एसिड अटैक सर्वाइवर और एक्टिविस्ट रेशमा कुरैशी को तीन साल के संघर्ष के बाद 63 प्रतिशत स्थायी विकलांगता का आधिकारिक दर्जा मिल गया है। संशोधित यूनिक डिसएबिलिटी ID कार्ड में उनके चेहरे और दृष्टि से जुड़ी गंभीर क्षति को मान्यता दी गई है।
एसिड अटैक सर्वाइवर और सामाजिक कार्यकर्ता रेशमा कुरैशी को आखिरकार वह सरकारी मान्यता मिल गई है, जिसके लिए वे पिछले तीन साल से लगातार लड़ाई लड़ रही थीं। मेडिकल पुनर्मूल्यांकन के बाद अब उनकी स्थायी विकलांगता 63 प्रतिशत दर्ज की गई है और उन्हें संशोधित यूनिक डिसएबिलिटी ID कार्ड जारी कर दिया गया है। इस नए प्रमाणन में एसिड हमले से चेहरे और दृष्टि पर पड़े गंभीर असर को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, रेशमा को पहले जो डिसएबिलिटी सर्टिफिकेट मिला था, उसमें उनकी विकलांगता का प्रतिशत कम दर्ज किया गया था। इसका असर कई सरकारी योजनाओं और सुविधाओं पर पड़ रहा था, क्योंकि लाभ पाने के लिए तय प्रतिशत और श्रेणियों का बड़ा महत्व होता है। रेशमा ने इसी फैसले को चुनौती देते हुए दोबारा मेडिकल जांच और श्रेणी संशोधन की मांग शुरू की थी।
इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ा। प्रशासनिक स्तर पर देरी और कागजी प्रक्रियाओं के बीच यह मामला लंबे समय तक अटका रहा। आखिरकार मेडिकल बोर्ड ने माना कि एसिड हमले के कारण हुई शारीरिक क्षति स्थायी है और इसका असर सिर्फ चेहरे तक सीमित नहीं है, बल्कि दृष्टि और रोजमर्रा के जीवन पर भी पड़ता है।
रेशमा कुरैशी पर कई साल पहले उनके बहनोई और उसके साथियों ने एसिड से हमला किया था। इस हमले में उनका चेहरा बुरी तरह झुलस गया था और एक आंख की रोशनी चली गई थी। हमले के बाद उन्होंने लंबे इलाज और कई सर्जरी का सामना किया, लेकिन सार्वजनिक जीवन से पीछे हटने के बजाय उन्होंने सामाजिक अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई।
वे एसिड की खुले बाजार में बिक्री के खिलाफ चलाए गए अभियानों का प्रमुख चेहरा बनीं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा और एसिड अटैक के मामलों पर जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने देश और विदेश में कई मंचों पर अपनी बात रखी। धीरे-धीरे उनकी पहचान सिर्फ एक सर्वाइवर के रूप में नहीं, बल्कि अधिकारों की आवाज उठाने वाली एक्टिविस्ट के रूप में बनने लगी।
साल 2016 में रेशमा उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं जब उन्होंने न्यूयॉर्क फैशन वीक में रैंप वॉक किया। वे वहां हिस्सा लेने वाली पहली भारतीय एसिड अटैक सर्वाइवर थीं। उस प्रस्तुति को केवल फैशन इवेंट नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक सोच को चुनौती देने वाले संदेश के रूप में देखा गया था।
रेशमा का मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि कई एसिड अटैक सर्वाइवर सरकारी रिकॉर्ड में सही डिसएबिलिटी श्रेणी और प्रतिशत नहीं मिलने की शिकायत करते रहे हैं। विकलांगता का प्रतिशत कम दर्ज होने पर शिक्षा, पेंशन, रोजगार और स्वास्थ्य से जुड़ी कई योजनाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में दोबारा मूल्यांकन की प्रक्रिया अक्सर लंबी और जटिल होती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि एसिड अटैक के मामलों में सिर्फ बाहरी चोट को नहीं, बल्कि दृष्टि, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले असर को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। रेशमा के मामले में संशोधित प्रमाणन इसी व्यापक असर को स्वीकार करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
रेशमा ने पिछले कुछ वर्षों में कई सार्वजनिक अभियानों में हिस्सा लिया है और एसिड सर्वाइवरों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठाई है। उनका यह मामला अब उन लोगों के लिए भी उदाहरण बन रहा है जो सरकारी दस्तावेजों में अपनी वास्तविक स्थिति दर्ज कराने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।
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