OECD की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देशों ने 2023 में विकासशील देशों के लिए 132.8 अरब डॉलर की क्लाइमेट फाइनेंस जुटाई। यह राशि पुराने 100 अरब डॉलर सालाना लक्ष्य से आगे निकल गई है और जलवायु परियोजनाओं के लिए वैश्विक निवेश बढ़ने का संकेत देती है।
दुनिया भर में बढ़ती गर्मी, बाढ़, सूखा और मौसम से जुड़ी दूसरी चुनौतियों के बीच जलवायु वित्त को लेकर एक सकारात्मक तस्वीर सामने आई है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन यानी OECD की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देशों ने 2023 में विकासशील देशों के लिए कुल 132.8 अरब डॉलर की क्लाइमेट फाइनेंस जुटाई। यह पहली बार नहीं है जब 100 अरब डॉलर का लक्ष्य पार हुआ है, लेकिन नई रिपोर्ट बताती है कि सार्वजनिक और निजी दोनों स्रोतों से जलवायु परियोजनाओं में निवेश का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
यह लक्ष्य पेरिस समझौते के तहत तय किया गया था, जिसके अनुसार विकसित देशों को हर साल विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आर्थिक मदद देनी थी। लंबे समय तक यह शिकायत रही कि घोषित लक्ष्य के मुकाबले वास्तविक फंडिंग कम रही और जो पैसा उपलब्ध कराया गया उसका बड़ा हिस्सा कर्ज के रूप में था, अनुदान के रूप में नहीं। अब OECD के आंकड़े संकेत देते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस की कुल मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है, हालांकि फंडिंग की गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है।
क्लाइमेट फाइनेंस का इस्तेमाल उन परियोजनाओं में किया जाता है जो कार्बन उत्सर्जन कम करने या जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने में मदद करें। इसमें सोलर और विंड एनर्जी, स्वच्छ परिवहन, जल संरक्षण, टिकाऊ खेती, बाढ़ प्रबंधन और शहरी ढांचे से जुड़ी योजनाएं शामिल होती हैं। कई विकासशील देशों के लिए यह पैसा बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने और जलवायु जोखिम घटाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
भारत जैसे देशों में इस तरह की फंडिंग का असर सीधे स्थानीय परियोजनाओं पर दिख सकता है। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत कई राज्यों के साथ सुधार-आधारित समझौते किए हैं। इनमें जल स्रोतों की स्थिरता, डिजिटल वॉटर डेटा, पाइपलाइन मॉनिटरिंग और सामुदायिक भागीदारी जैसे पहलुओं पर जोर दिया गया है। ऐसे सुधार अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और विकास बैंकों से सहयोग हासिल करने में मदद कर सकते हैं।
विशेषज्ञ लंबे समय से यह भी कहते रहे हैं कि केवल उत्सर्जन कम करना पर्याप्त नहीं होगा। विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के मौजूदा असर से निपटने के लिए भी बड़े निवेश की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर तटीय इलाकों में बाढ़ सुरक्षा, सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल संरक्षण और तेजी से गर्म हो रहे शहरों में हरित बुनियादी ढांचे की मांग बढ़ रही है। OECD के आंकड़ों में यह भी सामने आया है कि मल्टी-लैटरल डेवलपमेंट बैंकों और निजी निवेशकों की भूमिका पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है।
भारत में स्मार्ट ग्रिड, सोलर पार्क, इलेक्ट्रिक बस नेटवर्क और जल संरक्षण परियोजनाएं पहले से ही कई राज्यों में चल रही हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय क्लाइमेट फाइनेंस का प्रवाह स्थिर बना रहता है तो इन योजनाओं के विस्तार में मदद मिल सकती है। इससे ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ पानी और शहरी सेवाओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
आम लोगों के लिए यह विषय भले तकनीकी लगे, लेकिन इसका सीधा संबंध रोजमर्रा की सुविधाओं से है। बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, गर्मी से राहत देने वाले शहरी प्रोजेक्ट, सोलर रूफटॉप, सार्वजनिक परिवहन और पानी की उपलब्धता जैसी चीजें जलवायु निवेश से जुड़ी हैं। कई विकासशील देशों के लिए चुनौती अब सिर्फ पैसा जुटाने की नहीं, बल्कि उसे सही परियोजनाओं और पारदर्शी व्यवस्था के साथ जमीन पर लागू करने की भी है।
ClimateChange ClimateFinance OECD GreenEnergy Sustainability India CleanEnergy GlobalNews Environment NetGramNews
Published by: Gulam Rasool. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.