उत्तर कोरिया ने हाल में ऐसे शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण किए हैं जिनमें क्लस्टर-म्यूनिशन वॉरहेड इस्तेमाल करने का दावा किया गया। सोशल मीडिया पर इसे लेकर युद्ध की आशंकाएं तेज हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे फिलहाल रणनीतिक दबाव और सैन्य संदेश देने की कोशिश मान रहे हैं।
उत्तर कोरिया के हालिया मिसाइल परीक्षणों ने एक बार फिर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। सरकारी मीडिया KCNA के मुताबिक, देश ने Hwasong-11 सीरीज़ की कुछ शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया, जिनमें क्लस्टर-म्यूनिशन वॉरहेड लगाए गए थे। दावा किया गया कि ये मिसाइलें 6.5 से 7 हेक्टेयर तक के इलाके को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखती हैं।
इन परीक्षणों के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूजर्स ने इसे “थर्ड वर्ल्ड वॉर की तैयारी” तक बताया, जबकि रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि मौजूदा हालात को सीधे बड़े युद्ध की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तर कोरिया अक्सर ऐसे परीक्षणों का इस्तेमाल सैन्य क्षमता दिखाने और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए करता रहा है।
दक्षिण कोरिया के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अनुसार, 19 अप्रैल को दागी गई कुछ मिसाइलों ने करीब 90 मील तक उड़ान भरी और Sea of Japan में जाकर गिरीं। इन लॉन्चों को लेकर दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। दोनों देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती बताया और संयुक्त सैन्य तैयारियों को मजबूत करने की बात कही।
क्लस्टर म्यूनिशन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय रहे हैं। इस तरह के हथियार हवा में फटकर कई छोटे सबम्यूनिशन फैलाते हैं। इनमें से कुछ तुरंत विस्फोट करते हैं, जबकि कई बिना फटे जमीन पर पड़े रह जाते हैं और बाद में लैंडमाइन जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं। इसी वजह से दुनिया के कई देशों और मानवाधिकार संगठनों ने इनके इस्तेमाल पर चिंता जताई है।
आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक यह पहली बार नहीं है जब उत्तर कोरिया ने इस तरह की क्षमता का प्रदर्शन किया हो। अप्रैल की शुरुआत में भी उसने समान तकनीक वाले वॉरहेड का दावा किया था। हालिया परीक्षणों को उत्तर कोरिया की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसमें वह दक्षिण कोरिया और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बड़े क्षेत्र में नुकसान पहुंचाने की क्षमता दिखाना चाहता है।
CNN और NPR की रिपोर्ट्स में रक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि फिलहाल इन परीक्षणों का मकसद “डिटरेंस” यानी विरोधी देशों को चेतावनी देना ज्यादा लगता है। उत्तर कोरिया यह संकेत देना चाहता है कि वह पारंपरिक मिसाइल हमलों से आगे बढ़कर बड़े इलाके को प्रभावित करने वाले हथियार विकसित कर रहा है।
इसके बावजूद अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया या अमेरिका तत्काल बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहे हों। प्रतिक्रिया फिलहाल कूटनीतिक दबाव, संयुक्त सैन्य अभ्यास और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने तक सीमित दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस तरह के तनाव में सबसे बड़ा खतरा गलत आकलन या तकनीकी गलती का होता है। मिसाइल परीक्षण, सैन्य अभ्यास और जवाबी कार्रवाई के बीच किसी भी स्तर पर गलतफहमी हालात को तेजी से बिगाड़ सकती है।
भारत समेत एशिया के कई देशों के लिए यह घटनाक्रम केवल दूर की भू-राजनीतिक खबर नहीं है। कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव बढ़ने का असर वैश्विक तेल कीमतों, समुद्री व्यापार, सप्लाई चेन और साइबर सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
क्लस्टर म्यूनिशन को लेकर चल रही बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि आधुनिक युद्ध तकनीक कितनी तेजी से बदल रही है और क्या अंतरराष्ट्रीय नियम इन हथियारों की रफ्तार के साथ चल पा रहे हैं। फिलहाल दुनिया की नजर उत्तर कोरिया के अगले कदम और अमेरिका-दक्षिण कोरिया की रणनीतिक प्रतिक्रिया पर बनी हुई है।
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