कैलिफ़ोर्निया के UC Davis के शोधकर्ताओं ने एक छोटा AI-पावर्ड चिप विकसित किया है जो रोशनी और रसायनों का विश्लेषण सीधे डिवाइस पर ही कर सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में मेडिकल टेस्ट, प्रदूषण मॉनिटरिंग और खाद्य गुणवत्ता जांच जैसे क्षेत्रों में बड़े बदलाव ला सकती है।
अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित UC Davis विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा AI-पावर्ड माइक्रोचिप विकसित किया है जो रोशनी और रसायनों का विश्लेषण सीधे उसी चिप पर कर सकता है। यह तकनीक स्पेक्ट्रोस्कोपी और मशीन लर्निंग को एक साथ जोड़ती है, जिससे किसी पदार्थ की केमिकल पहचान तेज़ और छोटे स्तर पर संभव हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह चिप इतना कॉम्पैक्ट है कि भविष्य में इसे पोर्टेबल डिवाइस, मेडिकल सेंसर और इंडस्ट्रियल उपकरणों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा।
अब तक हाई-प्रिसीजन केमिकल और लाइट एनालिसिस के लिए बड़े लैब उपकरणों की जरूरत पड़ती थी। इन मशीनों से मिलने वाला डेटा अलग कंप्यूटर सिस्टम या क्लाउड सर्वर पर प्रोसेस किया जाता था। UC Davis की टीम ने इस प्रक्रिया को छोटे स्तर पर लाने की कोशिश की है, जहां डेटा प्रोसेसिंग और विश्लेषण दोनों काम एक ही चिप पर हो सकें।
रिसर्च टीम ने फोटोनिक सर्किट और AI मॉडल को एकीकृत करके ऐसा सिस्टम तैयार किया है जो अलग-अलग तरंगदैर्घ्य वाली रोशनी के पैटर्न को पहचान सकता है। इसी आधार पर यह तय किया जाता है कि किसी सैंपल में कौन-से रसायन मौजूद हैं और उनकी मात्रा कितनी हो सकती है। स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक लंबे समय से वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षेत्रों में इस्तेमाल होती रही है, लेकिन अब इसे छोटे और स्मार्ट डिवाइस में बदलने की दिशा में काम तेज़ हो रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, AI मॉडल को पहले से प्रशिक्षित किया जाता है और बाद में उसी मॉडल को चिप में एम्बेड कर दिया जाता है। इसका फायदा यह है कि डिवाइस को हर बार डेटा क्लाउड पर भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे रियल-टाइम एनालिसिस संभव हो पाता है और इंटरनेट या बड़े सर्वर पर निर्भरता भी कम होती है।
यह तकनीक AI इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ रहे “एज कंप्यूटिंग” ट्रेंड से भी जुड़ी हुई मानी जा रही है। इसका मतलब है कि छोटे-छोटे डिवाइस खुद डेटा समझने और सीमित स्तर पर फैसले लेने में सक्षम हो रहे हैं। इससे डेटा ट्रांसफर कम होता है और प्रोसेसिंग तेज़ हो सकती है। खासकर उन जगहों पर यह उपयोगी माना जा रहा है जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी सीमित है या तुरंत नतीजे चाहिए होते हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर इस तरह के AI चिप्स को बड़े पैमाने पर कम लागत में तैयार किया जा सका तो मेडिकल डायग्नोस्टिक्स में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर, भविष्य में छोटे पॉकेट डिवाइस खून के सैंपल की शुरुआती जांच कर सकते हैं या पानी और हवा में मौजूद प्रदूषण की तुरंत पहचान कर सकते हैं।
खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भी इसका इस्तेमाल संभावित माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, दूध या खाने-पीने की चीजों में मिलावट की जांच के लिए छोटे सेंसर आधारित उपकरण तैयार किए जा सकते हैं। इंडस्ट्रियल सेक्टर में क्वालिटी कंट्रोल और केमिकल मॉनिटरिंग जैसे काम भी तेज़ और सस्ते हो सकते हैं।
इस तकनीक का एक बड़ा पहलू ऊर्जा खपत से भी जुड़ा है। AI आधारित डेटा प्रोसेसिंग के लिए बड़े डेटा सेंटरों की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जिससे बिजली की खपत भी बढ़ती है। ऐसे में अगर छोटे डिवाइस खुद ही शुरुआती स्तर का विश्लेषण करने लगें, तो कुछ हद तक केंद्रीय सर्वरों पर दबाव कम किया जा सकता है।
विकासशील देशों के लिए इस तरह की तकनीक खास महत्व रख सकती है। कई छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आधुनिक लैब सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्मार्टफोन और सस्ते इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस तेजी से पहुंच रहे हैं। ऐसे में भविष्य में पोर्टेबल सेंसर आधारित टेस्टिंग सिस्टम स्वास्थ्य और सुरक्षा सेवाओं को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं।
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