य के स्वास्थ्य संकटों से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर बेहतर समन्वय तैयार किया जा सके।
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