दुनिया जहां लगातार जलवायु संकट, हीटवेव और प्रदूषण की खबरों से जूझ रही है, वहीं 2026 की शुरुआत कुछ ऐसी सकारात्मक खबरें भी लेकर आई है जिन्होंने उम्मीद जगाई है। यूरोप में पहली बार सौर और पवन ऊर्जा ने फॉसिल फ्यूल से ज्यादा बिजली बनाई, “हाई सीज़ ट्रीटी” लागू हुई और फ्रांस ने खतरनाक PFAS केमिकल्स पर सख्त कदम उठाया।
जलवायु परिवर्तन को लेकर आने वाली खबरों में अक्सर डर, तबाही और संकट की तस्वीर दिखाई देती है। कहीं रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है, कहीं जंगलों में आग लग रही है तो कहीं बाढ़ और सूखे से लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच 2026 की शुरुआत ने दुनिया को कुछ ऐसी खबरें भी दी हैं जिन्होंने यह भरोसा मजबूत किया है कि अगर लगातार कोशिशें जारी रहें तो हालात बदले जा सकते हैं।
Global Choices और कई अंतरराष्ट्रीय क्लाइमेट प्लेटफॉर्म्स द्वारा जारी “7 Inspiring Climate Wins in Early 2026” रिपोर्ट में दुनिया भर की उन उपलब्धियों को शामिल किया गया है जिन्हें जलवायु बदलाव के खिलाफ बड़ी जीत माना जा रहा है। इन उपलब्धियों में सबसे ज्यादा चर्चा यूरोपियन यूनियन की ऊर्जा क्रांति की हो रही है, जहां पहली बार पवन और सौर ऊर्जा ने मिलकर फॉसिल फ्यूल्स से ज्यादा बिजली पैदा की है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के पूरे डेटा के विश्लेषण के बाद यह साफ हुआ कि यूरोपियन यूनियन में विंड और सोलर एनर्जी का हिस्सा बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि कोयला, तेल और गैस जैसे फॉसिल फ्यूल्स की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत पर सिमट गई। विशेषज्ञ इसे सिर्फ आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक “टिपिंग पॉइंट” मान रहे हैं।
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि कुछ साल पहले तक सौर और पवन ऊर्जा को “भविष्य की टेक्नोलॉजी” कहा जाता था, लेकिन अब यह यूरोप के लिए मुख्य बिजली स्रोत बनती जा रही है। कई देशों ने बड़े स्तर पर सोलर प्लांट्स, ऑफशोर विंड फार्म्स और बैटरी स्टोरेज सिस्टम्स में निवेश किया है। इसका असर यह हुआ कि गैस और कोयले पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होने लगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी अहम है। रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा संकट ने यूरोप को यह समझा दिया था कि आयातित गैस पर ज्यादा निर्भर रहना लंबे समय में जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली क्लीन एनर्जी अब ऊर्जा सुरक्षा का भी बड़ा आधार बनती जा रही है।
दूसरी बड़ी उपलब्धि “High Seas Treaty” यानी BBNJ Agreement का आधिकारिक रूप से लागू होना माना जा रहा है। यह समझौता दुनिया के उन समुद्री इलाकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है जो किसी एक देश की सीमा में नहीं आते। पहली बार ऐसा अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा तैयार हुआ है जो खुले समुद्रों में जैव विविधता की रक्षा करेगा।
यह संधि इसलिए भी बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा समुद्रों से ढका हुआ है और दुनिया का बड़ा समुद्री इकोसिस्टम अभी तक पर्याप्त सुरक्षा से बाहर था। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बिना नियंत्रण के फिशिंग, समुद्री खनन और प्रदूषण समुद्री जीवन के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं।
नई ट्रीटी लागू होने के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को बढ़ाने, समुद्री जीवों की रक्षा करने और समुद्रों के दोहन पर निगरानी रखने में मदद मिलेगी। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर महासागर स्वस्थ रहेंगे तो वे कार्बन को अवशोषित करने में भी बड़ी भूमिका निभाएंगे, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार कम की जा सकती है।
इसी रिपोर्ट में फ्रांस के उस फैसले को भी बड़ी उपलब्धि बताया गया है जिसमें उसने PFAS केमिकल्स पर सख्त नियंत्रण लागू किया है। PFAS यानी per- and polyfluoroalkyl substances को आम भाषा में “फॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है क्योंकि ये वातावरण और मानव शरीर में बेहद लंबे समय तक बने रहते हैं।
ये केमिकल्स कई रोजमर्रा के प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल होते रहे हैं, जैसे नॉन-स्टिक बर्तन, वाटरप्रूफ कपड़े, पैकेजिंग और औद्योगिक सामग्री। लेकिन रिसर्च में सामने आया कि PFAS कैंसर, हार्मोन असंतुलन, प्रजनन समस्याओं और इम्यून सिस्टम पर असर डाल सकते हैं।
फ्रांस ने उन प्रोडक्ट्स पर बैन लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया है जहां सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं। क्लाइमेट और हेल्थ एक्सपर्ट्स इसे एक बड़ा संकेत मान रहे हैं कि आने वाले समय में दूसरे देश भी ऐसे खतरनाक केमिकल्स के खिलाफ सख्त कानून ला सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन उपलब्धियों का असर केवल यूरोप या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहेगा। क्लीन टेक्नोलॉजी सस्ती होने से भारत जैसे देशों को भी फायदा मिल सकता है। जैसे-जैसे सौर पैनल, बैटरियां और ग्रीन टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होंगी, उनकी लागत कम होती जाएगी और विकासशील देशों के लिए इन्हें अपनाना आसान होगा।
भारत पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े सोलर एनर्जी मिशनों में शामिल है। ऐसे में यूरोप की प्रगति भारत के लिए भी एक संकेत मानी जा रही है कि क्लीन एनर्जी अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक जरूरत बन चुकी है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अक्सर लोग यह सोचने लगते हैं कि जलवायु संकट इतना बड़ा हो चुका है कि अब कुछ बदलना संभव नहीं। लेकिन ऐसी खबरें याद दिलाती हैं कि लगातार रिसर्च, सरकारी नीतियां, वैज्ञानिक प्रयास और आम लोगों की भागीदारी मिलकर बदलाव ला सकती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी साफ कर रहे हैं कि ये उपलब्धियां अंतिम जीत नहीं हैं। दुनिया अभी भी बढ़ते तापमान, प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। लेकिन इन छोटी–छोटी सफलताओं को आने वाले बड़े बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है।
2026 की शुरुआत में आई ये “7 क्लाइमेट जीत” यही संदेश देती हैं कि संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर सरकारें, वैज्ञानिक और समाज साथ मिलकर काम करें तो धरती को आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्यादा सुरक्षित और रहने लायक बनाया जा सकता है।
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Published by: Gulam Rasool. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
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