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राजस्थान के जैसलमेर स्थित गोडावण संरक्षण केंद्रों में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से दो नए चूज़ों का जन्म हुआ है। इसके साथ ही रामदेवरा और सुदासरी केंद्रों में संरक्षित ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की कुल संख्या 86 तक पहुंच गई है।
राजस्थान के थार मरुस्थल से गोडावण संरक्षण को लेकर एक सकारात्मक खबर सामने आई है। जैसलमेर के रामदेवरा और सुदासरी ब्रीडिंग सेंटर में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक की मदद से दो नए गोडावण चूज़ों का जन्म हुआ है। इन दोनों चूज़ों के जुड़ने के बाद संरक्षण केंद्रों में मौजूद ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण की कुल संख्या 86 हो गई है।
वन विभाग और संरक्षण कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, अब तक 26 गोडावण चूज़े सिर्फ आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन तकनीक के जरिए पैदा किए जा चुके हैं। इस प्रजाति के संरक्षण में इसे दुनिया के चुनिंदा और महत्वपूर्ण प्रयोगों में माना जा रहा है। गोडावण को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ श्रेणी में रखा है। माना जाता है कि जंगली इलाके में इसकी संख्या अब बेहद सीमित रह गई है।
कभी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के घास के मैदानों में बड़ी संख्या में दिखने वाला यह पक्षी पिछले कुछ दशकों में तेजी से कम हुआ है। संरक्षण विशेषज्ञों के मुताबिक हाईटेंशन बिजली लाइनें, पवन ऊर्जा परियोजनाएं, बदलता कृषि पैटर्न और अवैध शिकार इसके प्रमुख खतरे बने। खास तौर पर बिजली लाइनों से टकराव को गोडावण मौतों की बड़ी वजह माना गया है।
Continue Reading27 मई 2026
गोडावण संरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। अदालत ने 2024 में राजस्थान सरकार को पारंपरिक ‘ओरण’ और अन्य घास के मैदानों को सुरक्षित क्षेत्र के रूप में संरक्षित करने की दिशा में काम तेज करने को कहा था। इन इलाकों को गोडावण के प्राकृतिक आवास के तौर पर देखा जाता है।
इसी संकट के बीच केंद्र सरकार, राजस्थान वन विभाग और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने मिलकर जैसलमेर में विशेष ब्रीडिंग सेंटर तैयार किए। यहां अंडों की कृत्रिम ऊष्मायन प्रक्रिया, चूज़ों की हैंड-रियरिंग और नियंत्रित प्रजनन तकनीकों पर काम किया जा रहा है। अब कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम को भी संरक्षण रणनीति का अहम हिस्सा बनाया गया है।
Continue Reading26 मई 2026
ताजा आंकड़ों के मुताबिक रामदेवरा केंद्र में इस समय 61 और सुदासरी केंद्र में 25 गोडावण मौजूद हैं। इनमें बड़ी संख्या उन पक्षियों की है जो कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम के तहत पैदा हुए हैं। इस साल अब तक कुल 18 नए चूज़ों का जन्म हुआ है, जिनमें 13 सीधे तौर पर AI तकनीक से पैदा हुए बताए गए हैं।
संरक्षण कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ ब्रीडिंग सेंटर बनाना पर्याप्त नहीं होगा। गोडावण को जीवित रखने के लिए बड़े और जुड़े हुए घास के मैदानों की जरूरत है। अनुमान है कि एक वयस्क गोडावण 100 से 1000 वर्ग किलोमीटर तक के इलाके में विचरण करता है। ऐसे में इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी माना जा रहा है।
Continue Reading27 मई 2026
इसी उद्देश्य से राजस्थान सरकार ने रामदेवरा के पास री-वाइल्डिंग एवीअरी विकसित करने की योजना को मंजूरी दी है। करीब 14 मीटर ऊंची और 160 मीटर लंबी इस संरचना पर लगभग 8 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान है। यहां कैप्टिव ब्रीडिंग से पैदा हुए चूज़ों को खुले वातावरण जैसी परिस्थितियों में उड़ान और प्राकृतिक व्यवहार के लिए तैयार किया जाएगा।
जोधपुर और जैसलमेर क्षेत्र के लोगों के लिए गोडावण सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि थार की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माना जाता है। संरक्षण कार्यक्रम के सफल होने पर इको-टूरिज्म और पर्यावरण शिक्षा को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर यह पहल वैज्ञानिक तकनीक और वन्यजीव संरक्षण के संयुक्त मॉडल के रूप में देखी जा रही है।
Disclaimer:
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI.
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27 मई 2026